शनिवार, 15 जनवरी 2011

'मेरी सर्वप्रिय कवितायेँ'-(भाग-एक)

आप सभी की अपार शुभकामनायें मिल रहीं हैं..........
मन,आत्मा,सम्पूर्ण परिवेश आनंदित है ! ऐसे आनंदपूर्ण क्षणों में एक आनंद से परिपूर्ण विचार आया कि जिन कविताओं,ग़ज़लों,रचनाओं आदि ने मुझे बहुत अधिक प्रभावित किया है, उनसे आपका परिचय भी करा दिया जाये, इस क्रम में अनेक संत कवि, अनेक विभूतियों पर अपने आलेख पहले ही प्रस्तुत कर चुका हूँ, जिस पर आप में कुछ मित्रों ने अपनी पसंद ज़ाहिर करते हुए अति सारगर्भित वक्तव्य, विचार, सन्देश, समीक्षात्मक दिशानिर्देश प्रदान किये हैं !
आज एक नयी श्रृंखला 'मेरी सर्वप्रिय कवितायेँ' प्रारम्भ कर रहा हूँ,विश्वास है कि आप सभी मेरे अपने मित्रों का प्यार,दुलार और ध्यान मिलेगा....
सादर विनम्र निवेदन एवम शुभकामनाओं सहित,

       (1.)
---दीवाली की रात रे---
द्वार-द्वार दीपों की आयी बारात रे.....
दीवाली की रात रे.....
नयन भरें काजरवा, सांवरिया यामिनी,
बज उठी बाँसुरिया, झूम उठी रागिनी !
एक-एक दिवना में लाख-लाख बातियाँ,
ज्योति जगी देहरी पर नाच उठी कामिनी !!
गोरी ने नृत्य किया, दीप धरे हाथ रे......
दीवाली की रात रे......
ह्रदय का जुआ हुआ, लक्ष्मी के सामने,
धड़कन की चाल बढ़ी, पहले ही दांव में !
नयनों में होड़ लगी, कौन किसे जीत ले,
हौले से बांह गही,शर्मीले काम ने !!
रन जाने होड़ में कौन जीत जाये रे...
दीवाली की रात रे......
(साभार-डॉ.तपेश चतुर्वेदी )

                (2.)
---एक ऐसा जलाएं दीया---
एक ऐसा जलाएं दीया आज हम,
मावसी रात को भी जो पूनम करे !
रोशनी का जो केवल दिखावा करें,
उन सितारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
करने वालों ने वादे किये हैं बहुत,
किन्तु पूरा करेंगे ये वादा नहीं !
जिनके कन्धों से ताकत विदा ले गयी,
उन सहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
यों समन्दर में पानी की सीमा नहीं,
किन्तु पीने के काबिल नहीं बूंद भी !
जिनसे प्यासों को जीवन नहीं मिल सके,
उन फुहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
कुछ बदलने से मौसम ख़ुशी तो मिली,
चाहता हूँ यह मौसम ना बदले कभी !
जिनके आने से बगिया में रौनक ना हो,
उन बहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
हम भयानक भंवर से तो बचते रहे,
पर तटों ने हमेशा छलावा किया !
जो लहर के थपेड़ों से खुद मिट गए,
उन किनारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
 (साभार-डॉ.तपेश चतुर्वेदी)
            
                 (3.)
       ---कुछ मुक्तक----
दर्द ने ऐसी ग़ज़ल गायी है,याद कोहरे-सी दिल पर छायी है !
जाने वालों ज़रा ठहरो,देखो..प्यार की आंख छलक आयी  है !!
क्या करूँ बहुत कड़ा पहरा है,हर तरफ एक प्रश्न गहरा है !
बात मन की कहूँ मै किससे,कान हैं किन्तु मनुज बहरा है !!
(साभार-डॉ.तपेश चतुर्वेदी) 

                  (4.)
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतनाअँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...
नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतनाअँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए....
सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,भले ही दिवाली यहाँ रोज आए।
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए....
मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेगे तभी यह अँधेरे घिरे अब,स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए,
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए....
(साभार-नीरज)

              (5.)
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ.....
है कहाँ वह आग जो मुझको जलाए,है कहाँ वह ज्वाल मेरे पास आए,
रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ,आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।
तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी,नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी,
आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ,आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।
मैं तपोमय ज्योति की, पर, प्यास मुझको,है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको,
स्नेह की दो बूँद भी तो तुम गिराओ,आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।
कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूँगा,कल प्रलय की आँधियों से मैं लडूँगा,
किंतु मुझको आज आँचल से बचाओ,आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।
(साभार- डॉ. हरिवंशराय बच्चन)

               (6.)
दिशा-दिशा में दीपों की आलोक-ध्वजा फहराओदेह-प्रहित शुभ शुक्र !
आज तुम घर-घर में उग आओव्योम-भाल पर अंकित कर दो ज्योति-हर्षिणी क्रीड़ासप्तवर्ण सौंदर्य !
प्रभामंडल में प्राण जगाओ! 
जागो! जागो! किरणों के ईशान !
क्षितिज-बाहों में जागो द्योनायक! पर्जन्यों की अरश्मि राहों में,
जागो स्वप्नगर्भ तमसा के उर्ध्व शिखर अवदातीश्री के संवत्सर जागो द्युति की चक्रित चाहों में। 
तिमिर-पंथ जीवन की जल-जल उठे वर्तिका कालीप के समूची सृष्टि विभा से,
अमा घनी भौंरालीसुषमा के अध्वर्य, उदित शोभा के मंत्रजयी ओ!
भर दो ऊर्जा से प्रदीप्ति की भुवन-मंडिनी थाली। 
गोरज-चिह्नित अंतरिक्ष के ज्योति-कलश उमड़ाओ,
स्वर्णपर्ण नभ से फिर मिट्टी के दीपों में आओआभा के अधिदेव !
मिटा दो धरा-गगन की रेखारश्मित निखिल यज्ञफल को फिर जन-जन सुलभ बनाओ 
दिशा-दिशा में इंद्रक्रांति के कुमुद-पात्र बिखराओ,
सप्तसिंधु-पोषित धरणी की अंजलि भरते जाओ,सुरजन्मी आलोक !
चतुर्दिक प्रतिकल्पी तम छायाश्री के संवत्सर! ऋतुओं की जड़ता पर छा जाओ!
(साभार-रामेश्वर शुक्ल 'अंचल')


          (7.)
‘एक चूड़ी टूटती तो हाय हो जाता अमंगल,
मेघ में बिजली कड़कती, कांपता संपूर्ण जंगल,
भाग्य के लेखे लगाते, एक तारा टूटता तो,
अपशकुन शृंगारिणी के हाथ दर्पण छूटता तो,
 दीप की चिमनी चटकती, चट तिमिर का भय सताता,
कौन सुनता विस्फोट, जब कोई हृदय है टूट जाता।
(साभार-रामेश्वर खंडेलवाल 'तरुण)

"प्रस्तुत साभार कविताओं का मेरे जीवन पर अमिट प्रभाव है, मेरे इन आदर्श परमादरणीय रचनाकारों को मेरा शत-शत विनम्र नमन:"

    • Rohit Sharma VERY NICE
      November 5, 2010 at 1:31pm ·  ·  1 person

    • Anupama Pathak sundar sankalan!
      deepotsav ki haardik shubhkamnayen!!!!

      November 5, 2010 at 4:18pm ·  ·  3 people

    • Manjulata Verma bahut achchha hai, deep-jyoti diwali se sambandhit kavitayen,padha.dhanvad, radhe radhe,
      November 5, 2010 at 10:11pm ·  ·  2 people

    • Manoj K Gautam AAPKI KALAM KA JAWAAB NAHI BOSS! BAHUT ACHCHA LIKHTE HAIN.
      November 5, 2010 at 11:06pm ·  ·  1 person

    • Shaileshwar Pandey Aape ke in Sato (7) Kavitawo ko padha. bahut hi acha laga vastav me dipawali se sambanthit ye kavitaye prerana dayag hai...dhanyavaad

      Ma Laxmi ka aap ki Sukh smavrithi den aur Ma Saraswati sadaiv aap ke kalam ko shakti...Shubh Dipavali.

      November 6, 2010 at 3:12am ·  ·  2 people

    • Manjula Saxena happy diwali
      November 6, 2010 at 4:12am ·  ·  1 person

    • Manoj Joshi दीपावली की शुभकामनाएँ..
      बहुत अच्छा संकलन है ...ऐसे ही और भी विषयों पर आप हिंदी साहित्य के हस्ताक्षरों से परिचय कराते रहें....

      November 6, 2010 at 7:09pm ·  ·  1 person

    • Bharti Pandit sundar sangrah manoj bhai.. badhai..
      November 6, 2010 at 7:20pm ·  ·  1 person

    • Poonam Singh 
      ‎-
      परमादरणीय गुरुदेव,
      इस संकलन की अधिकांश कवितायें ऐसी चुनी गई हैं जो कि बहुत मशहूर हैं। विद्यार्थी इस संग्रह से विशेष रूप से लाभान्वित होंगे !
      इस अर्थ में जीजिविषा और आदमी के आंतरिक संघर्ष को लिखने वाले प्रतिनिधि कवि के रूप में हमारे सामने आते हैं।
      व्यक्ति को अपने कविता के केन्द्र में रखकर यूं तो बहुत से रचनाकारों ने कविताएं लिखी हैं, किंतु उक्त कविता इस संग्रह की आधार कविता है, जहां कवि स्वयं की अनुभूतियों का विस्तार उसी केन्द्र से ज़ुडकर करता है, जहां व्यक्ति का संघर्ष, उसका अंतरद्वंद्व और उसकी भूखप्यास छटपटाहट काम कर रहे हैं। यहां पर उसकी तकलीफों में कवि इतना डूब चुका होता है कि उसी का एक हिस्सा हो जाता है।
      गुरुदेव !आप भी तो बहुत सुंदर लिखते हैं, हमें और हमारे अन्य साथियों को कब सौभाग्य मिलेगा.............

      November 6, 2010 at 11:20pm ·  ·  2 people

    • Manoj Chaturvedi 
      ‎***
      मेरे प्रिय मित्रों,
      आपको मेरा यह संकलन पसंद आया,बहुत-बहुत धन्यवाद !
      प्रिय परम प्रतिभाशाली शिष्य पूनम सिंह शर्मा,
      तुम्हे हार्दिक आभार एवम धन्यवाद........,
      दरअसल यह भूमिका है मेरे साहित्य को प्रेरणा देने वाले मेरे प्रिय साहित्यकारों को आभार प्रकट करते हुए अपने साहित्य को प्रस्तुत करने हेतु एक आधार बनाने के लिए......,
      ज़ल्दी ही मेरे गीतों का परिचय भी मेरे मित्रों को मिलेगा...

      November 6, 2010 at 11:29pm ·  ·  3 people

    • Praveen Nahta ‎@manoj.....> good collection....achhaa lagaa...
      November 6, 2010 at 11:33pm ·  ·  1 person

    • Kakaa Guru जय गणेश, आपके प्रोफाइल परिचय में एक पंक्ति '' गलत लोग दूर भले '' पढकर खुशी हुई, सही कहा है- '' दुर्जन री कृपा बुरी सजन री भली त्रास - तावड तप गर्मी पड़े तब बरसन री आस '' -काकागुरु

'मेरी पसंद की कुछ गज़लें'

प्रात:स्मरणीय,परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन पिताश्री डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की गोद में इस जगत के प्रथम साक्षात्कार किये थे और उनकी ही ऊँगली पकड़कर प्रथम बार इस पावन भूमि पर कदम रखा था !उनके सानिंध्य में ही,उनके परमस्नेही आशीर्वाद की छाया में ज्ञान प्राप्त किया था, उन परम पावन महान आत्मा को मेरा सादर शत-शत नमन..........
अपने परम पूजनीय ब्रह्मलीन पिताश्री की पावन स्मृति में अपनी पसंद की १५ उम्दा ग़ज़लों को आपके समक्ष प्रस्तुत का रहा हूँ, प्रस्तुत गजलों के रचयिताओं के प्रति हार्दिक आभार अवश्य प्रकट करना चाहूँगा.....,
और साथ में आप सहृदय मित्रों का आशीर्वाद भी चाहता हूँ, दिल खोलकर आशीर्वाद दीजिये...अपनी सारगर्भित टिप्पणियों के माध्यम से भी औ सन्देश के माध्यम से भी, मैं आप सभी मित्रों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने मुझे दिल से स्नेह और दुलार दिया है, बस एक गुज़ारिश और है कि यह स्नेह आजीवन बनाये रखियेगा........
विनम्र सादर निवेदन सहित साभार,

(1.)
एक ऐसा जलाएं दीया आज हम,मावसी रात को भी जो पूनम करे !
रोशनी का जो केवल दिखावा करें,उन सितारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
करने वालों ने वादे किये हैं बहुत,किन्तु पूरा करेंगे ये वादा नहीं !
जिनके कन्धों से ताकत विदा ले गयी,उन सहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
यों समन्दर में पानी की सीमा नहीं,किन्तु पीने के काबिल नहीं बूंद भी !
जिनसे प्यासों को जीवन नहीं मिल सके,उन फुहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
कुछ बदलने से मौसम ख़ुशी तो मिली,चाहता हूँ यह मौसम ना बदले कभी !
जिनके आने से बगिया में रौनक ना हो,उन बहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
हम भयानक भंवर से तो बचते रहे,पर तटों ने हमेशा छलावा किया !
जो लहर के थपेड़ों से खुद मिट गए,उन किनारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
(डॉ.तपेश चतुर्वेदी)

(2.)
है बस कि हर इक उनके इशारे में निशाँ और,करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और ! 
या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात,दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़ुबाँ और ! 
आबरू से है क्या उस निगाह -ए-नाज़ को पैबंद,है तीर मुक़र्रर मगर उसकी है कमाँ और ! 
तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठेंगे,ले आयेंगे बाज़ार से जाकर दिल-ओ-जाँ और ! 
हरचंद सुबुकदस्त हुए बुतशिकनी में,हम हैं तो अभी राह में है संग-ए-गिराँ और ! 
है ख़ून-ए-जिगर जोश में दिल खोल के रोता,होते कई जो दीदा-ए-ख़ूँनाबफ़िशाँ और ! 
मरता हूँ इस आवाज़ पे हरचंद सर उड़ जाये,जल्लाद को लेकिन वो कहे जाये कि हाँ और !
लोगों को है ख़ुर्शीद-ए-जहाँ-ताब का धोका,हर रोज़ दिखाता हूँ मैं इक दाग़-ए-निहाँ और ! 
लेता न अगर दिल तुम्हें देता कोई दम चैन,करता जो न मरता कोई दिन आह-ओ-फ़ुग़ाँ और ! 
पाते नहीं जब राह तो चढ़ जाते हैं नाले,रुकती है मेरी तब'अ तो होती है रवाँ और ! 
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे,कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और !!
(मिर्ज़ा गालिब)


 (3.)
दुनिया के सितम याद ना अपनी हि वफ़ा यादअब मुझ को नहीं कुछ भी मुहब्बत के सिवा याद !
मैं शिक्वाबलब था मुझे ये भी न रहा यादशायद के मेरे भूलनेवाले ने किया याद !
जब कोई हसीं होता है सर्गर्म-ए-नवाज़िशउस वक़्त वो कुछ और भी आते हैं सिवा याद !
मुद्दत हुई इक हादसा-ए-इश्क़ को लेकिनअब तक है तेरे दिल के धड़कने की सदा याद !
हाँ हाँ तुझे क्या काम मेरे शिद्दत-ए-ग़म सेहाँ हाँ नहीं मुझ को तेरे दामन की हवा याद !
मैं तर्क-ए-रह-ओ-रस्म-ए-जुनूँ कर ही चुका थाक्यूँ आ गई ऐसे में तेरी लगज़िश-ए-पा याद !
क्या लुत्फ़ कि मैं अपना पता आप बताऊँकीजे कोई भूली हुई ख़ास अपनी अदा याद !!
 (जिगर मुरादाबादी)

(4.)
जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमे,राख के ढेर में शोला है न चिंगारी है !
अब न वो प्यार न उस प्यार की यादें बाकी,आग यूँ दिल में लगी,
कुछ न रहा, कुछ न बचा,जिसकी तस्वीर निगाहों में लिए बैठी हो,
मैं वह दिलदार, नहीं उसकी हूँ खामोश चिता जाने क्या ढूँढती रहती हैं !
ये आँखें मुझमे, जिंदगी हंस के गुज़रती तो बहुत अच्छा था,
खैर, हँसके न सही, रो के गुज़र जायेगी,राख बरबाद मुहब्बत की बचा रखी है !
बार-बार इसको जो छेड़ा तो बिखर जायेगी,जाने क्या ढूँढती रहती हैं ये आँखें मुझमें…
आरज़ू जुर्म, वफ़ा जुर्म, तमन्ना है गुनाहयह  वह, दुनिया है जहाँ प्यार नहीं हो सकता !
कैसे बाज़ार का दस्तूर तुम्हें समझाऊंबिक गया जो वो खरीदार नहीं हो सकता !!
 (कैफी आज़मी)--'फिल्म शोला और शबनम'

(5.)
परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता,किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता !
बडे लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना,जहां दरिया समन्दर में मिले, दरिया नहीं रहता !
हजारों शेर मेरे सो गये कागज की कब्रों में,अजब मां हूं कोई बच्चा मेरा ज़िन्दा नहीं रहता !
तुम्हारा शहर तो बिल्कुल नये अन्दाज वाला है,हमारे शहर में भी अब कोई हमसा नहीं रहता !
मोहब्बत एक खुशबू है, हमेशा साथ रहती है,कोई इन्सान तन्हाई में भी कभी तन्हा नहीं रहता !
कोई बादल हरे मौसम का फ़िर ऐलान करता है,ख़िज़ा के बाग में जब एक भी पत्ता नहीं रहता !!
(बशीर बद्र)

(6.)
चिराग-ए-ज़िंदगी होगा फरोजां, हम नहीं होंगे,चमन में आयेगी फसल-ए-बहारां, हम नहीं होंगे !
जवानो! अब तुम्हारे हाथ में तकदीर-ए-आलम है,तुम्हीं होगे फरोग-ए-बज़्म-ए-इमकान, हम नहीं होंगे !
हमारे डूबने के बाद उभरेंगे नए तारे जबीन-ए-दहर पर छिटकेगी अफशां, हम नहीं होंगे !
न था अपनी ही किस्मत में तुलू-ए-मेहर का जलवा,सहर हो जायेगी शाम-ए-गरीबां,हम नहीं होंगे !
कहीं हमको दिखा दो एक किरन ही टिमटिमाती सी,कि जिस दिन जगमगायेगा शबिस्तां, हम नहीं होंगे !
हमारे बाद ही खून-ए-शहीदां रंग लाएगा,यही सुर्खी बनेगी जेब-ए-उन्वां, हम नहीं होंगे !
 (अब्दुल मजीद सालिक)

(7.)
काम सब गैर-ज़रूरी हैं जो सब करते हैंऔर हम कुछ नहीं करते हैं, ग़ज़ब करते हैं !
हम पे हाकिम का कोई हुक्म नहीं चलता हैहम कलंदर हैं, शहंशाह लक़ब करते हैं !
आप की नज़रों में सूरज की है जितनी अजमत हम चिरागों का भी उतना ही अदब करते हैं !
देखिये जिसको उसे धुन है मसीहाई की आजकल शहरों के बीमार मतब करते हैं !
(राहत इन्दौरी)

(8.)
वो ख़त के पुर्जे उडा रहा था,हवाओं का रूख दिखा रहा था,
कुछ और भी हो गया नुमाया,मैं अपना लिखा मिटा रहा था !
उसी का इमा बदल गया है,कभी जो मेरा खुदा रहा था !
वो एक दिन एक अजनबी को,मेरी कहानी सुना रहा था,
वो उम्र कम कर रहा था मेरी,मैं साल अपने बढ़ा रहा था !
(गुलज़ार)

(9.)
दोस्त जितने भी थे मज़ार में हैं गालिबन मेरे इंतज़ार में हैं,
एक शाएर बना खुदा-ए-सुखनजो रसूल-ए-सुखन थे, ग़ार में हैं !
क्या सबब है कि एक मौसम में कुछ खिजां में हैं, कुछ बहार में हैं,
ख़ार समझो न तुम इन्हें हरगिज़ सांप के दांत गुल के हार में हैं !
शिम्र-ओ-फ़िरऔन कब हुए मरहूम उनके औसाफ रिश्तेदार में हैं,
सबके सब काविश फ़रिश्ता-खिसाल ऐब जितने हैं खाकसार में हैं !
(काविश बद्री)

(10.)
क़दम इंसान का राह-ए-दहर में थर्रा ही जाता है चले कितना ही कोई बच के ठोकर खा ही जाता है,
नज़र ख्वाह कितनी ही हकाएक आशना, फिर भी हुजूम-ए-कशमकश में आदमी घबरा ही जाता है !
ख़िलाफ़-ए-मसलहत मैं भी समझता हूँ, मगर वाएज़ वो आते हैं तो चेहरे पे तग़ैय्युर* आ ही जाता है,
हवाएं ज़ोर कितना ही लगाएं आंधियां बन कर मगर जो घिर के आता है वो बादल छा ही जाता है !
शिकायत क्यूँ इसे कहते हो ये फितरत है इंसान की मुसीबत में ख़याल-ए-ऐश-ए-रफ्ता आ ही जाता है,
समझती हैं माल-ए-गुल में क्या ज़ोर-ए-फितरत है सहर होते ही कलियों को तबस्सुम आ ही जाता है !
(शब्बीर हसन खान जोश मलीहाबादी)

(11.)
ज़ख्म झेले दाग़ भी खाए बोहत दिल लगा कर हम तो पछताए बोहत,
दैर से सू-ए-हरम आया न टुक हम मिजाज अपना इधर लाये बोहत,
फूल, गुल, शम्स-ओ-क़मर सारे ही थे पर हमें उनमें तुम ही भाये बोहत !
रोवेंगे सोने को हमसाये बोहत,
मीर से पूछा जो मैं आशिक हो तुम हो के कुछ चुपके से शरमाये बोहत !
(मीर तकी मीर)

(12.)
किसी को धन नहीं मिलता,किसी को तन नहीं मिलता !
लुटाओ धन मिलेगा तन,मगर फिर मन नहीं मिलता !
हमारी चाहतें अनगिन, मगर जीवन नहीं मिलता !
किसी के पास धन-काया,मगर यौवन नहीं मिलता !
ये सांपों की है बस्ती पर, यहाँ चन्दन नहीं मिलता !
जहां पत्थर उछलते हों,वहां मधुबन नहीं मिलता !
मोहब्बत में मिले पीड़ा,यहाँ रंजन नहीं मिलता !
लगाओ मन फकीरी में, सभी को धन नहीं मिलता !
वो है साजों का मालिक पर,सभी को फन नहीं मिलता !
अगर हो कांच से यारी तो, फिर कंचन नहीं मिलता !
मिलेंगे लोग पंकज पर,वो अपनापन नहीं मिलता !!
(गिरीश पंकज)

(13.)
बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,
याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ ।
बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे ,
आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ ।
चिड़ियों के चहकार में गूँजे राधा-मोहन अली-अली ,
मुर्गे की आवाज़ से खुलती, घर की कुंड़ी जैसी माँ ।
बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में ,
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां ।
बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें जाने कहाँ गई ,
फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की जैसी माँ ।
(निदा फ़ाज़ली)

(14.)
हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं
एक है जिसका सर नवें बादल में है
दूसरा जिसका सर अभी दलदल में है
एक है जो सतरंगी थाम के उठता है
दूसरा पैर उठाता है तो रुकता है
फिरका-परस्ती तौहम परस्ती और गरीबी रेखा
एक है दौड़ लगाने को तय्यार खडा है
‘अग्नि’ पर रख पर पांव उड़ जाने को तय्यार खडा है
हिंदुस्तान उम्मीद से है!
आधी सदी तक उठ उठ कर हमने आकाश को पोंछा है
सूरज से गिरती गर्द को छान के धूप चुनी है
साठ साल आजादी के…हिंदुस्तान अपने इतिहास के मोड़ पर है
अगला मोड़ और ‘मार्स’ पर पांव रखा होगा!!
हिन्दोस्तान उम्मीद से है..
(गुलज़ार)

(15.)
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या हैतुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है,
न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदाकोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या है !
ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसेवरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है,
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहनहमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है !
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगाकुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है,
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायलजब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है !
वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़सिवाए बादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है,
पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चारये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है !
रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भीतो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है,
बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतरातावगर्ना शहर में "ग़ालिब" की आबरू क्या है !!
(मिर्ज़ा गालिब)

"प्रात:स्मरणीय,परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन पिताश्री डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की परम पावन महान आत्मा को मेरा सादर शत-शत नमन........."







      • SheshDhar Tiwari Pitaji ke poojya charno ko mera naman.
        November 18, 2010 at 2:24am ·  ·  1 person

      • Neermal Suri Bahut Khoob..
        November 18, 2010 at 5:56am ·  ·  1 person

      • Meenakshi Joshi prnam manoj ji .bhagwan punay atma ko hamesha apne charano me jagah de or aap log unke adarsh ,yaden or sapne isi tarah apne sine se lagaye rahe. Bahut sunder gajalon ka sangrah apne samarpit kiya. Dhanywad.
        November 18, 2010 at 7:56am via Facebook Mobile ·  ·  1 person

      • Nitindra Badjatiya Sadar Shraddha Suman...Charna Vandan
        November 18, 2010 at 8:08am ·  ·  1 person

      • Poonam Singh ‎-
        परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की आज चतुर्थ पुण्यतिथि पर भाव भीनी श्रधांजलि !!!

        November 18, 2010 at 8:28am ·  ·  1 person

      • Sheetal Jangir सादर शत-शत नमन !
        November 18, 2010 at 8:32am ·  ·  1 person

      • Rahul Sultania पुण्यतिथि पर भाव भीनी सादर शत-शत नमन !!!!!
        November 18, 2010 at 8:35am ·  ·  1 person

      • Raghuveer Saini परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की आज चतुर्थ पुण्यतिथि पर भाव भीनी श्रधांजलि !!!
        November 18, 2010 at 8:36am ·  ·  1 person

      • Anil Kumar Patil
        श्रद्धेय ब्रह्मलीन डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की आज चतुर्थ पुण्यतिथि पर सादर शत-शत नमन !!!!!

        November 18, 2010 at 8:42am ·  ·  1 person

      • Shail Agrawal
        दिव्यात्मा पिताजी की चतुर्थ पुण्यतिथि पर आपने बहुत ही सुन्दर भावांजलि दी है। ऐसे ही तम को हटाने वाले प्रकाशपुंज बन वे प्रेरित करते रहें।

        November 18, 2010 at 8:42am ·  ·  2 people

      • डॉ. आभा चतुर्वेदी

        ‎"भाव भीनी विनम्र श्रद्धांजलि"
        प्रात:स्मरणीय,परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन पिताश्री डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की आज चतुर्थ पुण्यतिथि पर सादर शत-शत नमन !!!!!
        मौत जिसको कह रहे वो जिंदगी का नाम है
        मौत से डरना डराना कायरो का काम है ,
        जगमगाती ज्योति हरदम ज्यो की त्यों कायम रहे ……

        November 18, 2010 at 8:59am ·  ·  6 people

      • मिलिन्द चतुर्वेदी
        परमपूजनीय श्रद्धेय मेरे प्यारे दादाजी केबारे में पढ़कर हमेशा और ज्‍यादा जानने की इच्‍छा होती है उनको…
        उनकी कविताओं का साथ तो रहेगा हमेशा.......
        विनम्र श्रद्धांजलि......

        November 18, 2010 at 9:08am ·  ·  4 people

      • Rajesh Mishra
        परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी को भाव भीनी श्रधांजलि !!!

        November 18, 2010 at 11:01am ·  ·  1 person

      • चड्ढ़ा Rajesh Chadha राजेश
        तटों ने हमेशा छलावा किया ...........विनम्र श्रद्धांजलि......

        November 18, 2010 at 11:23am ·  ·  1 person

      • Babban Singh
        पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि.....

        November 18, 2010 at 12:58pm ·  ·  1 person

      • Manoj Chaturvedi 
        ‎*
        ब्रह्मलीन पिताश्री डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की आज चतुर्थ पुण्यतिथि पर अपने परम पूजनीय पिता/गुरु/शिक्षक/मार्गदर्शक/प्रेरणास्त्रोत के प्रति अपना आभार,अपनी कृतज्ञता,अपनी शुक्रगुजारी व्यक्त करता हूँ !! बहुआयामी व्यक्तित्व के अति विनम्र महान शिक्षाविद पुण्यात्मा को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि !
        हम सब अपने -अपने गुरु/शिक्षक/मार्गदर्शक/प्रेरणास्त्रोत के प्रति अपना आभार, अपनी कृतज्ञता , अपनी शुक्रगुजारी व्यक्त करते हैं और इस अवसर पर विशेष रूप से उन्हें नमन करते हैं और कहते हैं-
        " गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुर्साक्षात्‌ परमब्रह्म, तस्मै श्री गुरुवैनमः॥"

        यह सर्वविदित है कि गुरु द्रोण ने अर्जुन को एक कुशल धनुर्धर होने का सम्मान दिया, गुरु चाणक्य ने एक साधारण बालक को देश का सम्राट बना दिया, गुरु परशुरामज़ी ने भीष्म, द्रोण व कर्ण को अपराजेय शस्त्रविद्या प्रदान की थी। अर्थात, गुरु में वह शक्ति होती है कि वह अपने शिष्य को अपने समान महान बनाने का विशिष्ट कार्य करता है । कहा भी गया है -
        "गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष ।
        गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष ॥ "
        कबीर ने तो इतना तक कह डाला है कि -
        "कबीरा ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।
        हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर॥"
        बहुत सारे कवियों /मनीषियों ने कितने ही पन्ने गुरु की महिमा में रंग डाले और गुरु को गोविन्द से भी ऊपर होने का मान दिया , जैसे- "गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
        बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो मिलाय ॥"
        या फिर इन पंक्तियों में देखें-
        जो गुरु बसै बनारसी ,सीष समुन्दर तीर।
        एक पलक बिसरे नहीं ,जो गुण होय शरीर ॥
        गुर धोबी शिष्य कपड़ा, साबू सिरजन हर।
        सुरती सिला पुर धोइए, निकसे ज्योति अपार ॥
        गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष ।
        गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष ॥
        गुरु कुम्हार सिष कुंभ है, गढ़ि-गढ़ि काढ़ै खोट ।
        अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट ॥
        गुरु-गुरु में भेद है, गुरु-गुरु में भाव ।
        सोइ गुरु नित बन्दिये, शब्द बतावे दाव ॥

        November 18, 2010 at 8:00pm ·  ·  5 people

      • Manoj Chaturvedi 
        ‎***
        सर्वप्रथम " ब्रह्मलीन पिताश्री डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी " को शत शत प्रणाम !!!
        मेरा सादर विनम्र आभार सभी परमादरणीय मित्र स्वीकार करें, और रही आपके आशीर्वाद रुपी अति संवेदनपूर्ण टिप्पणियों की, तो इसके लिए मैं आपका अत्यंत आभारी हूँ !!!
        आप सभी मेरे सुख-दुःख के क्षणों के सहभागी मित्रों से कि कृपया यूँही अपना आशीष बनाकर रखे !!!
        शुभ रात्रि !!!

        November 18, 2010 at 10:30pm ·  ·  5 people

      • Manoj Chaturvedi 
        ‎*
        मेरे प्रिय मित्रों,
        आपका आभारी हूँ !!! अपने इर्दगिर्द से बात लाया हूँ और लाता रहूँगा, जो जीवन से र्नैराश्य अवसाद को परे रखा जा सके !आध्यात्मिक सोच मनुष्य को नई दिशा ओर उर्जा प्रदान करती है ओर नकारात्मक उर्जा को नष्ट कर सकारात्मक कार्य करने को प्रेरित करती है !
        ख़ौफ़ कितना भी हो इज़हार तो कर ही देना-
        दिल के झोले को सुक़ून से भर ही लेना...!
        वर्ना ख़ुद ज़िंदगी यूँ चैन से नहि जीने ही देगी
        अमिय सुख का तुमको भी न पीने नहीं देगी !
        आप सभी मित्रो को शुभ-रात्रि, इस विश्वास के साथ एक नयी सुबह में नयी स्फूर्ति के साथ फिर मिलेंगें.........

        November 18, 2010 at 10:51pm ·  ·  6 people

      • Dushyant Chopraa Bhai Manoj ... Man Aanandit Ho Gaya..
        Ek Ek Rachna.... Umdaa Hai... Dhanyawaad..

        November 18, 2010 at 10:53pm ·  ·  1 person

      • Shaileshwar Pandey 
        ‎||''Bhav Bhini Vinamra Shradhanjali''||
        || परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन पिताश्री डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की आज चतुर्थ पुण्यतिथि पर सादर शत-शत नमन ||
        ||Sansar me aneko vibhutiya janm leti hai,
        aur panch tava ki prapti ho jati hai.
        Lekin vyaktiyo ka vktiva hi ''SITARO''
        ki bhati sada jagamagata rahata hai.||

        November 19, 2010 at 11:26am ·  ·  2 people

      • Rakesh Gautam परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन श्री डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की परम पावन महान आत्मा को मेरा सादर शत-शत नमन.........
        November 25, 2010 at 3:11pm ·