गुरुवार, 9 जून 2011

"११ भक्तिपूर्ण-भजन"



"श्रीश्याम गोविन्द गोपाल"
(१.)
श्रीश्याम गोविन्द गोपाल गाते चलो
अपनी मुक्ति का मारग बनाते चलो ।।
काम करते रहो नाम जपते रहो,
पाप करने से हर दम डरते रहो ,
नाम धन का खजाना बढ़ाते चलो ।।
लोग कहते है श्रीघनश्याम आते नहीं,
द्रोपदी की तरह से बुलाते रहो,
टेर गज की तरह से लगाते चलो ।।
लोग कहते है भगवान खाते नहीं,
शबरी की तरह से खिलाते नहीं,
शाक जेसे विदूर घर खिलाते चलो ।।
सुख में भूलो नही दुःख में रोवो नही,
अपने दिल से प्रभु को बिसारो नहीं,
माया जालों से दिल को हटाते चलो ।।
दया आवेगी उनको कभी ना कभी,
नाथ देंगे दर्शन कभी ना कभी,
यही विश्वास दिल में जमाते चलो ।।
सुनते आये अनोखा के वे नाथ है,
अपने भक्तों के रहते सदा पास है,
मन के विषयों से मन को हटाते चलो ।।
श्रीश्याम गोविन्द गोपाल गाते चलो,
अपनी मुक्ति का मारग बनाते चलो ।।

"गिरधारी खाटू श्याम( श्री श्याम देवाय नमः)"
(.)
म्हारो कनुड़ा गिरधारी खाटू श्याम( श्री श्याम देवाय नमः)
मेरा  श्री श्याम देवाय नमः  जय श्री श्याम जी  श्री श्याम देवाय नमः 
 श्री श्याम देवाय नमः . श्री श्याम देवाय नमः  
 श्री श्याम देवाय नमः . श्री श्याम देवाय नमः .
 श्री श्याम देवाय नमः ||


"हे नटनागर,कृष्ण कन्हैया"

(.)हे मुरलीमनोहर......
इस जीवन के सागर में, हर क्षण लगता है डर मुझको |
क्या भला है, क्या बुरा है, तू ही बता दे मुझको |
हे नटनागरकृष्ण कन्हैया, पार लगा दे मेरी नैया...
जय कृष्ण हरे श्री कृष्ण हरे....
क्या तेरा और क्या मेरा है, सब कुछ तो बस सपना है |
इस जीवन के मोहजाल में, सबने सोचा अपना है |
हे नटनागरकृष्ण कन्हैया, पार लगा दे मेरी नैया...
जय कृष्ण हरे श्री कृष्ण हरे....


"श्री श्यामबाबा"
(.)
श्री श्यामबाबा आप हैं  सुख-वरण प्रभु,
श्री श्यामबाबा, हे, दु:-हरण प्रभु, नारायण, हे,
त्रिलोकपति, दाता, सुखधाम, स्वीकारो मेरे प्रणाम...
श्री श्यामबाबा , स्वीकारो मेरे प्रणाम....
मन वाणी में वो शक्ति कहाँ, जो महिमा तुम्हरी गान करें,
अगम अगोचर अविकारी, निर्लेप हो, हर शक्ति से परे,
हम और तो कुछ भी जाने ना, केवल गाते हैं पावन नाम ,
स्वीकारो मेरे श्री श्यामबाबा, प्रभु, स्वीकारो मेरे प्रणाम.....


 " 'श्री राणी सती दादीज़ीकी जय "
(.)
आप बसी हो कण कण अंदर , दादी हम ढुढंते रह गये मंदिर में |
हम मूढमति हम अज्ञानी , दादी सार आपका क्या जाने ||
तेरी माया को ना जान सके , आपको ना कभी पहचान सके |
हम मोह की निंद्रा सोये रहे , दादी इधर उधर ही खोये रहे |
आप सूर्य और आप ही चंद्रमा , हम ढूंढते रह गये मंदिर में || 
आप बसी हो कण कण अंदर.......
हर जगह आपके डेरे दादीकोइ खेल ना जाने आपके दादी |
इन नयनों को ना पता चलेकिस रुप में आपकी ज्योत जगे |
आप पर्वत आप  ही समुन्द्र दादीहम ढूंढते रह गये मंदिर में || 
आप बसी हो कण कण अंदर......... 
कोई कहता आप ही पवन में हो,  और आप ही ज्वाला अगन में हो |
कहते है अंबर और जमीआप सब कुछ हो हम कुछ भी नहीं |
फल-फूल आप ही तरुवर दादीहम ढूंढते रह गये मंदिर में || 
आप बसी हो कण कण अंदर............
आप बसी हो कण कण अंदर , दादी हम ढूंढते रह गये मंदिर में |
हम मूढमति हम अज्ञानी , दादी सार आपका  क्या जाने ||
|| 'श्री राणी सती दादीज़ी' की जय ||


" श्रीश्याम देवायः नमः"
(.)
हर ओर जुबान पर श्रीश्याम भजन गूँजत है,
सखी आए नहीं सांवरे सलोने श्रीश्याम हमार,
कब लग नैनन द्वार सजाऊँ,दीप जलाऊँ दीप बुझाऊँ,
कब तक करूँ सिंगार,आई मधुर ऋतु बसंत बहार,
बरखा ऋतु बैरी हमार,जैसे सास ननदिया हमार,
पीया दरसन को जियरा तरसे,अँखियन से नित सावन बरसे,
रोवत है कजरा हमरे नैनन का,बिंदिया करे पुकार
बरखा ऋतु बैरी हमार,आई मधुर ऋतु बसंत बहार,
सखी आए नहीं सांवरे सलोने श्रीश्याम हमार,
" श्रीश्याम देवायः नमः"


|| 'श्री राणी सती दादीज़ीकी जय ||
(.)
कृपा हो कभी तो श्रीरानी सती दादीजी,निर्धन के घर भी जाना |
कृपा हो कभी तो श्रीरानी सती दादीजी,निर्धन के घर भी जाना |
जो रुखा सूखा दिया हमेंकभी उसका भोग लगा जाना ||
ना छत्र बना सका सोने काना चुनरी घर में रे तारो जडी लगाना |
ना पेडे बर्फी मेवा हैं श्रीरानी सती दादीजी,बस श्रद्धा है बिछाये खडी नैना |
इस श्रद्धा की रख लो लाज हे श्रीरानी सती दादीजी,इस अर्जी को ना ठुकरा जाना || 
 || 'श्री राणी सती दादीज़ीकी जय ||


"श्रीश्याम के पावनदर्शन" 
(.)
श्रीश्याम को सौंप दिये प्राण, मन से गाते उसका नाम
अपने कर्म चुकाकर सारे चलते है श्रीश्याम के धाम
भोग और विषयों को दूर करें इच्छा-अनुसार
श्रीश्याम के हम है अनुगतश्रीश्याम हमारा प्राणाधार
श्रीश्याम के भक्त बनकर, गाते सब उसका गुणगान
उसके ही प्राण और उसीके हैं हमारे जीवन- प्रान
श्रीश्याम के प्राणों की व्याकुलता हमारे प्राणों में जाग रही
श्रीश्याम हेतु श्वांस लेते और उसी से लौ जीवन की ज़ल रही
श्रीश्याम का परम सुन्दर रूप आँख हमारी देख रही सदा
श्रीश्याम का परम सुरीला कंठस्वर हमारे कान सुनते सदा
हमारा तन श्रीश्याम का करती नित स्पर्श प्राणों के आधार से
हमारा मन श्रीश्याम का ध्यान करता प्राणों के आधार से 
श्रीश्याम जब अपने प्राणोंको हमारे प्राणों के आधार में दिखलाता
श्रीश्याम के ध्यान में डूब जाते है, यह ज़गत नजर नही आता
श्रीश्याम हम सबका, माता-पिता,भाई,बन्धु,पुत्र और पालनहारा।
हमारा सबका सर्वस्व श्रीश्याम हीश्रीश्याम से समाहित ज़गत सारा
श्रीश्याम हम सबका जीवनसखाश्रीश्याम हम सबका परम धन
श्रीश्याम हमारे प्राणों में विराज़े, नित करते हरि के दर्शनीय दर्शन
समस्त ज़गत के जो कुछ भी सुख है, वह सभी हैं  श्रीश्याम के पास
श्रीश्याम के पावन-चरणके स्पर्श मात्रसे, विकृति नहीं है आसपास
श्रीश्याम के पावन- दर्शन से अब किसी वस्तु की चाह नही है
श्रीश्याम के पावनचरणों से दूर रहने की  चाह नही है 



 "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे"
(.)
हमारा ह्रदय सदा भजन करे, "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" ||
तन में "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" तेरे मन में "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे
मुख में "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" वचन में "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे"
हम जब भी बोले तब "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे"
"
श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" के सिवाय और नाहिं काहू सो काम
"
श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" केवल "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे।।
हमारे मन में और मुख में "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" आठहु याम  
हमारे ज्योति स्वरूप "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" को नाम
हम जब भी बोले तब "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे"  
"श्री राम हरे श्री कृष्ण हरेके सिवाय नाहि काहू से काम
"
श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" केवल "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे।।
हमारे कीर्तन-भजन-मनन में "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे"
हमारे ध्यान जाप सिमरन में "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे"
हमारे मन के अधिष्ठान में "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे"
"
श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" के सिवाय और नाहिं काहू सो काम
"
श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" केवल "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" ।।
हमारा ह्रदय सदा भजन करे, "श्री राम हरे श्री कृष्ण हरे" ||


"हे अंबे.....हे जगदंबे..." 
(१०.)
नवरात्रि पर माता का गुणगान------
हे...मैया !..आपके नाम है हजार.....किस नाम से पुकारूँ  !
हे...अंबे !..आपके नाम है हजार.....किस नाम से पुकारूँ !
शेर पर  सवारी करें..आप शेरावाली...
पहाडों मे जा बसी...आप पहाड़ा वाली...
फूल-माला कंठ धरे ...आप सेहरा वाली...
भक्तों पर बडी मेहर करें...आप मेहरा वाली...
आपकी महिमा तो है अपरंपार...किस नाम से पुकारूँ !...
हे मैयाआपके नाम है .....हे अंबे आपके नाम है..
कोल्हापूर की महारानी...'अंबे भवानी'...
'
वैष्णोदेवी' कहलाई मैया..जम्मू की पटरानी...
कलकत्ता वासियों को..... 'दुर्गा' लागे भली...
'
जगदंबा' भी आप मैया...आप ही महाकाली...
आपका रुप मैया...कैसे हो साकार...किस नाम से पुकारूँ !...
हे मैया!..आपके नाम......हे दाति आपके...
धन की वर्षा आपने की मैया..'महालक्ष्मी' कहलाई..
विद्या जब प्रदान की हमें ...'सरस्वती' कहलाई..
संतोष धन प्रदान किया...'माता संतोषी' कहलाई..
सब कुछ जब दिया आपने ...मेरी मां 'दाति' कहलाई..
फिर भी मै सोचू बार, बार..किस नाम से पुकारूँ !..
हे मैया..आपके नाम है....हे दाति आपके नाम.....हे अंबे आपके नाम.....हे जगदंबे आपके नाम...


" ओ मेरे श्याम बाबा "

(११.)
मेरे श्याम बाबा दया करके , भवसागर पार उतार मुझे |
विकराल विशाल तंरगों से , करुणा करके कर पार मुझे ||
परसेवा परउपकार नहीं , सत्संग समान सुजन सत्कार नहीं ,
विनय , विवेक विमल ह्रदय , मुझमें कोई शुचि संस्कार नहीं ,
तुझसे विनंती भी कर पाऊँ , इतना भी कहाँ अधिकार मुझे ? मेरे श्याम बाबा ...
मैं दुर्जन और दयामय तू , मैं कृपण , कुमति , करुणामय तू ,
मैं वंचित हूँ , तू वत्सल हैं , मैं आश्रित हूँ , और आश्रय तू ,
मैं अधम , अधमउद्धारक तू , इस नाते ही नाथ उबार मुझे मेरे श्याम बाबा ...
मैं धिक्कृत हूँ , प्रभु धन्य हैं तू , मैं अणु हूँ , नाथ अनन्य हैं तू ,
तज तुझको , भला मैं किधर जाऊ ? शरणागत हूँ मैं शरण्य हैं तू ,
मैं विषकर , तू विषहारी हैं , मतकर रे अस्वीकार मुझे मेरे श्याम बाबा ...
मैं पतित , पतितजनप्राण हैं तू , मैं त्रस्त , तृषित और त्राण हैं तू ,
कहीं और ठोर ठिकाना मुझे , मैं भोगभुक्त , भगवान हैं तू ,
मैं तेरे पथ का रज कण हूँ , रहने दे अपने द्वार मुझे मेरे श्याम बाबा ...

4 टिप्‍पणियां:

  1. आप सभी को भगवान का अनुग्रह प्राप्त हो, यह हार्दिक कामना है. आप सभी मंत्रजप के द्बारा इच्छानुसार लक्ष्य प्राप्त करने में संपूर्णतः सफल हों, ईश्वर आपको शांति, आनंद समृद्धि तथा आध्यात्मिक प्रगति प्रदान करें; यही प्रार्थना है ||

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