शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

आज के सामाजिक परिवेश में वृद्ध आश्रम व्यवस्था उचित है ?



पक्ष में विचार:--
परमात्मा की परम कृपा से माता-पिता दुनिया की सबसे बड़ी नेमतों में से एक हैं, बहुत खुशनसीब हैं वह जिनकों यह दोनों अथवा इनमें से किसी एक का भी सानिध्य प्राप्त है। हमारे माता-पिता हमारी सामाजिक व्यवस्था के स्तंभ हैं, पर अफ़सोस आज यह स्तंभ गिरते जा रहे हैं ।

वह उस समय हमारी हर ज़रूरत का ध्यान रखते हैं, जबकि हमें इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है, लेकिन जब उनको उसी स्नेह की आवश्यकता होती है तो हमारे हाथ पीछे हट जाते हैं। कहावत है कि दो माता-पिता मिलकर दस बच्चों को भी पाल सकते हैं, लेकिन दस बच्चे मिलकर भी दो माता-पिता को नहीं पाल सकते।
अफ़सोस आज दिन-प्रतिदिन वृद्ध आश्रमों की संख्या बढती जा रही है, उनमें भी अधिकतर वही लोग होतें हैं जिनके बेटे-बेटियां जिंदा और अच्छी-खासी माली हालत में होते हैं। अक्सर उम्र के इस पड़ाव पर पहुँच कर घर के बुज़ुर्ग अपने आप को अलग-थलग महसूस करने लगते हैं। संवेदनहीनता के इस दौर में अपने ही इनकी भावनाओं को समझने में नाकाम होने लगते हैं। मुझे आज भी याद है किस तरह मेरे नाना-नानी का रुआब घर पर था, उनकी हर बात को पूर्णत: महत्त्व मिलता था, लेकिन इस तरह का माहौल आज के दौर में विरले ही देखने को मिलता है। आज बुजुर्गों की बातों को अनुभव भरी सलाह नहीं बल्कि दकियानूसी समझा जाता है। उनकी सलाहों पर उनके साथ सलाह-मशविरे की जगह सिरे से ही नकार दिया जाता है। आज के माहौल और दिन-प्रतिदिन गिरती मानवीय संवेदना को देखकर लगता है कि हमारे वतन में भी वोह दिन दूर नहीं जब बुजुर्गों की सुध लेने वाला कोई नहीं होगा! जबकि हर एक धर्म में बुजुर्गों से मुहब्बत और उनका ध्यान रखने की शिक्षाएं हैं, लेकिन बड़े-बड़े धार्मिक व्यक्ति भी इस ओर अक्सर बेरुखें ही हैं। क्योंकि उन्होंने धर्म को आत्मसात नहीं किया बल्कि केवल दिखावे के लिए ही उसका प्रयोग किया। संस्कार और धार्मिक बातें चाहे लोगो को उपदेश लगे या किसी की समझ में ना आएं, लेकिन हमें हमेशा उनको दूसरों तक पहुँचाने की कोशिश कानी चाहिए । क्योंकि अगर इसी तरह धर्म की चर्चा करते रहें  तो कम से कम हम तो अवश्य ही उनपर अमल करने वाले बन जाएगें । वर्तमान समय में वृद्ध वर्ग की परिस्थितियों के कुछ नमूने दृष्टव्य  हैं.....

भारत की औद्योगिक राजधानी मुंबई में रहने वाली 92 साल की लक्ष्मीबाई का आरोप है कि उनके पोते और दामाद ने उनकी पिटाई की है. वो बताती हैं, "मेरे पोते और दामाद मुझे बुरी तरह मारते जा रहे थे. कहते जा रहे थे, हम तुम्हें मार देंगे | मेरी उम्र हो चुकी है और मैं अपना बचाव नहीं कर पा रही थी. मेरे शरीर पर कई जगह से खून निकल रहा था, इसके बाद उन्होंने मुझे किसी गठरी की तरह कार में फेंका और मेरी बेटी के घर लाकर पटक दिया."
जब तीस साल पहले जब हेल्पएज इंडिया ने वृद्ध आश्रम तैयार किए थे तो लोगों ने कहा था कि ये तो पश्चिमी तरीका है, लेकिन आज हर कोई मान रहा है ये पश्चिमी तरीका नहीं, ये हक़ीकत है |
लेकिन लक्ष्मी के पोते विनय पालेजा इन आरोपों से इनकार करते हैं | उनका कहना है, "मैंने तो अपनी दादी को हाथ तक नहीं लगाया. उन्होंने खुद अपने आप को घायल कर लिया है | मुझे नहीं मालूम कि वो हम लोगों के ख़िलाफ़ इस तरह के आरोप क्यों लगा रही हैं |" अपनी बेटी के घर इलाज करा रहीं लक्ष्मीबाई का कहना है कि उनके पास अब कुछ नहीं बचा है | इस बुज़ुर्ग महिला के पास जो थोड़ी बहुत ज़मीन और सोना था वो उन्होंने अपने और अपने बेटे के इलाज के लिए बेच दिया, लेकिन उनके परिवार ने उनके इलाज के लिए एक पैसा ख़र्च नहीं किया | ये मामला अब अदालत में जाएगा, लेकिन कानून की धीमी गति देखकर लगता नहीं कि इंसाफ़ पाने तक लक्ष्मीबाई ज़िंदा रह पाएँ |प्रतिदिन वृद्ध आश्रमों की संख्या बढने का कारण टूटते संयुक्त परिवार हैं | भारत में पिछले कुछ सालों में बुज़ुर्गों को मारने-पीटने और घर से निकाल देने के मामले काफ़ी तेज़ी से बढ़े हैं | अगले 25 सालों में भारत में 10 करोड़ से ज़्यादा बुज़ुर्ग होंगे | भारत जिसकी संस्कृति ये है कि बच्चे अपने बुज़ुर्गों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेते हैं. जहाँ संयुक्त परिवार में एक साथ तीन पीढ़ियाँ एक छत के नीचे हंसी-खुशी अपना जीवन यापन करती हैं | ये संयुक्त परिवार बुज़ुर्गों के लिए उनके आख़िरी वक्त में एक बड़ा सहारा हुआ करते थे, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं | ज़्यादा से ज़्यादा बच्चे अब अपनी ज़िंदगी को बेहतर बनाने के लिए अपने पैतृक घरों को छोड़ रहे हैं | समाजशास्त्रियों का मानना है कि नौजवानों में आधुनिक तौर-तरीके से जीने की ललक और व्यक्तिगत ज़िंदगी गुज़ारने की सोच की वजह से बुज़ुर्ग इस तरह से जीने के लिए मजबूर हैं | कई मामलों में तो उन्हें बुरी-बुरी गालियाँ तक सुननी पड़ती हैं | वृद्धों के साथ हो रहे सौतेले बर्ताव को देखते हुए भारत सरकार ने पिछले दिनों एक नया विधेयक भी तैयार किया था | इस विधेयक में स्पष्ट कहा गया है कि हम संयुक्त परिवार का ढांचा दोबारा नहीं विकसित कर सकते, लिहाज़ा हमें और वृद्ध आश्रम बनाने होंगे | सरकार ने बुज़ुर्गों और माता-पिता के कल्याण के लिए तैयार किए इस विधेयक के मुताबिक ऐसे बच्चों को तीन महीने की सज़ा भी हो सकती है जो अपने माता-पिता की देखरेख से इनकार करते हैं | इस क़ानून के मुताबिक अदालत अगर आदेश देती है तो बच्चों को अपने बुज़ुर्गों के लिए भत्ता भी देना होगा | भारत में बुज़ुर्गों की मदद के लिए काम करने वाली स्वयं सेवी संस्था हेल्पएज इंडिया की शोध बताती है कि अपने परिवार के साथ रह रहे क़रीब 40 प्रतिशत बुज़ुर्गों को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है | लेकिन छह में से सिर्फ़ एक मामला ही सामने आ पाता है | दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ नागरिक सेल के केवल सिंह मानते हैं कि बुज़ुर्ग माता-पिता के लिए अपने बच्चों के ख़िलाफ़ ही शिकायत करना काफ़ी मुश्किल होता है | केवल सिंह कहते हैं, "जब इस तरह के बुज़ुर्ग अपने बच्चों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज कराने का फ़ैसला कर लेते हैं तो उनका रिश्ता अपने परिवार से पूरी तरह टूट जाता है" उनका कहना था, "इस तरह के मामलों में हमेशा क़ानून और जज़्बात के बीच द्वंद्व चलता रहता है" कुछ इसी तरह का मामला दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के इरोड शहर में भी पेश आया | यहाँ 75 साल की एक वृद्ध महिला शहर के बाहरी हिस्से में पड़ी पाई गई थी | लोगों का आरोप था कि उनके नाती और दामाद ने उन्हें वहाँ लाकर डाल दिया था. कुछ दिनों के बाद इस वृद्धा की मौत हो गई थी | लेकिन उनकी बेटी तुलसी का कहना था, "मेरी माँ कई वर्षों से मेरे साथ रह रही थी लेकिन एक रात वो अचानक बड़बड़ाने लगी और पूरी रात बोलती ही रहीं | हमने उन्हें मना भी किया लेकिन वो नहीं मानीं और अचानक घर छोड़कर चली गईं" ग़रीबी और रोज़गार की तलाश में बच्चों के बाहर जाने की वजह से बुज़ुर्गों को इस तरह का बर्ताव झेलना पड़ रहा है, सरकार ने सख्त कानून भी बनाया है लेकिन हल दिखाई नहीं देता | भारत में सात करोड़ से ज़्यादा आबादी बुज़ुर्गों की है. अगले 25 वर्षों में ये 10 करोड़ तक पहुँच जाएगी | सरकार ने भी देश भर में 600 वृद्ध आश्रम तैयार कराने को मंज़ूरी दे दी है | हेल्पएज इंडिया के मैथ्यू चेरियन का मानना है कि क़ानून बनाने से ये समस्या हल नहीं होने वाली है | उनका कहना है,'' आप परिवारों को टूटने से नहीं रोक सकते. हम संयुक्त परिवार का ढांचा दोबारा नहीं विकसित कर सकते, लिहाज़ा हमें और वृद्धआश्रम बनाने होंगे, तीस साल पहले जब हेल्पएज इंडिया ने वृद्ध आश्रम तैयार किए थे तो लोगों ने कहा ये तो पश्चिमी तरीका है, लेकिन आज हर कोई मान रहा है ये पश्चिमी तरीका नहीं, ये हक़ीकत है |"
अत: मेरा यही मानना है कि आज के सामाजिक परिवेश में वृद्ध आश्रम व्यवस्था उचित है |

विपक्ष में विचार--

हमारे समाज में वृद्धों को सम्मान का पात्र बताया गया है, लेकिन शास्त्रों में भी इस अवस्था का चित्रण है और वह अत्यंत दयनीय है । उसे सुनकर भी वृद्धों की घबराहट बढ़ जाती है । एक वर्णन देखिए:- वैराग्य शतक में भर्तृहरि लिखते हैं, ' शरीर पर झुर्रियां पड़ गई हैं । चलने- फिरने की सामर्थ्य समाप्त हो गई है। दाँत टूट गए हैं, दृष्टि नष्ट हो गई है । पत्नी भी सेवा नहीं करती । पुत्र भी शत्रु जैसा व्यवहार करता है । '
क्या यह वर्णन सही है ? अधिकांश का उत्तर होगा , हाँ ! पर ऐसा है नहीं है । यदि ऐसा है तो उसके अन्य कारण हैं । यह सच है कि वर्तमान में अधिकांश वृद्ध दुखी हैं और तनावग्रस्त हैं । जिन वृद्धों के पुत्र उनकी भावनाओं का सम्मान नहीं करते, वे जमाने को कोसते हुए दुखी हैं और जो वृद्ध पुत्रों के ताने सुनकर उनके साथ रहने को मजबूर हैं, वे भी दुखी हैं । अपने परिवार के लिए खून-पसीना बहाकर, पेट काटकर, झूठे-सच्चे धंधे कर जिन्होंने कल्पना की थी कि वृद्धावस्था में उनका परिवार उनकी सेवा करेगा, वे निराश हैं । यह सेवा मिल नहीं रही, लेकिन उन्हें स्मरण रखना चाहिए कि बेटों को पालना उनका कर्तव्य था । वह कोई उद्योग-धंधों में किया गया निवेश नहीं था । भगवान कृष्ण ने इसीलिए कर्म पर अधिकार बताया है, फल पर नहीं ।
ऋषि- मुनियों ने इस परिस्थिति को समझा था । इसलिए वानप्रस्थ में वृद्धों के आश्रम में रहने की व्यवस्था बनाई, जिसमें वृद्ध जन , परिवार के मायामोह से दूर निकलें और वृहद समाज के कल्याण में सक्रिय हों । जो वृद्ध आज की स्थिति को जान-समझकर, किसी अलग स्तर पर सक्रिय हैं- वे बिल्कुल तनावग्रस्त या दुखी नहीं हैं । किंतु जो धन, मकान, जायदाद और परिवार के मोह में फंसे हुए हैं, उनका दुखी होना स्वाभाविक है । जो वृद्ध सामाजिक या राजनीतिक कार्यों में लगे हैं, उन्हें शिकायत करने का समय ही नहीं है ।
दुनिया में अनेक राजनेता हैं, जो वृद्ध हैं । यदि आप सोचें कि नेताओं को मिलने वाली सुविधाएं और सम्मान उन्हें प्रसन्न रखते हैं, तो ऐसे भी अनेक उदाहरण हैं, जो राजनेता नहीं है, लेकिन बुढ़ापे में भी अपना जीवन अत्यंत उत्साह से जी रहे हैं । प्रसिद्ध ज्योतिषी कीरो ने अस्सी वर्ष की उम्र में फ्रेंच सीखना आरंभ किया । लोगों ने 
कीरो से पूछा, ' इस उम्र में इसका क्या लाभ ?' कीरो ने हंसकर जवाब दिया, ' माया-मोह , ईर्ष्या-द्वेष सीखने से तो फ्रेंच सीखना ही अच्छा है । महात्मा गाँधी व संत विनोबा अंतिम समय तक संस्कृत और उर्दू पढ़ते रहे। सिसरो ने 63 वर्ष की उम्र में अपना एक ग्रंथ पूरा किया और कहा, अब लग रहा है कि अपने पीछे दुनिया के लिए कुछ छोड़ रहा हूँ । अतिवृद्धावस्‍था को झेल रहे लोगों का जीवन हमारे सामने एक भयावह सच उपस्थित करता है, जिसे देखकर हम कांप से जाते हैं । हमारे बुजुर्गों की 50 से 70 वर्ष की उम्र तक के वर्ग के अनुभवों द्वारा अपने से बडों की सीख के महत्‍वपूर्ण होने से इंकार नहीं किया जा सकता। इसलिए इस उम्र के लोगों के अनुभव से लाभ उठाते हुए उनकी हर बात में से कुछ न कुछ सीखने की प्रवृत्ति व्‍यक्ति को विकसित करनी चाहिए । पर जब हम स्‍वयं 50 वर्ष के हो जाते हैं, तो बडों के समान हमारे विचारों का भी पूरा महत्‍व हो जाता है , हां 60 वर्ष की उम्र तक के व्‍यक्ति से उन्‍हें कुछ सीख अवश्‍य लेनी चाहिए। पर 60 वर्ष की उम्र के बाद धर्म , न्‍याय आदि गुणों की प्रधानता उनमें दिख सकती है , पर सांसारिक मामलों की सलाह लेने लायक वे नहीं होते हैं।पर जब उम्र बढती हुई 70 वर्ष के करीब या पार कर जाती है , तो व्‍यक्ति के स्‍वास्‍थ्‍य के साथ ही साथ उसकी मानसिकता बहुत अधिक बदल जाती है। इन अतिवृद्धों के शारीरिक या मानसिक कमजोरियों के बोझ को न उठाना हमारी कायरता ही मानी जाएगी। आखिर बचपन में उन्‍होने हमें उससे भी अधिक लाचार स्थिति में संभाला है। ऐसे बुजुर्गों को उनके किसी रूचि के कार्य में उलझाए रखना अति उत्‍तम होता है। पर यदि वे कुछ करने से भी लाचार हो , तो उनका ध्‍यान रखना हमारा कर्तब्‍य है। यदि वे दिन भर सलाह देने का काम करते हों , जिनकी आज कोई आवश्‍यकता नहीं , तो बेहतर होगा कि हम एक कान से उनकी बात सुने और दूसरे ही कान से निकाल दें , पर किसी प्रकार की बहस कर उनका मन दुखाना उचित नहीं है , बस उनकी आवश्‍यकता की पूर्ति करते रहें , वे खुश रहेंगे !!वैदिक काल में सौ वर्ष की आयु को अच्छी आयु समझा जाता था । इसीलिए सौ वर्ष की आयु की कामना व्यक्त की गयी है, वह भी पूर्ण कायिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के साथ । वैदिक काल से ही मनुष्य जीवन में यह इच्छा व्यक्त की गयी है कि हमें पूर्ण स्वास्थ्य के साथ सौ वर्ष का जीवन मिले, और यदि हो सके तो सक्षम एवं सक्रिय इंद्रियों के साथ जीवन उसके आगे भी चलता रहे ।
ऋग्वेद में भी उपर्युक्त आाशय वाली ऋचा का उल्लेख कर रहा हूं ।
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
(ऋग्वेद मंडल 1, सूक्त 89,
उपर्युक्त ऋचा का भावार्थ:-- हे देववृंद, हम अपने कानों से कल्याणमय वचन सुनें । जो याज्ञिक अनुष्ठानों के योग्य हैं (यजत्राः) ऐसे हे देवो, हम अपनी आंखों से मंगलमय घटित होते देखें । नीरोग इंद्रियों एवं स्वस्थ देह के माध्यम से आपकी स्तुति करते हुए (तुष्टुवांसः) हम प्रजापति ब्रह्मा द्वारा हमारे हितार्थ (देवहितं) सौ वर्ष अथवा उससे भी अधिक जो आयु नियत कर रखी है उसे प्राप्त करें (व्यशेम) । तात्पर्य है कि हमारे शरीर के सभी अंग और इंद्रियां स्वस्थ एवं क्रियाशील बने रहें और हम सौ या उससे अधिक लंबी आयु पावें ।

वृद्धावस्था कोई अपराध नहीं है । अपितु झुर्रियों से भरे चेहरे और हाथों में भी एक आकर्षक सौंदर्य होता है । आशीर्वाद का उठा हाथ ही युवकों के लिए पर्याप्त है । आगे की पीढ़ी अपना कर्तव्य करती है या नहीं, इसकी चिंता आप क्यों करते हैं । हर व्यक्ति अपने कर्म आप ही भुगतता है । अतएव मेरा यही मानना है कि आज के सामाजिक परिवेश में वृद्ध आश्रम व्यवस्था उचित नहीं है |

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