रविवार, 18 सितंबर 2011

"मेरे प्रेरणास्त्रोत,आदर्श,मार्गदर्शक,दार्शनिक, पिताश्री डॉ. तपेश चतुर्वेदी"



प्रात:स्मरणीय,परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन पिताश्री डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की आज ८४वीं जन्मतिथि पर सादर नमन सहित................,
उनकी गोद में इस जगत के प्रथम साक्षात्कार किये थे और उनकी ही ऊँगली पकड़कर प्रथम बार इस पावन भूमि पर कदम रखा था !
उनके सानिंध्य में और उनके परमस्नेही आशीर्वाद की छाया में ज्ञान प्राप्त किया था, उन परम पावन महान आत्मा को मेरा सादर शत-शत नमन..........
मेरे प्रेरणास्त्रोत, आदर्श, मार्गदर्शक, दार्शनिक, पिताश्री डॉ. तपेश चतुर्वेदी का एक संक्षिप्त परिचय :---

जन्मतिथि: 

१८ सितम्बर, १९२७
जन्मस्थान: 

मंझोली(जिला- गोरखपुर)
योग्यता: एम.ए.( अंग्रेजी, हिन्दी
, समाजशास्त्र) ; पीएच.डी.
व्यवसाय: 
विश्विद्यालय के अंतर्गत स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में १८ वर्ष अंग्रेज़ी तथा २० वर्षों तक हिन्दी साहित्य का कुल ३८ वर्षों का अध्यापन, 
अनेक शिक्षण संस्थाओ में प्राचार्य पद का निर्वहन,
सन १९८९ में सेवानिवृति पश्चात् मुंबई फिल्मक्षेत्र में लेखन कार्य

प्रकाशन: 

विनयपत्रिका-दर्शन (विस्तृत समीक्षा)
सुगम भाषा-विज्ञान,
हिन्दी भाषा का इतिहास,
उपन्यासकार वृन्दावनलाल वर्मा(झाँसी की रानी संदर्भित),
उपन्यासकार यशपाल(झूठा सच 
संदर्भित),
षोडश ग्रन्थ(अनूदित),
संगीत-वेद(अनूदित),
अनुभूतियाँ बोलती है (काव्य संग्रह),
इनके अतिरिक्त अनेक राष्ट्रीय प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओ में कविताये, लेख, निबंध, समीक्षायें प्रकाशित !

सामाजिक-कार्य: 
लोक कल्याण समिति के महासचिव पद पर २० वर्षो तक जनसेवा-कार्य |
जिला-कारागार,मथुरा के वीक्षक
भारतीय रेलवे की हिन्दी-परामर्श समिति के सदस्य
अखिल भारतीय महाविद्यालीय पत्रिका समिति के अध्यक्ष
अनेक शिक्षा प्रबंध समितियों के अध्यक्ष

महानिर्वाण: 
१८ नवम्बर, २००६ को प्रात: काल ब्रह्म मुहूर्त में शांतिपूर्वक ब्रह्मलीन |||

"एक ऐसा जलाएं दीया आज हम,मावसी रात को भी जो पूनम करे !
रोशनी का जो केवल दिखावा करें,उन सितारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
करने वालों ने वादे किये हैं बहुत,किन्तु पूरा करेंगे ये वादा नहीं !
जिनके कन्धों से ताकत विदा ले गयी,उन सहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
यों समन्दर में पानी की सीमा नहीं,किन्तु पीने के काबिल नहीं बूंद भी !
जिनसे प्यासों को जीवन नहीं मिल सके,उन फुहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
कुछ बदलने से मौसम ख़ुशी तो मिली,चाहता हूँ यह मौसम ना बदले कभी !
जिनके आने से बगिया में रौनक ना हो,उन बहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
हम भयानक भंवर से तो बचते रहे,पर तटों ने हमेशा छलावा किया !
जो लहर के थपेड़ों से खुद मिट गए,उन किनारों की हमको ज़रूरत नहीं !!"
(रचयिता-डॉ.तपेश चतुर्वेदी)

4 टिप्‍पणियां:

  1. डॉ.तपेश चतुर्वेदी का जीवन दर्शन उनकी सोच एवं नीतियों के माध्यम से शिक्षा जगत का उत्थान नितान्त आवश्यक है।
    'जय हिन्द,जय हिन्दी'

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  2. जन्म देती है माँ चलना सिखाते हैं पिता .....
    हर कदम पे बच्चों के रहनुमा होते हैं पिता |
    फूलों से लहराते ये मासूम बच्चे ,
    प्यारी सी इस बगिया के बागबान होते हैं पिता |
    कष्ट पे हमारे दुखी होते है बहुत ,
    अश्क आंखों से बहे न बहे पर दिल में रोते हैं पिता |
    धुप गम की हम तक न पहुँचे कभी,
    साया बन सामने खड़े होते हैं पिता |
    पूरी करने को सारी इच्छाएँ हमारी ,
    काम के बाद भी काम करते हैं पिता |
    गलतियों पे हमारी डाँटते हैं हमें,
    डाँट के ख़ुद भी दुखी होते हैं पिता |
    रो के जब सो जाते हैं हम ,
    पास बैठ देर तक निहारते हैं पिता |
    जीवन में आती हैं जब दो राहें कभी ,
    सही राह का इशारा कर देते हैं पिता |
    लड़खड़ाये जो कभी कदम हमारे ,
    आपनी बांहों मे थाम लेते हैं पिता |
    देने को अच्छा मुस्तक्बिल हमें ,
    पूँजी जीवन भर की हम पे लुटा देते हैं पिता |
    खुश रहें बेटियाँ दुनिया में अपनी ,
    कर्ज ले के भी बेटी का घर बसाते हैं पिता |
    निभाने को रीत इस दुनिया की ,
    भरे दिल से बेटी को विदा कर देते हैं पिता |
    उन्हें छोड़ जब दूर बस जाते हैं हम ,
    चीजें देख हमारी ख़ुद को बहलाते हैं पिता |
    यहाँ आके ये भी न सोचते हैं हम ,
    के जब न दिया तो क्या खाते हैं पिता |
    पहले समझ न पाए उन के प्यार को हम ,
    आज हुआ अहसास जब ख़ुद बने हैं पिता |
    माँ कहती रही पर माना नहीं हमने ,
    बहती रहीं अँखियाँ जब चले गए पिता ||
    (साभार)

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  3. यह रचना तो सभी बेटी के पिताओं को रुला देगी ।
    कोमल अहसासों को कितना संवेदनापूर्ण शब्दों में उतारा है आपने ।
    सच है बेटी पिता की कमजोरी होती है । लेकिन आजकल बेटियां ही पिता की ताकत भी बनती हैं ।
    यह मैं देख चुका हूँ ।
    अति सुन्दर रचना ।

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  4. अच्छा है जो ये कविता मेरे पापा न नहीं पढी वर्ना पक्का रो देते... कोई भी विदाई का विडियो या गाना देखकर अब उनकी भी ऑंखें भर आती हैं, छुपाने कि कोशिश बहुत करते हैं पर नाकाम कोशिश...
    अभी हाल ही में मेरी चचेरी बहन की शादी हुयी है ... आपकी कविता ने उसकी विदाई याद करवा दी ! बेहद उम्दा रचना ... आभार !
    ये वे भावनाएँ हैं जिन्हें अभिव्यक्त करने में कोई भी पिता संकोच करता है और इस आग में भीतर ही भीतर झुलसता रहता है। आप ने इस की आँच हम तक भी पहुँचा दी है।
    बहुत ही भावपूर्ण रचना है।
    यही तो बेटियों की ख़ुसूसियत होती है कि विभिन्न विचारधारा ,विभिन्न परिवेश के हर सदस्य को अपना बना लेती हैं
    दुआ है कि ऊपर वाला सभी लड़कियों को आप जैसा पिता दे.......................
    एक पिता के अंतर्मन की व्यथा का ऐसा सूक्ष्म और मर्मस्पर्शी चित्रण कि आंख भर आई.......
    आभार.सादर,

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