शनिवार, 19 नवंबर 2011

'वर्तमान भारत में भ्रष्टाचार का निदान'


प्रस्तुत आलेख 'फेसबुक' पर लगभग एक वर्ष पूर्व प्रस्तुत किया था, आज पुन: प्रस्तुत कर रहा हूँ |आप सभी से निवेदन है कि आप अपने विचार अवश्य प्रदान करें.....





( on Saturday, December 11, 2010 at 11:19am)
हमारे सपनों के प्यारे देश भारत में वैसे तो अनेक समस्याएं विद्यमान हैं जिसके कारण देश की प्रगति धीमी है। उनमें प्रमुख है बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा, आदि लेकिन उन सबमें वर्तमान मेंसबसे ज्यादा यदि कोई देश के विकास को बाधित कर रहा है तो वह है भ्रष्टाचार की समस्या। आज इससे सारा देश संत्रस्त है। लोकतंत्र की जड़ो को खोखला करने काकार्य काफी समय से इसके द्वारा हो रहा है।आज जबकि कदम-कदम पर लोगों के मान-सम्मान को बेरहमी से कुचला जा रहा है। अधिकतर लोगों के कानूनी, संवैधानिक, प्राकृतिक एवं मानव अधिकारों का खुलेआम हनन एवं अतिक्रमण हो रहा है। हर व्यक्ति को मनमानी, गैर-बराबरी, भेदभाव एवं भ्रष्टाचार का सामना करना पड रहा है।
यह दयनीय स्थिति सिर्फ एक दिन में ही नहीं बनी है। भारत को जैसे ही अंग्रेजी दासता से मुक्ति मिलने वाली थी उसे खुली हवां में सांस लेने का मौका मिलने वाला था उसी समय सत्तालोलुप नेताओं ने देश का विभाजन कर दिया और उसी समय स्पष्ट हो गया था कि कुछ विशिष्ट वर्ग अपनी राजनैतिक भूख को शांत करने के लिए देश हित को ताक मे रखने के लिए तैयार हो गये हैं। खैर बीती ताहि बिसार दे। उस समय की बात को छोड वर्तमान स्थिति में दृष्टि डालें तो काफी भयावह मंजर सामने आता है। भ्रष्टाचार ने पूरे राष्ट्र को अपने आगोश में ले लिया है। वास्तव में भ्रष्टाचारके लिए आज सारा तंत्र जिम्मेदार है।ऐसी अनेकों प्रकार की नाइंसाफी, मनमानी एवं गैर-कानूनी गतिविधियाँ केवल इसलिये ही नहीं चल रही हैं कि सरकार एवं प्रशासन में बैठे लोग निकम्मे, निष्क्रिय और भ्रष्ट हो चुके हैं, बल्कि ये सब इसलिये भी तेजी से फल-फूल रहे हैं, क्योंकि हम आजादी एवं स्वाभिमान के मायने भूल चुके हैं। सच तो यह है कि हम इतने कायर, स्वार्थी और खुदगर्ज हो गये हैं कि जब तक हमारे सिर पर नहीं आ पडती, तब तक हम इनके बारे में सोचते ही नहीं! इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि गैर-कानूनी कार्यों में लिप्त लोगों के राजनैतिक एवं आपराधिक गठजोड की ताकत के कारण आम व्यक्ति इनसे बुरी तरह से भयभीत हैं और इनका सामना करने की सोचते हुए भी डरने लगता हैं। यह जानते हुए भी कि सर्प चूहों को अक्सर उनके बिलों में ही दबोचते हैं। फिर भीहम चूहों की तरह अपने घरों में, स्वयं को पूरी तरह सुरक्षित समझ कर दुबके हुए हैं ।
यदि हम इसी प्रकार से केवल आत्म केन्द्रित होकर स्वार्थपूर्ण सोच रखे रहे , तो हमारे सामने भी भ्रष्टाचार अनेक रूप में सामने आएगा ,
यथा----
(1.)हम या हमारा कोई अपना, बीमार हो और उसे केवल इसलिये नहीं बचाया जा सके, क्योंकि उसे दी जाने वाली दवायें उन अपराधी लोगों ने नकली बनायी हों, जिनका हम विरोध नहीं कर पा रहे हैं?
(2.)हम कोई अपना, किसी भोज में खाना, खाने जाये और खा वस्तुओं में मिलावट के चलते, वह असमय ही तडप-तडप कर बेमौत...!
(3.)हम कोई अपना, बस यात्रा में हो और बस मरम्मत करने वाले मिस्त्री द्वारा उस बस में नकली पुर्जे लगा दिये जाने के कारण, वह बस बीच रास्ते में दुर्घटना हो जाये और...?
(4.)हम अपने वाहन में पेट्रोल या डीजल में घातक जहरीले कैमीकल द्रव्यों की मिलावट के कारण बीच रास्ते में वाहन के इंजन में आग लग जाये और...?
(5.)जब हम या हमारा कोई आत्मीय किसी बीमारी या दुर्घटना के कारण किसी अस्पताल में भर्ती हो और भ्रष्ट डॉक्टर बिना रिश्वत लिये तत्काल उपचार या ऑपरेशन करने से मना करे दे या लापरवाही, अनियमितता या विलम्ब बरते और...?
(6.)जब हम या कोई आत्मीय रेल यात्रा करे और रेल की दुर्घटना हो जाये, क्योंकि रेल मरम्मत कार्य करने के लिये जिम्मेदार लोग मरम्मत कार्य किये एवं संरक्षा सुनिश्चित किये बिना ही वेतन उठाते हों! और दुर्घटना में...!
सर्वे में सामने आया कि रिश्वत विभिन्न मकसदों को पूरा करने के लिहाज से मांगी जाती है। करीब 70 प्रतिशत बार रिश्वत लेने के मामले ऐसे होते हैं जब इन्हें किसी भी तरह का नुकसान न हो उसके एवज में लिया जाता है। 12 प्रतिशत रिश्वत के मामले व्यक्तिगत और व्यावसायिक फायदे के लिए किया जाता है। जबकि चीन में 54 प्रतिशत मामले ऐसे होते हैं जिसमें 54 प्रतिशत मामले किसी भी तरह के नुकसान से बचाने के लिए होते हैं ।
अभी अक्तूबर,२०१० में देहली में सम्पन्न हुए कॉमनवेल्थ गेम्स से ‘हे प्रभु’ नित्य-प्रतिदिन इतने झोल,भ्रष्टाचार और इतने घोटाले उजागर हो रहे है....मन करने लगा है कि इन प्रतिनिधियों से जा कर कहे “जब जिगर में नही था बूता , तो फिर लंका में क्यों कूदा?" जिस क्षेत्र में जो योग्य हो वही पैर रखा करे वरना अपनी क्षमता के अनुसार दूसरे क्षेत्र में जाया करे ! कॉमनवेल्थ गेम्स से तो ये बात सर्वविदित हो ही गयी है की ज़िम्मेदार पदों पर कितने गैर ज़िम्मेदार लोग बैठे है ! एक दूसरा रूप यह भी देखने को मिलता है की भ्रष्टाचार कितने उच्च स्तर तक है ! गेम्स की योजना बनने से पहले ही टेंडर फिक्स हो गये तैयारिया अभी तक पूरी नही हुई वो भी तब जब की यह देश की प्रतिष्टा का विषय है ! हमारे देश में कमी किस चीज़ की है?- धन की या जनबल की ? हमारे देश का ब्रेन दूसरे देशो में फल-फूल रहा है और अपने यहाँ ही प्रयोग नही होता अगर ऐसे समय में प्रशासनिक अधिकारी नही मिलते है तो पद रिक्तियां दो आज बहुत सा ऐसा युवा है जिसे आज बस मोहर (सिलेकशन रुपी) नही मिली वरना वो भी I.A.S. या I.P.S .ही है ! भ्रष्टाचार का जो खुल्लम-खुल्ला रूप इस बहाने दिख रहा है उसे हमारी माननीय सरकार नही देख रही है, तो हर कोई समझ सकता है की एक विभाग में होने वाले भ्रष्टाचार भला कैसे उजागर हो पाते होंगे !
भ्रष्टाचार के निरंतर बढ़ते हुए प्रभाव के बावजूद यदि हम नाइंसाफी के विरुद्ध, पूरी ताकत के साथ और दिल से बोलना शुरू करें, अपनी बात कहने में हिचकें नहीं, तो अभी भी बहुत कुछ ऐसा बचा हुआ है,जिसे बचाया जा सकता है, लेकिन हम इसी तरह से आत्मकेंद्रित होकर विचार करते रहें कि मुझे झंझट में पड़कर क्या करना है तो वह दिन दूर नहीं जबकि स्थितियां भयावह रूप में हमारे समक्ष होंगी:-
(1.)आपको अपने मुकमदे की शीघ्र सुनवायी या शीघ्र फैसला करवाने के लिये भी शुल्क देना पडेगा !
(2.)अस्मत लुटने पर भी पुलिस वाले रिपोर्ट लिखने से साफ इनकार कर दें और कहें कि पहले रिशवत दो, तब ही मुकदमा दर्ज होगा?
(3.)राशन की दुकान वाला गरीबों को मिलने वाले सारे के सारे राशन को ही काला बाजारियों के हवाले कर दे और गरीब लोग भूख से तडत-तडप कर मर जायें?
(4.)किसी साधारण या बीपीएल परिवार के व्यक्ति के बीमार होने पर, बिना रिश्वत दिये सरकारी अस्पताल में भी इलाज करने से साफ इनकार कर दिया जावे?
(5.)आवासीय विद्यालयों में पढने जाने वाली छाताओं की, उनके विद्यालय संरक्षक स्वयं ही अस्मत लूटने और बेचने लगें ?
(6.)सीमा पर तैनात सेना अधिकारी या कोई सेना अध्यक्ष पडौसी दुश्मन देश से रिश्वत लेकर, देश की सीमाओं को उस देश की सेनाओं के हवाले कर दें?
मशहूर वकील राम जेठमलानी का कहना है कि भारतीय सरकार स्विस बैंकमें जमा 1500 बिलियन डॉलर की रकम को लाने को लेकर अधिक गंभीर नहीं है। जेठमलानी का कहना है कि अगर ये रकम भारत आ जाती है तो देश तीस साल तक कर के बोझ से मुक्त हो जाएगा। यही नहीं सरकार इस बात का भी खुलासा नहीं कर रही है कि किन लोगों ने स्विस बैंक में अपनी रकम छिपा रखी है। जेठमलानी ने इस बात को लेकर एक जनहित याचिका दायर कर रखी है कि सरकार उन नामों का खुलासा करें जिन्होंने स्विस बैंक में अपने पैसे जमा कर रखे है। जेठमलानी ने पूरे वकील समुदाय से इस बात की अपील की कि सभी साथ मिलकर स्विस बैंक से काले धन को लाने में सहयोग करें ।
भ्रष्टाचार के इस रोग के कारण हमारे देश का कितना नुकसान हो रहा है, इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है. पर इतना तो साफ़ दिखता है कि सरकार द्वारा चलाई गयी अनेक योजनाओं का लाभ लक्षित समूह तक नहीं पहुँच पाता है ! इसके लिये सरकारी मशीनरी के साथ ही साथ जनता भी दोषी है ! सूचना के अधिकार का कानून बनने के बाद कुछ संवेदनशील लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध सामने आये हैं, जिससे पहले स्थिति सुधरी है. पर कितने प्रतिशत? यह कहना मुश्किल है ! जिस देश में लोगों द्वारा चुने गये प्रतिनिधि ही लोगों का पैसा खाने के लिये तैयार बैठे हों, वहाँ इससे अधिक सुधार कानून द्वारा नहीं हो सकता है !वास्तव में देश से यदि भ्रष्टाचार मिटाना है तो ने सिर्फ साफ स्वच्छ छवि के नेताओंका चयन करना होगा बल्कि लोकतंत्र के नागरिको को भी सामने आना होगा। उन्हें प्राणपण से यह प्रयत्न करना होगा कि उन्हें भ्रष्ट लोगों को समाज से न सिर्फ बहिष्कृत करना होगा बल्कि उच्चस्तर पर भी भ्रष्टाचार में संलिप्त लोगों काबायकॉट करना होगा। अपनी आम जरूरतों को पूरा करने एवं शीर्ध्रता से निपटाने के लिए बंद लिफाफे की प्रवृत्ति से बचना होगा। कुल मिला जब तब लोकतंत्र में आम नागरिक एवं उनके नेतृत्व दोनों ही मिलकर यह नहीं चाहेंगे तब तक भ्रष्टाचार के जिन्न से बच पाना असंभव ही है।
{प्रस्तुत आलेख का कुछ अंश भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान के पूर्व प्रकाशित लेख से साभार है !}
"कोमनवेल्थ गेम्स की आड़ मैं भ्रष्टाचार का नंगा खेल खेला गया वो भी पूरी बेशर्मी के साथ"




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      • Sheetal Jangir बेशक, डॉ.मनोज चतुर्वेदी एक विचारक,चिन्तक और साहित्यकारऐसे हैं; जिनकी रचनाओं में समय और इतिहास की धड़कनों को सुना जा सकता है। विगत पचास-साठ वर्षों में भारत और सम्पूर्ण विश्व में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। बीसवीं शताब्दी उपलब्धियों और हलचलों से भरी शताब्दी रही है। अकेले भारत में अनेकानेक परिवर्तन हुए हैं। इनका इतिहास रोचक और दिलचस्प है। हिन्दी में बहुत कम ऐसे विचारक,चिन्तक और साहित्यकार हैं; जिनकी कृतियों के माध्यम से स्वाधीनता-पूर्व और बाद के राजनीतिक तथा सांस्कृतिक घटनाओं का जायज़ा लिया जा सकता है।
        December 11, 2010 at 11:50am ·  ·  15

      • Anil Kumar Patil प्यारे देश भारत में व्याप्त अंधेरगर्दी और उससे उत्पन्न आमजन की लाचारी को स्वर देतीडॉ.मनोज चतुर्वेदी की रचनाओं आमजन के पक्ष में खड़ी है। उनका मानना था कि जनता का भय ही उसकी विषम परिस्थितियों के लिए जिम्मेदार है, वरना व्यवस्था इतनी ताकतवर नहीं है कि उसे बदला न जा सके। उनका मानना है कि जनता की भूल गलती ही दिल के तख्त पर विराजमान है !
        December 11, 2010 at 11:57am ·  ·  11

      • Raghuveer Saini डॉ.मनोज चतुर्वेदी की रचनाओ में प्राचीन के प्रति आस्था,इतिहास के प्रति गौरव और वर्तमान के प्रति सधी हुई दृष्टि का समन्वय देखने को मिलता है। यह केवल डॉ.मनोज चतुर्वेदी जी है,जिन्होंने प्राचीन और वर्तमान भारतीय साहित्य चिंतन को पूर्ण रूप से आत्मसात् कर मौलिक दृष्टि देने का प्रयास किया है।
        December 11, 2010 at 12:09pm ·  ·  12

      • Rahul Sultania Oh Yes !!!!
        I agree witu you, respected dr.manoj chatuvedi is a great thinker & writer.

        December 11, 2010 at 12:13pm ·  ·  8

      • Anupama Pathak sateek lekh nidaan ki baatein karta hua!!!
        shubhkamnayein!
        aise hi prakhar chintan ka maarg prasasht hota rahe!!

        December 11, 2010 at 1:44pm ·  ·  9

      • Peridon Don Its a great thoughtfull expression,Congrates with so many regards.
        December 11, 2010 at 2:27pm ·  ·  6

      • Kan Singh Panwar Ostra dhanyavad es lekh ke jariye aaj ke bharat ka sabse javlant mudda uthane ke liye , eske saath aapne esse chhutkara pane ke upay bhi bataye hai vo bhi bilkul sahi hai , aam janata ko aapne hako ke liye jagruk hona padega , r t i jaise hathiyaro ka upyog kar bhasta char ko samapt karne ka prayas karna chahiye
        December 11, 2010 at 4:33pm ·  ·  6

      • Rajesh Mishra आदरणीय भाई साहब, गहन चिंतन और क्रांतिकारी विचार! भारतवर्ष के इस गुलशन में पुनर्जागरण की बयार एक बार फिर बह चली है. हमें मिलकर इसकी तीव्रता को बढ़ाना चाहिए और दीमक लगे खोखले पेड़ों को धराशायी कर देना चाहिए. प्रासंगिक एवं प्रेरक लेख के लिए साधुवाद!
        December 12, 2010 at 9:58am ·  ·  8

      • Mahipal Singh Negi bharat men bhrastachar ki jade bahut majbut ho chuki hai unko jad seukhdna bahut muskil hai
        December 12, 2010 at 11:18am ·  ·  5

      • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) ‎*
        आदरणीय मित्रों ,
        इस रचना पर आपकी टिपण्णी का बहुत ही आभारी हूँ, आपकी इस रचना पर की हुई स्तुति और मेरी ओर आपकी भावना पढ़कर मुझे मानो सबकुछ मिल गया !

        December 12, 2010 at 1:34pm ·  ·  10

      • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) ‎*
        यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारे सपनों के प्यारे देश भारत में भ्रष्टाचार पर कोई नियंत्रण नहीं है। राजनीति सेवा की बजाय व्यापार बन गयी है। और यह स्पष्ट है कि जहां व्यापार होगा, वहां भ्रष्टाचार भी होगा। इसीलिए आज नेता शब्द गाली और भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया है।इसलिए राजनीति से अवकाश के साथ ही राजनीति में प्रवेश की भी सीमा निर्धारित होनी चाहिए।

        December 12, 2010 at 7:40pm ·  ·  10

      • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) ‎-
        देश के सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी देश में मौजूद वर्तमान तंत्र के चेहरे पर एक कालिख है जिसे चाहने पर भी साफ नहीं किया जा सकेगा। हो सकता है यह टिप्पणी न्यायालय के रिकॉर्ड का भाग न बने, लेकिन माध्यमों ने इसे स्थाई रूप से रिकॉर्ड का भाग बना दिया है। इस टिप्पणी ने स्पष्ट कर दिया है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध जितने भी उपाय सरकार द्वारा आज तक किए गए हैं वे सिर्फ दिखावा मात्र हैं। उन से भ्रष्टाचार के दैत्य का बाल भी बांका नहीं हो सका है। हाँ दिखावे के नाम पर हर वर्ष कुछ व्यक्तियों को सजाएँ दी जाती हैं। भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए जो-जो भी उपाय किए गये वे सभी स्वयं भ्रष्टाचार की गंगा में स्नान करते दिखाई दिए।

        December 12, 2010 at 8:17pm ·  ·  11

      • Poonam Singh ‎-
        भ्रष्टाचार के विरुद्ध जन-अभियान भी चले लेकिन उन की परिणति ने यह सिद्ध कर दिया कि मौजूदा व्यवस्था के चलते भ्रष्टाचार का कुछ भी नहीं बिगाड़ा जा सकता है। अब तो यदि भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कोई जन-अभियान की आरंभ करता दिखाई पड़े तो लोग उस की मजाक उड़ाते हैं। खुद न्यायपालिका भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है, अपितु वहाँ भी इस की मात्रा में वृद्धि ही हो रही है।

        December 12, 2010 at 8:22pm ·  ·  11

    • Poonam Singh ‎-
      भ्रष्टाचार के दैत्य का बाल भी बांका नहीं हो सका है। हाँ दिखावे के नाम पर हर वर्ष कुछ व्यक्तियों को सजाएँ दी जाती हैं। भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए जो-जो भी उपाय किए गये वे सभी स्वयं भ्रष्टाचार की गंगा में स्नान करते दिखाई दिए।

      December 12, 2010 at 8:27pm ·  ·  11

    • Poonam Singh 
      ‎-
      हे प्रभु, भ्रष्टाचार का अंत कब होगा !!
      चलती भ्रष्टाचार-पथ लोकतंत्र की रेल-
      मजलूमों की चीख से कसती नहीं नकेल।।
      आसमान छूने लगे, सब चीजों के दाम-
      प्रजा नहीं कस पा रही, ढ़ीली भ्रष्ट लगाम।।
      मल्टीनेशनल बुद्ध का लाया धन-पैगाम,
      आमार सोनार बांग्ला रक्तिम नंदीग्राम।।
      सात समंदर क्या यथा- दुखियारों के नैन,
      मनमोहन की बंसरी छीन रही है चैन।।
      राजनीति की नीचता, सभी एक ही रंग-
      टप्पा खाती गिर रही, जनता कटी पतंग।।
      यदि कोई भी चाहता, पूरा दाम वसूल-
      जोधा अकबर की तरह दे दो फिल्मी तूल।।
      संसद बहसों के लिए, रोजाना तैयार-
      मगर एक को छोड़कर, मुद्दा 'भ्रष्टाचार'।।
      हे प्रभु, भ्रष्टाचार का अंत कब होगा !!

      December 12, 2010 at 9:31pm ·  ·  11

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) ‎*
      प्रिय पूनम,
      बहुत सटीक और सारगर्भित व्याख्या करती हो.....,
      तुम्हारे उज्जवल और अर्थपूर्ण भविष्य हेतु मेरा बहुत सारा आशीर्वाद.....
      लोकतंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार के उन्मूलन के बिना गौरवशाली भारत का निर्माण संभव नहीं है। वर्तमान में इलेक्ट्रानिक मीडिया के मजबूत कन्धों की जरुरत है। उसे अन्तर्कलह से बचना होगा। कीचड़ उछालने से कीचड़ की सफाई नहीं हो पाएगी।

      December 12, 2010 at 9:46pm ·  ·  10

    • Sheetal Jangir 
      परम पूजनीय सर और प्रिय पूनम दीदी,
      नमस्ते !
      सर ने सही कहा है, पूनम दीदी बहुत सटीक और सारगर्भित व्याख्या करती हो.....,
      भ्रष्टाचार एक बार फिर गर्म बहस का मुद्दा बन गया है। लेकिन जहां तक राजनीति में भ्रष्टाचार का सवाल है, कोड़ा न पहले हैं और न आखिरी। ऐसा भी नहीं है कि जिनके मामले सामने नहीं आए हैं उनके ईमानदार होने की कोई गारंटी दी जा सकती हो। उच्च व तकनीकी शिक्षण संस्थानों की बात की जाये तो स्पष्ट होता है कि शिक्षण संस्थान अब शिक्षा के मंदिर न रह कर शिक्षा की दुकानों में तबदील हो चुके हैं। आई0आई0एम0 जैसे संस्थानों की सालाना फीस लगभग ढ़ाई लाख रुपया सालाना पहुँच चुकी है, जो दिखाता है कि सामान्य जनता इन संस्थानों में अपने बच्चों के दाखिले का सपना भी नहीं देख सकती, चाहे फिर उनका बच्चा कितना भी मेधावी क्यों न हो। भ्रष्टाचार हटाने के नारे देने वाले ही सबसे ज्यादा भ्रष्ट हैं, समता और समाजवाद का नारा देने वालों ने ही सबसे ज्यादा संपत्ति अर्जित की है वह भी अनैतिक तरीकों से। उनके लिये कोई कानून नहीं है, पहले तो उनके विरुद्ध कोई मामला ही दर्ज नहीं पाता, यदि हो भी जाता है तो सालों लग जाते हैं चार्जशीट आने में, फिर कई वर्षों तक मामला लम्बी न्यायिक प्रक्रिया में रह जाता है और तब तक जनता को न्याय मिलना न मिलना एक बराबर हो जाता है ।

      December 12, 2010 at 9:57pm ·  ·  10

    • Sheetal Jangir 
      गुरुदेव डॉ.मनोज चतुर्वेदी के सुविचार-
      "हमारे सपनों के प्यारे देश भारत की निरीह जनता का दुर्भाग्य यह है कि उसके सामने कोई विकल्प नहीं है, सभी कमीजें गन्दी हैं, बस सबसे कम गन्दी कमीज का चयन किया जा सकता है और फिर उसका भी कोई भरोसा नहीं, गर्द भरे इस वातावरण में उसके और भी गन्दी हो जाने की सम्भावना बनी रहती है। क्या आप आत्म-चिंतन और आत्मावलोकन करना पसंद करेंगे और फिर कुछ ठोस कदम उठाना चाहेंगे भारत को एक नई दिशा प्रदान करने के लिये ? भ्रष्टाचार के लिये हम सभी दोषी हैं, जिसे भी मौका मिलता है वह अपने पद, अपनी स्थिति का पूरा फायदा उठाता है, किन्तु इस स्थिति में समानता होते हुये भी वह ज्यादा बड़ा दोषी है, जिसके कन्धों पर ज्यादा बड़ी जिम्मेदारी है, अर्थात सत्ता पर काबिज नेता और बड़े अधिकारी। और यह भी निश्चित है कि भ्रष्टाचार की गंगा ऊपर से नीचे की ओर बहती है।"

      December 12, 2010 at 10:04pm ·  ·  10

    • Manoj Chaturvedi 
      ‎***
      प्रिय मित्रों,
      नमस्कार !
      हम इन 63 वर्षों में आखिर कहाँ आ गये हैं, आम जनता की गरीबी तो नहीं हट सकी, लेकिन जनता के प्रतिनिधियों की अवश्य हट गयी। नौजवान आपस में लड़ना सीख गये, नशे और अश्लीलता के जाल में फँस गये, राष्ट्रवाद, देश के प्रति कर्तव्य निर्वहन, सामाजिक दायित्वों की पूर्ति, नैतिकता जैसी चीजों से वे विमुख हो चुके हैं, आत्म-सम्मान, राष्ट्र-गौरव, अपनी समृद्ध परंपरा से हम कोसों दूर पहुँच गये हैं !
      "जय हिंद ,जय हिंदी”

      December 12, 2010 at 10:30pm ·  ·  10

    • Poonam Singh ‎-
      मंत्रियों और उनसे संबद्ध वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के भ्रष्टाचार के किस्से आम तौर पर सुर्खियों में आते रहते है। कामचलाऊ बहुमत का बहाना बनाकर मंत्रिमंडल भ्रष्टाचार के विरुद्ध संग्राम का तेजस्वी रूप प्रदर्शित नहीं कर पाता। इसीलिए लोकजीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध न्यायपालिका नि:संकोच भाव से खड़ी होती है। भ्रष्टाचार संबंधी आरोपों की जांच करने वाली एजेंसी न तो निष्पक्ष है और न उसका आचरण पारदर्शी है।

      December 13, 2010 at 3:54pm ·  ·  10

    • Poonam Singh 
      ‎-
      हमारा आह्वान है भारतीयों से कि आइए समस्त भारतीय व्यवस्था को निर्भीक देशभक्ति से तृप्त करें हमें राष्ट्रवाद, देशभक्ति, संस्कार तथा दिव्यता को यथार्थ प्रदान करना है, और इसके लिए जिनकी आवश्यकता है, वे हैं : प्रेम और नियम इनके बिना देश-भक्ति इत्यादि मात्र थोथे शब्द ही रह जाते हैं हम पहले स्वयं जागें और यह न समझें कि हमारे सिवाय जो भी लोग हैं, वे सब धरा पर बोझ हैं, हम अपने अन्दर प्रेम को बीज प्रदान करें, और स्वयं में मानें कि ये जो सो रहे हैं, वो सब मेरे अपने भाई हैं और यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं उनको जगाऊं यह श्रेष्ठ विचार रखते हुए अपने भारत-सुत होने के कर्तव्यों का तथा नियमों का पालन करें !

      December 13, 2010 at 3:57pm ·  ·  10

    • Sheetal Jangir 
      लोग सोचते हैं कि मेरे नियम पालन करने से क्या हो जाएगा, पर एक बार सोचें कि इस प्रकृति में जो भी तत्व हैं, सभी अपने नियम-कर्तव्य का पालन करने में आलस्य नहीं दिखाते, तो हम क्यों दिखाएं शरीर में बहुत से अंग हैं, कोशिकाएं हैं, पर यदि एक भी अंग कार्य करना छोड़ दे तो सारा शरीर पीडा़ सहता है, यदि हृदय सोचे कि मुझे क्या मिल रहा है लगातार धड़कने से और ६० सेकण्ड भी रुक जाए, तो पूरा जीवन समाप्त हो सकता है यदि सूर्य आलस्य कर जाए, तो संसार नष्ट हो जाएगा, यदि वृक्ष आक्सीजन देना बंद कर दें, तो कोई जीवित नहीं बचेगा इसी प्रकार हर किसी को समझना चाहिए कि उसका नियम-कर्तव्य क्या है और दृढता पूर्वक पालन करना चाहिए हम समझ रहे हैं कि आज की परिस्थितियों में हमें क्या करना चाहिए और कम नियम पूर्वक करेंगे आप विश्वास रखें कि हमारी शक्ति व साधना व्यर्थ नहीं जाएगी जिस प्रकार प्रलयकाल में भी मनु ने पृथ्वी पर जीवन की रक्षा का सफल प्रयास किया, उसी प्रकार हम मनु के वंशज इस समाज में जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए अग्रसर हों !

      December 13, 2010 at 4:00pm ·  ·  10

    • Sheetal Jangir पूनम दीदी,
      "यूनान मिश्र रोमन, सब मिट गए जहां से,
      बाकी मगर है अब तक, नामोनिशां हमारा,
      कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी,
      सदियों रहा है दुश्मन, दौर ए जहां हमारा "
      देश के यदि कुछ कुपुत्र हैं तो आप जैसे सपूत भी तो हैं और भले ही आज आप कुछ अपनी निजी समस्याओं में उलझे सामाजिक कार्य नहीं कर पा रहे, परन्तु हमें आपकी अच्छाई पर कोई संदेह नहीं है तभी तो यह प्रस्ताव आपको दिया गया है तथा मां की सेवा का आग्रह आपसे किया गया है !

      December 13, 2010 at 4:02pm ·  ·  10

    • Poonam Singh 
      ‎-
      प्यारी शीतल,
      तुमने बिलकुल सही कहा है, इसी बारे में हमारे सर डॉ.मनोज चतुर्वेदीज़ी का कथन याद आ गया---
      "एक बार भगवान श्री कृष्ण को भी क्रोध आया था और नारद ऋषि को भी विषयासक्ति हुई थी ( ऐसा शास्त्र कहते हैं ) परन्तु यह केवल बाह्य लीला या भ्रम था वास्तव में वे योगीराज व जितेन्द्रीय रहें हैं सदा और हमारे लिए आराध्य भी हम सभी उनके अनुयायी भी तो उन्हीं की तरह हैं और उनके शिष्य वीर हनुमान जी की तरह अपनी शक्ति भूले हुए हैं तथा आत्मविस्मृति के सागर किनारे हताश टहल रहे हैं और शायद किसी जांबवंत की प्रतिक्षा में हैं कि वे आएं और हमारी शक्ति का अहसास कराएं"

      December 13, 2010 at 4:08pm ·  ·  10

    • Poonam Singh 
      ‎-
      एत देश प्रसूतस्य सकाशादग्र जन्मन:
      स्वं स्वं चरित्र शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व मानवा:
      अर्थात एस देश में उत्पन्न अग्रजन्मा महापुरुषों के पास बैठ कर संसार भर के मानव अपने-अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करें क्योंकि यह "विश्व-गुरू" हैवह राष्ट्र, जो कभी समस्त संसार के लिए एक मार्ग-दर्शक था, समस्त मानव-जाति जिसकी अनुयायी थी तथा जिसे पृथ्वी पर "पुण्यभूमि" की संज्ञा दी गई, वह विराट आज दयनीय अवस्था से ग्रसित है ! आज "भारत-वर्ष" ही नहीं, बल्कि संपूर्णा संसार प्रदूषण, आर्थिक समस्या, भय, भूख, भ्रष्टाचार, स्वार्थ, अज्ञानता, इंद्रिय-लोलुपता (वासना), व्यसन, बेरोजगारी, परस्पर कटुता अलगाववाद और आतंकवाद जैसे विकृत और जीवन के लिए घातक तत्वों के द्वारा व्यथित है और यह सभी जानते हैं, कि समस्त संसार को प्रत्येक विपदा के समय अभयदान भारत ने ही दिया है इसी देश ने सदा से विश्व को सुमार्ग दिखाया है, पर यही राष्ट्र आज अज्ञानांधकार से बुरी तरह आच्छादित है यदि इस जीवित ग्रह का जीवन बचाना चाहते हैं, तो भारत को पुन: जागृत करना होगा यही समय की मांग है इस घोर काल-रात्रि में, आपद काल में, स्वराष्ट्र-जागरण के लिए एक बदलाव (क्रान्ति) की आवश्यकता है !!!!!!!

      December 13, 2010 at 4:09pm ·  ·  10

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) 
      ‎***
      प्रिय पूनम और प्रिय शीतल.
      तुम दोनों का भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में विचार युक्तिसंगत है और किसी क्रांति का विचार भी सही है ! किन्तु.........................
      "जब जब देश पे संकट आए,
      तब तब शर-संधान करें
      एक जन्म ही नहीं देश पर,
      जन्म-जन्म बलिदान करें "
      हम चाहे तो राष्ट्र को एक नई दिशा दे सकते हैं। अपने गौरवमयी इतिहास के आसरे हम अपने वर्तमान और भविष्य को उज्जवल होता हुआ देख सकते हैं। बस आवश्यकता है एक प्रयास की। एक आंदोलन की। देश में एक समान नितियाँ सभी के लिए लागू हो, विकास का पैमाना सभी के लिए एक हो इसके लिए निश्चित तौर पर हमें संघर्ष की आवश्यकता होगी। हमें एक और आजादी की जरुरत है वो है आर्थिक आजादी.सरकार को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि देश के प्रत्येक व्यक्ति का पेट भरा हो एक छोटे से लाभ के लिए लोगों के घरों को न उजाडा जाए.ये सब तभी संभव है जब हम अपने उत्तरदायित्वों को प्राथमिकता दें ! जीव जब सो रहा होता है, तो अपना अस्तित्व भूल जाता है, यही हम भारतवासियों के साथ हुआ है प्राकृतिक रूप से तो जब अन्धेरा होता है, तब लोग सोते हैं, परंतु यह दुर्भाग्य रहा है कि देशवासियों के देश के प्रति उदासीन हो सो जाने के कारण राष्ट्र में अन्धेरे का वर्चस्व बना, और वह भी लम्बे समय तक अंग्रेजों के आने से पहले वैसे तो देश पर १००० वर्षों से आघात होते रहे थे, परन्तु फिर भी देशवासियों का राष्ट्रीय चरित्र उनमें स्थापित रहा था, और यही विषय अंग्रेजों ने समझ लिया गुप-चुप तरीके से राष्ट्रीय चरित्र का ह्रास करने की योजना बनाई पहले तो तक्षशिला-नालंदा जैसे विश्व-विद्यालयों से भारत के बहु-मूल्य ग्रंथ नष्ट किए, फिर भारतीय शिक्षा-व्यवस्था को विकृत किया और भारतीयों का ध्यान मतांधता में लगाए रखा यही देश पर सबसे भयंकर चोट थी !

      December 13, 2010 at 4:20pm ·  ·  10

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) 
      ‎***
      मनमोहन सिंह सरकार ने भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों के दबाव में सूचना के अधिकार कानून में संशोधन कर फाइलों पर की जाने वाली नोटिंग को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर करने का फैसला किया है । अफसोस की बात यह है कि लोकतंत्र की दुहाइयां देनेवाली यूपीए सरकार ने यह फैसला करने से पहले न तो केन्द्रीय सूचना आयोग से सलाह-मशविरा किया और न ही उन जन संगठनों को विश्वास में लिया जो सूचना के अधिकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकप्रिय हथियार बनाने में सक्रिय हैं।

      December 13, 2010 at 4:24pm ·  ·  9

    • Raghuveer Saini फाइलों पर की गई नोटिंग को सूचना के अधिकार के तहत खोलने से अधिकारियों और मंत्रियों की जवाबदेही तय करना और उस पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना आसान हो जाता। इसके जरिए ही किसी अधिकारी के फैसलों या कोई फैसला न लेने और अनिर्णय की जिम्मेदारी तय की जा सकती है। जाहिर है कि फाइलों पर की गई नोटिंग को सूचना के दायरे से बाहर करके सूचना के अधिकार को एक तरह से बेमानी बना दिया गया है।
      December 13, 2010 at 4:58pm ·  ·  8

    • Anil Kumar Patil 
      सर डॉ.मनोज चतुर्वेदीज़ी का कथन :-
      मुद्दे की बात यह है कि हर साल 200 से अधिक अधिकारियों को हार्वर्ड और अन्य विश्वविद्यालयों में भेजे जाने से उनकी समग्र कार्यकुशलता या ईमानदारी कैसे बढ़ाई जा सकती है या भ्रष्टाचार किस तरह कम या ख़त्म किया जा सकता है। रोमन दार्शनिक काटो ने सदियों पहले कहा था, ‘एक नौकरशाह सबसे घृणित व्यक्ति होता है। हालांकि गिद्धों की तरह उसकी भी जरूरत होती है, पर शायद ही कोई गिद्धों को पसंद करे। गिद्धों और नौकरशाहों में अजीब तरह की समानता है। मैं अभी तक किसी ऐसे नौकरशाह से नहीं मिला हूं, जो क्षुद्र, आलसी, क़रीब-क़रीब पूरा नासमझ, मक्कार या बेवकूफ़, जालिम या चोर न हो। वह ख़ुद को मिले थोड़े-से अधिकार में ही आत्ममुग्ध रहता है, जैसे कोई बच्च गली के कुत्ते को बांधकर ख़ुश हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों पर कौन भरोसा कर सकता है ?’ बेशक, ऐसा कहते हुए उनके दिमाग़ में भारतीय नौकरशाही नहीं रही होगी, क्योंकि वे भारत से परिचित नहीं थे। लेकिन उनकी यह व्याख्या हमारे नौकरशाहों के व्यापक बहुमत पर पूरी तरह सटीक बैठती है, जो केंद्र और राज्य सेवाओं को मिलाकर 1.90 करोड़ के क़रीब होते हैं। यह माना जाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें काफ़ी व्यापक और गहरी हैं।

      December 13, 2010 at 5:09pm ·  ·  7

    • Rakesh Gautam 
      सीबीआई ने ऐसे प्रकरणों की सूची सार्वजनिक की है, जो मंजूरी के चक्कर में लटके हुए हैं। इस सूची में हरियाणा के एक पूर्व मुख्यमंत्री के पास 2006 में मिली बेहिसाब संपत्ति का प्रकरण भी शामिल है। सीबीआई ने कुल मिलाकर 132 प्रकरण सूचीबद्ध किए हैं, जिनके लिए मंजूरी लटकी हुई है। एक मामले में 15 तक स्वीकृतियां लेनी पड़ती हैं। सीबीआई के अधिकारी जिन लोगों पर कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहे हैं, उनमें विभिन्न विभागों के आयुक्त, आईएएस अफ़सर, सीएजी, एमसीडी और सीपीडब्ल्यूए के ऑडिटर भी शामिल हैं। भ्रष्टाचार और कुशासन अक्षमता के सहोदर हैं। प्रधानमंत्री लगातार वितरण व्यवस्था की विफलता के बारे में कह रहे हैं, चाहे यह चाहे यह हर्षद मेहता था या तेलगी घोटाला या परियोजनाओं का निर्धारित समय सीमा में निबटारा न होना। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण की राह में सबसे बड़ी बाधा असीमित बचाव और अनुमोदन एवं कानूनों की ढेर सारी परते हैं, किसी ब्यूरोक्रेट को छूने से पहले जिनसे पार पाना होता है। यह एक चपरासी से लेकर मुख्य सचिव तक, सब पर लागू होता है।

      December 13, 2010 at 6:23pm ·  ·  6

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) ‎@@@
      यदि कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के मामले में पकड़ा जाए और तकनीकी आधार पर छूट जाए, तो प्रशासन में उसके लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। बहरहाल, यहां यह जोखिम जरूर है कि भ्रष्ट नेता इस ताक़त का दुरुपयोग कर सकते हैं, और इसीलिए बराबर जवाबदेही तय होनी चाहिए। इस सबके अलावा भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा अनुशंसित पुनर्गठन को तत्काल स्वीकृति मिलनी चाहिए, ताकि न केवल आम आदमी, बल्कि अपमानित महसूस करने वाले नौकरशाह भी न्याय पा सकें।

      December 13, 2010 at 6:31pm ·  ·  7

    • Mahipal Singh Negi bharat men bharstachar ki jade bahut majbut hai. unko jad se ukhadne ke liye hame drid sakalp lena chahiye. hame ektrit ho kar mukable karna chahiye. kyonki ekta men hi shakti hai.
      December 13, 2010 at 7:41pm ·  ·  2

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) ‎*
      भाई महिपाल सिंह नेगी,
      आपने सही कहा है कि भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं, इन्हें ख़त्म करने के लिए अनेकानेक प्रयास हर तरफ से धैर्य के साथ करने होंगे.....

      December 13, 2010 at 8:21pm ·  ·  7

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) 
      ‎*
      दुनिया भारतीय लोकतंत्र का, इसके बहुलवादी और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का, स्वतंत्र न्यायपालिका का, स्वतंत्र प्रेस का, आजादी और शांति के लिए प्रतिबद्धता का तथा इसके उचित एवं समावेशी विकास के अनुसरण का सम्मान करती है। लेकिन हमारे देश में व्याप्त भ्रष्टाचार हमारी छवि को धूमिल करता है। यह निवेशकों को भी हतोत्साहित करता है, जो निष्पक्ष और पारदर्शी समझौते चाहते हैं।भ्रष्टाचार से लड़ने का कोई एक इलाज नहीं है, इससे कई स्तरों पर लड़ा जाना है।

      December 13, 2010 at 8:24pm ·  ·  7

    • Mahipal Singh Negi aap jaise karmat or yogya vyakti hee ish karya men saksam ho sakte hai. aapki jo vichardhara hai yadi sabhi uska anusaran kare to kathin karya bhi ashan ho jayega.
      December 13, 2010 at 8:27pm ·  ·  2

    • Mahipal Singh Negi bharat ka loktantr viswa ka mahan loktanr hai phir bhi hamare desh ke logo ko usaka adar karte huai desh men iyeshi viwastha banani chahiye jis se desh men bhrastachar panap na sake.
      December 13, 2010 at 8:31pm ·  ·  4

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) ‎*
      प्रियभाई महिपाल सिंह नेगी,
      आपकी मेरे प्रति शुभभावना और विश्वास से मै अभिभूत हूँ, मैं कोई नेता बनने का इरादा नहीं रखता, परन्तु आप जैसे निष्ठावान साथी मुझे सहयोग करें तो मार्गनिर्देशन हेतु सदैव तैयार रहूँगा, मुझे बहुत ख़ुशी होगी !
      शुभकामना एवम शुभभावना सहित,

      December 13, 2010 at 10:08pm ·  ·  7

    • Sheetal Jangir अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानांजनशलाकया |
      चक्षुरुन्मीलितम येन तस्मै श्री गुरुवै नम : ||
      अज्ञान रूपी अंधकार की अन्धता को ज्ञान रूपी काजल की शलाका से हमारे नेत्रों को खोलने वाले श्री गुरु डॉ.मनोज चतुर्वेदी को नमन है

      December 14, 2010 at 2:19pm ·  ·  7

    • Sheetal Jangir हम वर्तमान परिदृश्य पर नजर डालें तो कुछ महिला नेताओं जैसे तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता और बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती, दोनों के मामले में यह कहा जा सकता है कि महिलाएं भी उतना ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं जितना कि पुरुष !
      December 14, 2010 at 2:21pm ·  ·  7

    • Sheetal Jangir भ्रष्टाचार की बढ़ती मांग को देखते हुए शासन को चाहिए कि अब एक "रिश्वत लोन" भी प्रारम्भ करे, जो कि शासन के लिए फायदेमंद होगा। इस ऋण सुविधा के चालू होने से जहां प्रत्येक व्यक्ति का कार्य आसानी से सम्पन्न होगा, वहीं शासन व प्रशासन के कार्यो में टंाग अड़ाने वाला भी कोई नहीं होगा। इसके साथ ही रिश्वत लोन के प्रारम्भ होने से राष्ट्र में भ्रष्टाचार की कुल खपत का सही आकलन भी हो सकेगा।
      December 14, 2010 at 2:23pm ·  ·  7

    • Anil Kumar Patil हम अपनी प्राचीन ईमानदारी की विरासत को तिलांजलि देकर भ्रष्टाचार का दामन पकड़कर नए युग का शंखनाद करते आगे बढ़ रहे हैं। भ्रष्टाचार की दिन दूनी, रात चौगुनी ख्याति देखते हुए इसे राष्ट्रीय कत्तüव्य घोषित कर देना चाहिए। हो सके तो इसके साथ ही देश के बड़े भ्रष्टों को हर साल समारोहपूर्वक भ्रष्ट रत्न, भ्रष्टविभूषण, भ्रष्टभूषण और भ्रष्टश्री की उपाधि देने पर भी विचार शुरू कर देना चाहिए।
      December 14, 2010 at 2:27pm ·  ·  5

    • Raghuveer Saini 
      यहां तक तो ठीक है कि भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई हो लेकिन यह तय करना उससे भी ज्यादा जरूरी है कि भ्रष्टाचार की नाल नाभिग्रंथी हमारी सरकारी व्यवस्था से ही जुड़ी हुई है और इसी के रास्ते यह निजी मंडियों में भी छाई हुई है। कुछ ईमानदार अधिकारियों या पेशेवरों की बात छोड़ दी जाए तो अपनी मासिक या दैनिक आमदनी से इतर उपरी आय के चक्कर में रहने वाला अधिकांश व्यक्ति जो कि अपना जीवनस्तर उफंचा उठाना चाहता है, या तो भ्रष्ट बन रहा है, या फिर दूसरों को बनने के लिए प्रेरित कर रहा है या फिर भ्रष्टाचार की चेन में अपनी रोटेशनल भूमिका का निर्वाह कर रहा है। कहने को तो हमारी प्रशासनिक व्यवस्था बहुत कुशल है, जनोन्मुखी है, लेकिन यह इसके मुंह पर किसी तमाचे से कम नहीं कि विगत सात दशकों में भ्रष्टाचार से लड़ने में यह पूरी तरह से विफल रही है और इसे बढ़ाने का श्रेय भी अब इसको ही दिया जाने लगा है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विधयिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रेस जैसे लोकतंत्रा के चारो स्तम्भ मिलकर भ्रष्टाचार का मुकाबला ही नहीं कर सकते बल्कि इसका समूल नाश भी कर सकते हैं।

      December 14, 2010 at 2:33pm ·  ·  4

    • Raghuveer Saini 
      संसदीय राजनीति में बहुमत एक ऐसा खेल है जो नैतिक होने पर तो बहुत कुछ दे सकता है समाज को लेकिन यदि अनैतिक हुआ तो बहुत कुछ लील भी सकता है समाज का। लिहाजा अब आवश्यकता इस बात की है कि लोकतंत्रा को नैतिक बनाया जाए और भ्रष्टाचार रूपी अनैतिकता से उसके वास्ते को खत्म करने के लिए हर संभव पहल की जाए। किसी को भी लिंग, जाति, वर्ग, धर्म क्षेत्रा के आधर पर लाभान्वित करने की कूचेष्टा करते न की जाए और जो अब तक हो चुका है, उसे नियंत्रित करते हुए देश में ‘समान नागरिक संहिता’ लागू करने की कोशिश की जाए।

      December 14, 2010 at 2:35pm ·  ·  4

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) 
      ‎*
      अब यदि देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाना है तो सर्वप्रथम देश की राजनीति से भ्रष्ट राजनीतिज्ञों का संफाया करने की जरूरत है। जनता तथा आम मतदाता यह बहुत अच्छी तरह जानता है कि उसके क्षेत्र की पंचायत से लेकर संसद तक का नुमाईंदा राजनीति के क्षेत्र में अपनी सक्रियता अथवा अपने निर्वाचन से पूर्व क्या आर्थिक हैसियत रखता था और अब कुछ ही समय में अथवा कुछ ही वर्षों में वह आर्थिक रूप से कितना संपन्न हो चुका है। मंहगाई के इस दौर में जबकि एक व्यक्ति का रोटी खाना व साधारण तरींके से उसका परिवार चलाना दूभर हो रहा है ऐसे में जनता के समक्ष चुनाव के समय हाथ जोड़ने वाला तथा स्वयं को समाजसेवी बताने का ढोंग करने वाला कोई राजनैतिक कार्यकर्ता यदि आए दिन अपनी संपत्ति बढ़ाता ही जा रहा है अथवा उसका रहन-सहन असाधारण होता जा रहा है तो जनता को स्वयं समझ लेना चाहिए कि अमुक व्यक्ति,समाजसेवी या नेता नहीं बल्कि हमारे देश में लगी भ्रष्टाचार रूपी दीमकों के झुंड का ही एक प्रमुख हिस्सा है ।
      "हम न सोचें हमें क्या मिला है
      हम ये सोचें किया क्या है अर्पण
      फूल खुशियों के बाँटें सभी को
      सबका जीवन ही बन जाये मधुबन
      अपनी करुणा का जल तू बहाकर
      करदे पावन हरेक मनका कोना"

      December 14, 2010 at 8:26pm ·  ·  4

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) 
      ‎*
      हर तरफ़ ज़ुल्म है, बेबसी है,सहमा सहमा-सा हर आदमी है...
      भ्रष्टाचार के पाप का बोझ बढता ही जाये,जाने कैसे ये धरती थमी है !!
      जो मनुष्य सर्वदा सत्य को धारण किए रहता है, उसके जीवन के सभी कर्मों, वाणी और विचारों में पवित्रता का भाव सदा अक्षुण बना रहता है। सच्चाई से थोड़ा भी हट जाने पर- विचार,वाणी और कर्म में असत् भाव प्रविष्ट हो जाता है। और वैसा हो जाने पर, सच्चाई धीरे धीरे इतनी दूर चली जाती है कि, सच्चरित्रता रूपी स्तम्भ का गगन चुम्बी शिखर ही टूट कर बिखर जाएगा। चरित्र कि चट्टानी नींव पर ही, मनुष्य का जीवन ऐश्वर्य कि गरिमा के खड़ा रह सकता है। वैसा न होने से पग-पग पर मिलने वाली पराजय कि ग्लानी, अन्त में जीवन को एक ऐसे अंधेरे कुँए में गिरा देगी, जहाँ से पुनः 'आलोक के आनन्दमय राज्य में' जाने के लिए पग बढाने का, कोई उपाय ही शेष नही रहेगा।

      December 14, 2010 at 8:36pm ·  ·  4

    • Sheetal Jangir 
      भारत के स्थानिय निकायो, राज्य सरकारो एवं केन्द्र सरकार का कुल बजट 20 लाख करोड रुपये है। और यह 20 लाख करोड का बजट तो तब है जबकि देश मे चारो तरफ भ्रष्टाचार शिखर पर है। इस देश में भ्रष्टाचार न हो तो भारत देश का कुल बजट 35-40 लाख करोड हो सकता है। आप ही सोचे आप ही निर्णय करे की क्या एक गरीब देश का इतना बजट हो सकता है। जानबुझकर देश के भ्रष्ट एवं बेईमान नेतओ ने देश को गरीब बनायांत्रिक हुआ है। देश से यदि भ्रष्टाचार मिट जाए तो देश मे एक भी व्यक्ति बेरोजगार व गरीब नही रह सकता। एक षड्यंत्र के तहत लोगो को बेरोजगार गरीब एवं अनपढ बनाया हुआ है। जिससे की भ्रष्ट शासक देश के गरीब, बेरोजगार, अनपढ एवं अशिक्षित लोगो पर मनमाने ढंग से शासन कर सके अथवा लोकतन्त्र के नाम पर तानाशाही कर सके।

      December 14, 2010 at 10:54pm ·  ·  4

    • Sheetal Jangir 
      राष्ट्र्वादी, ईमानदार लोग ही देश पर शासन करेंगे भ्रष्टाचारी लोग ही देश पर शासन करेंगे। यह झूठ भी एक साजिश के तहत बोला जा रहा है। जिससे कि ईमानदार, देशभक्त लोग कभी सत्ता मे न राष्ट्र्वादी, ईमानदार लोग ही देश पर शासन करेंगे भ्रष्टाचारी लोग ही देश पर शासन करेंगे। यह झूठ भी एक साजिश के तहत बोला जा रहा है। जिससे कि ईमानदार, देशभक्त लोग कभी सत्ता मे नहीं आ सकते। और एक के बाद दूसरा बेईमान सत्ताओ के सिंहासन पर बैठकर बेरहमी एवं बेदर्दी के साथ देश को लुटेगा। इस देश मे देशभक्त, ईमानदार, पढे-लिखे, चरित्रवान एवं जिम्मेदार लोग भी है, जो देश को - भ्रष्टाचार मुक्त, श्रेष्ठ शासन दे सकते है। तो समस्त देशवासियों के मन मे एक सहज प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या अच्छे व चरित्रवान लोग संगठित हो पायेंगे ? क्या ईमानदार लोग एम एल ए, एम पी नही बन पायेंगे ? इसका सीधा, स्पष्ट एवं यथार्थ उत्तर है कि देश को नेतृत्व देने की क्षमता रखने वाले देशभक्त, चरित्रवान लोग तो है लेकिन देशभक्त, चरित्रवान, ईमानदार लोग संगठित नहीं है।

      December 14, 2010 at 10:55pm ·  ·  4

    • Poonam Singh 
      ‎-
      'भ्रष्टाचार' को राष्ट्र की सबसे बड़ी समस्या और बर्बादी की जड़ बताने वाले, भ्रष्ट-बेईमान लोगों के हाथों में देश की सत्ता सौंपने को देश का अपमान मानने वाले तथा जीवन में सौ प्रतिशत पारदर्शिता के हिमायती योगगुरु बाबा रामदेव क्या अब 'हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे' की राह पर चल पड़े हैं? 'आओ हम सब मिलकर प्रण करें कि...हम देश को भ्रष्ट लोगों के हाथों लुटने नहीं देंगे' जैसे आह्वान तथा 'क्या हम देश की सत्ता भ्रष्ट, बेईमान, कायर, कमजोर बुजदिल और दोहरे चरित्र वाले लोगों के हाथों में सौंप दें?' जैसी एकदम सौ टका टंच ईमानदारी का दम भरने वाली बेबाक बयानियों के बूते जनप्रियता की बुलंदियां छू रहे योगगुरु को अब क्या अपने योग-साम्राज्य के विस्तार के लिए भी महाठग नटवरलाल जैसे चाल-चरित्र वाले लोगों के सहारे की जरूरत आन पड़ी है?

      December 14, 2010 at 10:59pm ·  ·  4

    • Poonam Singh 
      ‎-
      प्रिय शीतल,
      तुमने भ्रष्टाचार को बहुत अच्छा स्पष्ट किया है,अधिकतर लोगों के भ्रष्टाचार की दौ‹ड में शामिल होने की कोशिशों के बावजूद भी उन लोगों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जो की भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रहे हैं या जो भ्रष्टाचार को ठीक नहीं समझते हैं। क्योंकि आम जनता के दबाव में यदि सरकार ‘‘सूचना का अधिकार कानून” बना सकती है, जिसमें सरकार की 90 प्रतिशत से अधिक फाइलों को जनता देख सकती है, तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून” बनाना क्यों असम्भव है? यद्यपि यह सही है कि ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून” बन जाने मात्र से ही अपने आप किसी प्रकार का जादू तो नहीं हो जाने वाला है, लेकिन ये बात तय है कि यदि ये कानून बन गया तो भ्रष्टाचार को रुकना ही होगा।
      ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून” बनवाने के लिए उन लोगों को आगे आना होगा जो-
      भ्रष्टाचार से परेशान हैं, भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं,
      भ्रष्टाचार से दुखी हैं,
      भ्रष्टाचार ने जिनका जीवन छीन लिया,
      भ्रष्टाचार ने जिनके सपने छीन लिये और
      जो इसके खिलाफ संघर्षरत हैं।

      December 14, 2010 at 11:05pm ·  ·  4

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) 
      ‎*
      मित्रों मेरे प्रिय रचनाकारों में एक पूजनीय शैल चतुर्वेदीज़ी की 'भ्रष्टाचार' पर एक मनोरंज़क कविता प्रस्तुत है.....,
      सादर प्रस्तुति,
      हमारे लाख मना करने पर भी,हमारे घर के चक्कर काटता हुआ
      मिल गया भ्रष्टाचार,हमने डांटा : नहीं मानोगे यार
      तो बोला : चलिए,आपने हमें यार तो कहा
      अब आगे का काम,हम सम्भाल लेंगे
      आप हमको पाल लीजिए,आपके बाल-बच्चों को
      हम पाल लेंगे,हमने कहा : भ्रष्टाचार जी!
      किसी नेता या अफ़सर के,बच्चे को पालना
      और बात है,इन्सान के बच्चे को पालना
      आसान नहीं है,वो बोला : जो वक्त के साथ नहीं चलता
      इंसान नहीं है,मैं आज का वक्त हूँ
      कलयुग की धमनियों में,बहता हुआ रक्त हूँ
      कहने को काला हूँ,मगर मेरे कई रंग हैं
      दहेज़, बेरोज़गारी,हड़ताल और दंगे
      मेरे ही बीस सूत्री कार्यक्रम के अंग हैं
      मेरे ही इशारे पर,रात में हुस्न नाचता है
      और दिन में,पंडित रामायण बांचता है
      मैं जिसके साथ हूँ,वह हर कानून तोड़ सकता है
      अदलत की कुर्सी का चेहरा,चाहे जिस ओर मोड़ सकता है
      उसके आंगन में,अंगड़ाई लेती है
      गुलाबी रात,और दरवाज़े पर दस्तक देती है
      सुनहरी भोर,उसके हाथ में चांदी का जूता है
      जिसके सर पर पड़ता है,वही चिल्लाता है
      वंस मोर,वंस मोर,वंस मोर
      इसलिए कहता हूँ,कि मेरे साथ हो लो
      और बहती गंगा में हाथ धो लो !
      हमने कहा : गटर को गंगा कहते हो?,ये तो वक्त की बात है
      जो भारत वर्ष में रह रहे हो,वो बोला : भारत और भ्रष्टाचार की राशि एक है
      कश्मीर से कन्याकुमारी तक,हमारी ही देख-रेख है
      राजनीति हमारी प्रेमिका,और पार्टी औलाद है
      आज़ादी हमारी आया,और नेता हमारा दामाद है
      हमने कहा : ठीक कहते हो भ्रष्टाचार जी!
      दामाद चुनाव में खड़ा हो जाता है,
      और जीतने के बाद,उसकी अँगुली छोटी,और नाख़ून बड़ा हो जाता है
      मगर याद रखना,दामादों का भविष्य काला है
      बस, तूफ़ान आने ही वाला है
      वो बोला : तूफ़ान आए चाहे आंधी,अपना तो एक ही नारा है
      भरो तिज़ोरी चांदी की,जै बोलो महात्मा गांधी की
      हमने कहा : अपने नापाक मुँह से,गांधी का नाम तो मत लो
      वो बोला : इस ज़माने में,गांधी का नाम
      मेरे सिवाय कौन लेता है,गांधी के सिद्धांतों पर चलने वालों को
      जीने कौन देता है
      मत भूलो,कि भ्रष्टाचार,इस ज़माने की लाचारी है
      हमें मालूम है,कि आप कवि हैं
      और आपने,कविता की कौन-सी लाइन,कहाँ से मारी है।
      सादर साभार---(रचनाकार: शैल चतुर्वेदी)

      December 15, 2010 at 2:51pm ·  ·  6

    • Yashendra Prasad क्या शिक्षा से भ्रष्टाचार मिटेगा ?http://www.bihardays.com/2crrnt/yashendra-ki-batkah/
      December 15, 2010 at 8:18pm ·  ·  3

    • Sheetal Jangir 
      ‎-‘‘भ्रष्टाचार की गंगा का उद्गम गंगोत्री से हुआ अर्थात सर्वोच्च और पूज्य स्थान से।’’इस समय पंड़ित जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री थे।‘नेशनल हेराल्ड’ को दिल्ली लाने की योजना नेहरू जी ने बनाई और पाॅंच लाख की धनराशि का इन्तजाम करना तय हुआ।तत्कालीन विमानन मंत्री रफी अहमद किदवाई ने,हिमालयन एयरवे़ज के मालिक दो राणाओं से पच्चीस-पच्चीस हजार रूपये, अपने विभाग में ठेके देने के बदले में वसूल लिए।सरदार वल्लभ भाई पटेल के संज्ञान में यह बात आई तो उन्होनें जवाहर लाल नेहरू से इसकी शिकायत की तथा कड़ा प्रतिवाद किया।नेहरू के ‘नेशनल हेराल्ड’ को धर्मार्थ संस्था कहने पर पटेल ने आश्चर्य प्रकट किया।बाद में नेहरू ने पटेल को पत्र लिखकर रफी अहमद किदवाई द्वारा राणाओं से धनराशि लेने को उचित ठहराया।सरदार पटेल जैसे ईमानदार-दृढ़ संकल्पित व्यक्ति और पण्डित नेहरू जो कि पश्चिमी सभ्यता को तरक्की में सहयोगी मानते थे,के बीच उत्पन्न कटु सम्बन्धों का एक बडा कारण नेहरू जी द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपियों को संरक्षण देना था।(मस्तराम कपूर के अनुसार0

      December 15, 2010 at 10:16pm ·  ·  6

    • Poonam Singh 
      ‎-
      जिस देश की आम जनता आज भी हाड़-तोड़ मेहनत के पश्चात् बुनियादी पारिवारिक जरूरतों को पूरा न कर पाने की समस्या से बेजार है,उसी देश के,उसी आम जनता के मतों से निर्वाचित नेताओं की ऐयाशी व जीवन शैली मानवता को शर्मसार करने वाली है।देश का न्यायालय तक इस भ्रष्टाचार से नही बचा है और सर्वोच्च न्यायालय भी इस विषय पर अब मुखरित हो चुका है।लगभग सभी सत्ता में रहे राजनेता भ्रष्टाचार के आरोपी हैं,इस नासूर बन चुके भ्रष्टाचार का उपचार कौन करेगा????

      December 15, 2010 at 10:19pm ·  ·  6

    • Poonam Singh 
      ‎-
      कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के पास निर्माणाधीन फुटओवर ब्रिज के हिस्से का ढ़हना और स्टेडियम की फॉल्स सीलिंग गिरना भ्रष्टाचार का ही नतीजा है। उन्होंने भ्रष्टाचार के कारण ही तैयारियों में देरी हुई और हर ओर अव्यवस्था फैली हुई है। नए पुल ताश की पत्तों की तरह ढ़ह रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कॉमनवेल्थ के आयोजन में लगभग 70 हजार करोड़ रूपए खर्च किए गए हैं।
      अदालत ने पूछा कि जब हर ओर बदइंतजामी है, तो आखिर 70 हजार करोड़ रूपए कहां खर्च किए गए। कोर्ट ने कॉमनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार पर चिंता जताते हुए कहा कि यह 70 हजार करोड़ का मामला है और इससे जुड़ी खबरों पर आंख मूंदकर नहीं बैठा जा सकता। जस्टिस सिंघवी ने कहा कि "अब यह जगजाहिर है कि कॉमनवेल्थ में क्या हो रहा है। 15 अक्टूबर तक कॉमनवेल्थ को सार्वजनिक मकसद बताकर लोगों को ठगा जा रहा है और उसके बाद सब निजी हो जाए। गौरतलब है कि यह पहला मौका है जब सुप्रीम कोर्ट ने कॉमनवेल्थ गेम्स के आयोजन और उसमें बदइंतजामी पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

      December 15, 2010 at 10:21pm ·  ·  6

    • Asif Rathore प्रासंगिक एवं प्रेरक लेख के लिए साधुवाद!
      December 15, 2010 at 10:38pm ·  ·  2

    • Asif Rathore सर डॉ.मनोज चतुर्वेदीज़ी,
      गहन चिंतन और क्रांतिकारी विचार !!!!!!!!!!!!!!!!!!

      December 15, 2010 at 10:40pm ·  ·  4

    • Raghuveer Saini आपने सौ फीसदी सही, सटीक, और सत्य लिखा है. आपके खोजपरक लेखा के लिए साधुवाद. आपकी लेखनी को नमन. आज-कल के माहौल में ऐसा निर्भीक लेखा लिखना हिम्मत की बात है. आपसे ऐसे ही शोधपरक लेखो की आशा है !
      December 15, 2010 at 10:47pm ·  ·  4

    • Sheetal Jangir हे गुरुदेव !
      आपका प्रत्येक शब्द हमारे ह्रदय पर अंकित हो जाता है, आप पर माँ सरस्वती की पूर्ण अनुकम्पा है !
      सादर आभार

      December 16, 2010 at 11:19pm ·  ·  4

    • Anil Kumar Patil नमस्कार !
      क्या शिक्षा से भ्रष्टाचार मिटेगा ?
      सादर आभार !

      December 16, 2010 at 11:26pm ·  ·  2

    • डॉ.मनोज चतुर्वेदी (विचारक,चिन्तक और साहित्यकार) ‎*
      इस रचना पर आपकी टिपण्णी का बहुत ही आभारी हूँ, आपकी इस रचना पर की हुई स्तुति और मेरी ओर आपकी भावना पढ़कर मुझे मानो सबकुछ मिल गया !
      सादर आभार !

      December 16, 2010 at 11:35pm ·  ·  2

    • Rahul Sultania ॐ श्री सद् गुरु देवाय नम: ....
      December 17, 2010 at 8:06pm ·  ·  1

    • Peridon Don गुरुदेव सर डॉ.मनोज चतुर्वेदीज़ी,
      भ्रष्टाचार को बहुत अच्छा स्पष्ट किया है !
      आभार !

      December 18, 2010 at 10:18pm · 

    • Prem Arya चतुर्वेदीज़ी,
      भ्रष्टाचार को बहुत अच्छा स्पष्ट किया है !Isi prakar Desh men Jatiy Bhedbhaw bhi Hai jo ekiswin sadi men bhi jari hai Kya isse bhi desh ke vikas men avrodh paida hota hai .Apne shodhparak lekho se spasht karen

      October 13 at 10:47am · 

1 टिप्पणी:

  1. हमने हमारे नैतिक मूल्यों को खो दिया है । जब तक आम आदमी में नैतिक मूल्यों की स्थापना नही होगी तब तक भ्र्ष्टाचार नही मिट सकता। आश्चर्य है हमारे संविधान में "ईमानदारी " शब्द का एक बार भी उपयोग नहीं किया गया है

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