सोमवार, 23 मई 2011

**इमरोज़-अमृता का सशक्त रूहानी-रिश्ता**

आज तक हमने आम समझ से बस यही जाना है कि इमरोज़ अमृता प्रीतम को प्यार करते थे ..... प्यार ! लेकिन कैसा प्यार....??? यह समझ पाने में असमर्थ रहे....
यह रिश्ता जिस्म से जिस्म का नहीं, रूह से रूह का है ! आम सोच, सतही ख्यालों से बहुत ऊपर.........



"अमृता जब भी खुश होती-
मेरी छोटी-छोटी बातों पर
तो वो कहती-
वे रब तेरा भला करे।
और मैं जवाब में कहता हूँ-
मेरा भला तो
कर भी दिया रब ने
तेरी सूरत में
आकर..."





एक ज़िन्दगी ख़त्म होते हम उसे अतीत बना देते हैं , इमरोज़ अपने सशक्त रूहानी-काव्य के माध्यम से अमृता प्रीतम को लेकर आज भी आज में जीते हैं, बिल्कुल अपने नाम की तरह !
जिस इन्सान ने रूह के रिश्तों को नहीं सीखा, वह नज़्मों की सौगात भला क्या पायेगा ! ज़ब भी इमरोज़ का मन अशांत हुआ तो मन और रिश्तों के बीच आ गई, पर यह रिश्तों का संसार इमरोज़ का है , जहाँ उनकी कलम बोलती है-
"ज़िंदगी खेलती है
पर हमउम्रों से...
कविता खेलती है
बराबर के शब्दों से, ख़यालों से
पर अर्थ खेल नहीं बनते
ज़िंदगी बन जाते हैं...
रात-दिन रिश्ते भी खेलते हैं
सिर्फ़ मनचाहों से
उम्रें कोई भी हों
ज़िंदगी में मनचाहे रिश्ते
अपने आप हमउम्र हो जाते हैं..."
अमृता-साहिर-इमरोज के कई किस्से-कहानियाँ हवाओं में खुशबू की तरह बिखरे हैं। वे गाहे-बगाहे सुंदर-कोमल फूलों की तरह लोगों की स्मृतियों में खिलते रहते हैं। एक बार किसी ने इमरोज़ से पूछा कि आप जानते थे कि अमृताजी साहिर से दिली लगाव रखती हैं और फ़िर साजिद पर भी स्नेह रखती हैं आपको यह कैसा लगता है ?
इस पर इमरोज़ जोर से हँसे और बोले कि "एक बार अमृता ने मुझसे कहा था कि अगर वे साहिर को पा लेतीं तो मैं उनको नही मिलता तो मैंने उनको जवाब दिया था कि तुम तो मुझे जरूर मिलतीं चाहे मुझे तुम्हें साहिर के घर से निकालकर लाना पड़ता, जब हम किसी को प्यार करते हैं तो रास्ते की मुश्किल को नहीं गिनते। मुझे मालूम था कि अमृता साहिर को कितना चाहती थीं लेकिन मुझे यह भी बखूबी मालूम था कि मैं अमृता को कितना चाहता था !"

इमरोज़ ने अपने एक लेख 'मुझे फिर मिलेगी अमृता' में अपने 'रूहानी-रिश्ते' की मजबूती का परिचय देते हुए कुछ यूं लिखा है---
कोई भी रिश्ता बाँधने से नहीं बँधता। प्रेम का मतलब होता है एक-दूसरे को पूरी तरह जानना, एक-दूसरे के जज़्बात की कद्र करना और एक-दूसरे के लिए फ़ना होने का जज़्बा रखना। अमृता और मेरे बीच यही रिश्ता रहा। पूरे 41 बरस तक हम साथ-साथ रहे। इस दौरान हमारे बीच कभी किसी तरह की कोई तकरार नहीं हुई। यहाँ तक कि किसी बात को लेकर हम कभी एक-दूसरे से नाराज़ भी नहीं हुए।इसके पीछे एक ही वजह रही कि वह भी अपने आप में हर तरह से आज़ाद रही और मैं भी हर स्तर पर आज़ाद रहा। चूँकि हम दोनों कभी पति-पत्नी की तरह नहीं रहे, बल्कि दोस्त की तरह रहे, इसलिए हमारे बीच कभी किसी किस्म के इगो का खामोश टकराव भी नहीं हुआ। न तो मैं उसका मालिक था और न ही वह मेरी मालिक। वह अपना कमाती थीऔर अपनी मर्ज़ी से खर्च करती थीं। मैं भी अपना कमाता था और अपनी मर्ज़ी से खर्च करता था।
दरअसल, दोस्ती या प्रेम एक अहसास का नाम है। यह अहसास मुझमें और अमृता, दोनों में था, इसलिए हमारे बीच कभी यह लफ्ज़ भी नहीं आया कि आय लव यू। न तो मैंने कभी अमृता से कहा कि मैं तुम्हें प्यार करता हूँ और न ही अमृता ने कभी मुझसे। एक बार एक सज्जन हमारे घर आए। वे हाथ की रेखाएँ देखकर भविष्य बताते थे। उन्होंने मेरा हाथ देखा और कहा कि तुम्हारे पास पैसा कभी नहीं टिकेगा क्योंकि तुम्हारे हाथ की रेखाएँ जगह-जगह टूटी-कटी हैं। उसने अमृता का हाथ देखकर कहा कि तुमको ज़िंदगी में कभी पैसे की कमी नहीं रहेगी। इस पर मैंने अमृता से उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा कि ऐसा है, तो हम दोनों एक ही हाथ की रेखा से ही गुज़ारा कर लेंगे। हम दोनों हमेशा दोस्त की तरह रहे।
एक ही घर में, एक ही छत के नीचे रहे, फिर भी कभी एक कमरे में नहीं सोए क्योंकि मेरा और उसका काम करने का वक्त हमेशा अलग रहता था। मैं रात बारह-एक बजे तक काम करता और फिर सो जाता था। जबकि अमृता, बीमार पड़ने और बिस्तर पकड़ने के पहले तक, रात को आठ-नौ बजे तक सो जाती थी और देर रात एक-डेढ़ बजे उठकर अपना लिखने का काम शुरू करती थी, जो सुबह तक चलता रहता था।
हम दोनों ने जब साथ रहना शुरू किया, तब अमृता दो बच्चों की माँ बन चुकी थीं। हालाँकि, शुरुआती दौर में बच्चों ने हमारे साथ-साथ रहने को कबूल नहीं किया। लेकिन उन्हें एतराज़ करने की गुंजाइश भी नहीं मिली। क्योंकि न तो उन्होंने कभी हमें लड़ते-झगड़ते देखा था और न ही हमारे बीच कभी किसी किस्म का टकराव या मनमुटाव पनपते हुए महसूस किया था। धीरे-धीरे उन्होंने भी हमारा साथ रहना कबूल कर लिया।
अमृता के जीवन में एक छोटे अरसे के लिए साहिर लुधियानवी भी आए, लेकिन वह एक तरफ़ा मुहब्बत का मामला था। अमृता साहिर को चाहती थी, लेकिन साहिर फक्कड़ मिज़ाज था। अगर साहिर चाहता, तो अमृता उसे ही मिलती, लेकिन साहिर ने कभी इस बारे में संजीदगी दिखाई ही नहीं। एक बार अमृता ने हँस कर मुझसे कहा था कि अगर मुझे साहिर मिल जाता, तो फिर तू न मिल पाता।
इस पर मैंने कहा था कि मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज़ अदा करते हुए ढूँढ़ लेता। मैंने और अमृता ने 41 बरस तक साथ रहते हुए एक-दूसरे की प्रेजेंस एंजॉय की। हम दोनों ने खूबसूरत ज़िंदगी जी। दोनों में किसी को किसी से कोई शिकवा-शिकायत नहीं रहीं। मेरा तो कभी ईश्वर या पुनर्जन्म में भरोसा नहीं रहा, लेकिन अमृता का खूब रहा है और उसने मेरे लिए लिखी अपनी आख़िरी कविता में कहा है, मैं तुम्हें फिर मिलूँगी। अमृता की बात पर तो मैं भरोसा कर ही सकता हूँ।

अमृता के लिए इमरोज़ की कविता--
"अब ये घोसला घर चालीस साल का हो चुका है
तुम भी अब उड़ने की तैयारी में हो,
इस घोसला घर का तिनका-तिनका,
जैसे तुम्हारे आने पर सदा,
तुम्हारा स्वागत करता था,
वैसे ही इस उड़ान को,
इस जाने को भी,
इस घर का तिनका-तिनका
तुम्हें अलविदा कहेगा।"
— इमरोज

4 टिप्‍पणियां:

  1. उसने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं
    वो अक्सर मिलती है
    कभी तारों की छांव में
    कभी बादलों की छांव में
    कभी किरणों की रोशनी में
    कभी ख्यालों के उजालों में

    हम पहले की तरह मिलकर
    कुछ देर चलते रहते हैं
    फिर बैठकर एक-दूजे को
    देख-देख, चुपचाप कुछ कहते रहते है
    और कुछ सुनते रहते हैं

    वह मुझे अपनी नयी अनलिखी
    कविता सुनाती है
    मैं भी उसको अपनी अनलिखी
    नज़्म सुनाता हूँ

    वक़्त पास खड़ा ये अनलिखी शायरी
    सुनता-सुनता, अपना रोज़ का नियम
    भूल जाता है.............

    जब वक़्त को याद आता है
    कभी शाम हो गयी होती है
    कभी रात उतर आयी होती है
    और कभी दिन चढ़ आया होता है
    उसने सिर्फ जिस्म छोड़ा है
    साथ नहीं........

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  2. परम उपकारी गुरु के चरणों में वन्दना,
    आपकी कलम से यूँ ही प्रखर रचनाधर्मिता निरंतर प्रवाहित होती रहे |

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  3. बहुत ही सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रचना लिखा है! बधाई!
    इसे यहाँ हम सबके साथ बांटने का शुक्रिया...बहुत पवित्र एहसास....

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  4. आदरणीय श्री को सादर प्रणाम,
    गजब के भाव ... गहरी संवेदनाओं का सागर है यह रचना ... |||
    प्यार के कितने रंग हैं और कितनी दिशाएँ और कितनी ही सीमायें हैं...कौन जान सकता है...पिछले दिनों देश की जिन शीर्ष हस्तियों को पद्मविभूषण सम्मान से नवाज़ा गया उनमें एक नाम अमृता प्रीतम का भी था | विडंबना यह थी कि अमृता प्रीतम अपनी ख़राब हालत की वजह ये सम्मान लेने जा नहीं सकती थीं और सरकार को भी न तो सम्मान बाँटते वक़्त अमृता प्रीतम की याद आई और न ही किसी ने उन तक यह सम्मान पहुँचाने की ज़रूरत ही समझी | हालाँकि जब भारतीय समाचार पत्रों में इसकी ख़बरें छपीं तो आनन-फानन में सरकार के एक सचिव अमृता प्रीतम को उनके घर पर ही ये सम्मान दे आए | पर इन सब से बेख़बर अमृता सूजी का उपमा और ग्लूकोज़ के घोल के सहारे अपने दिन गुज़ार रही थी |
    बहुत कम लोगों के देखे हुए सपने साकार हो पाते हैं ....
    आपके जरिये हम भी इमरोज़जी और उनकी नज्मों से परिचित हुए ...ब्लोगिंग बहुत हद तक ऐसे मुलाकातों के सपने पूरे कर रही है ..
    सपनो से हकीकत और हकीकत को
    जादुई शब्दों का लिबास , जो आपने पहनाया है
    अपनी इस हकीकत में, कमाल का है
    बधाई ||||||

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