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शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

११ नवम्बर, २०११ (११-११-११) का संयोग


आज ११ नवम्बर, २०११ (११-११-११) को लेकर  संसार में काफी रोमांच है लेकिन यह सुनकर अटपटा लगेगा कि इसमें एक और ११ भी शामिल हैं। जी हां तीन ग्यारह के साथ ही अपने नवजात को दुनिया में लाने वालों की लंबी लाइन है। वहीं उसमें समय ११ बजे का समय भी जुड़ गया है। राजधानी में ही कई अस्पतालों में लोगों ने डॉक्टरों से ११-११-११- के साथ ११ बजे ही बच्चे को दुनिया में लाने का आग्रह किया है। नंबरों के इस संयोग को भुनाने में इंजीनियर से लेकर एक्जिक्यूटिव क्लास तक के लोग शामिल हैं। जिन्हें सर्जरी करा कर भी अपने बच्चे को दुनिया में लाना मंजूर है। जिसके लिए उन्होंने अस्पतालों में डॉक्टरों से तैयारी करवा रखे हैं।
दिल्ली एन.सी.आर. नोएडा की रहने वाली पेशे से इंजीनियर महिला की डिलिवरी होने में अभी कुछ समय बांकी है। लेकिन ११-११-११ को लेकर उनका उत्साह देखने लायक है। इलाज करने वाली डॉक्टर से इंजीनियर ने न सिर्फ ११ नवंबर को सर्जरी कर डिलिवरी करने की इच्छा प्रकट की है बल्कि ११ बजे दिन का शुभ मुहूर्त भी दे रखा है। इलाज करने वाली अपोलो अस्पताल की डॉ. सुषमा सिन्हा का कहना है कि इंजीनियर दंपति ने ११ नंवबर २०११ के ११ बजे सर्जरी करने विशेष मांग की है। मरीज के आग्रह पर वह इस सर्जरी के लिए विशेष तैयारी की है।
ऐश्वर्या भी इसी दिन मां बनेंगी । डिलिवरी डेट १४ नवंबर को है, उनके बच्‍चे के जन्‍म की तारीख नवंबर के दूसरे हफ्ते (१४ नवंबर) में दी गई है। सूत्र बताते हैं कि बच्‍चन परिवार चाहता है कि ऐश्वर्या राय ११/११/११(११ नवम्बर, २०११) को मां बनें, क्‍योंकि तारीख, महीने और दिन का यह संयोग (११ का मेल) सौ साल में एक बार आता है। अस्पताल के सूत्रों के मुताबिक बच्चे को इस खास तारीख को जन्म देने के लिए ऐश्वर्या सी सेक्शन सर्जरी भी करा सकती हैं।चूंकि अमिताभ बच्चन का जन्मदिन ११ को पड़ता है और ११.११ का संयोग है, इसलिए नन्हा बच्चन भी ११ को आएगा। इसी तरह मैक्स हॉस्पिटल साकेत की अंजना अनेजा का कहना है कि एक्जिक्यूटिव क्लास की एक महिला ने शुक्रवार के दिन ११ बजे सर्जरी कर डिलिवरी कराने का आग्रह किया है। अभी तक तक ११-११-११ के बारे में चर्चा हो रही थी लेकिन अपने मरीज की मांग में एक और ११ जुड़ने से वह आश्चर्यचकित हैं। इसी अस्पताल की डॉ. अनुराधा कपूर का कहना है कि उससे इलाज करवाने वाली तीन महिलाओं ने शुक्रवार के दिन ११ बजे सर्जरी से डिलिवरी कराने का आग्रह किया है। दो महिलाओं का बच्चा पेट के अंदर उल्टा है जिसके कारण डिलिवरी सर्जरी से ही संभव है। इनके डिलिवरी का डेट १२ और १३ नंवबर था। लेकिन दोनों महिलाओं ने आग्रह कर ११ नवंबर को ११ बजे सर्जरी करने के लिए कहा है। इसके लिए एक ही ओटी में तीनों सर्जरी को अंजाम दिया जाएगा ।
बच्चे के जन्म को ले कर अनुमानित तिथि में एक-दो दिनों का अंतर होना आम बात है। ऐसे में एक-दो दिनों के अंतर वाले गर्भवती महिलाओं को 11.11.11 को प्रसव करवाने में कोई खतरा नहीं है। बशर्ते की मां और बच्चे के स्वास्थ्य की जांच अच्छी तरह कर ली जाए। मान्यताओं के अनुसार यह दिन काफी शुभ बताया जाता है।

ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार ११ नवम्बर, २०११ (११-११-११) का संयोग इस प्रकार का है कि यदि बेटा हुआ तो उसमें निम्नलिखित जन्मजात गुण होंगे:-
(१) धनवान और राजयोग
(२) ईमानदार, ऊर्जावान
(३) कुशल नेतृत्वकर्ता
(४) पुरुषार्थी होगा ||

और यदि आज ११ नवम्बर, २०११ (११-११-११) बेटी हुई तो उसमें निम्नलिखित जन्मजात गुण होंगे:-
(१) शक्ति का अवतार
(२) संगीत से लगाव
(३) धर्मपरायण होगी
(४) लेखनी में निपुण ||

'जय हिन्द,जय हिन्दी'

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

'१३ अगस्त,२०११ को दुर्लभ खगोलीय घटना'



ज्योतिषीय एवं खगोलविज्ञान के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना में सौर मंडल के चार ग्रहों के एक साथ मिलने का दुर्लभ संयोग आमजनों को १३ अगस्त,२०११ की शाम के पश्चात देखने को मिलेगा। खगोल वैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि सौर मंडल में दो और तीन ग्रहों के मिलन का संयोग तो कई बार देखने का मिलता है लेकिन एक साथ चार ग्रहों के मिलने का संयोग कई वर्षों बाद देखने को मिलता है। इस दुर्लभ घटना को खगोल विज्ञान में 'ट्रिपल कंजक्शन विथ द मून' के नाम से जाना जाता है।सौर परिवार के दो ग्रहों के मिलन की खगोलीय घटना आमतौर पर एक या दो वर्ष में देखने को मिल जाती है। एक दिसंबर २००८ को शुक्र, वृहस्पति और चन्द्र ग्रह के मिलन की खगोलीय घटना दर्ज की गई थी लेकिन कई वर्ष बाद इस बार आगामी १३ अगस्त की शाम के बाद अर्ध चन्द्रमा के साथ शुक्र-मंगल और शनि ग्रह के मिलन की अद्भुत घटना का मनोरम नजारा देखने को मिलेगा।आकाश में १३ अगस्त को होने वाले इन चार ग्रहों के मिलन के समय घटित होने वाले सुन्दर दृश्य की इस खगोलीय घटना के तहत चन्द्रमा के साथ नजदीक चमकते तीनों ग्रहों को आमजन आसानी से पहचान सकते है। यह घटना भारत सहित उत्तरी गोलार्ध के हिस्से में सूर्यास्त के बाद पश्चिमी आकाश में दो घंटे तक दिखाई देगी।  इन ग्रहों की पहचान यह है कि चन्द्रमा के नजदीक सबसे चमकदार शुक्र एवं मंगल ग्रह लाल रंग तथा शनि ग्रह नीले रंग में चमकता हुआ नजर आएगा। यह चारों ग्रह आधा डिग्री के कोणीय दूरी पर सुन्दर आकृति बनाते हुए पास में आ जाएंगे तथा इन सभी ग्रहों को कोरी आंखो से देखा जा सकता है। खगोलीय घटना का पृथ्वी के मौसम और आमजन पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने बताया कि पश्चिमी आकाश में होने वाली इस घटना के दौरान मौसम साफ रहने वाले क्षेत्रों में इन ग्रहों के मिलन का अद्भुत नजारा अच्छी तरह दिखाई देगा।
यह खगोलीय घटना खगोल वैज्ञानिको के साथ शौकिया खोजकर्ताओं और जिज्ञासुओं के लिए भी महत्वपूर्ण है। कालगणना की नगरी उज्जैन में इस खगोलीय घटना के अनुसंधान और आमजन को देखने के लिए संस्थान द्वारा व्यवस्था की गई है ।
'जय हिंद,जय हिंदी'

सोमवार, 11 जुलाई 2011

ज्योतिषशास्त्र का वैज्ञानिक-दृष्टिकोण


यह सत्य है जब तक ज्योतिष और ग्रहों के तथाकथित असर साबित नहीं हो जाते, कम से कम तब तक तो ज्योतिष विद्या एक “अप्रायोगिक-विश्वास” ही है, लेकिन सिर्फ़ यही आधार ज्योतिष को विज्ञान नहीं होना सिद्ध नहीं करता, कुछ और भी आधार हैं जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है जिससे यह साबित किया जा सके कि ज्योतिष विज्ञान नहीं है, बल्कि कोरे अनुमान, ऊटपटाँग कल्पनायें और खोखला अंधविश्वास है । वैज्ञानिक ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा देने से कतराते है | 
क्या सत्ता में बैठा शासक वर्ग ज्योतिष को विज्ञान समझता है ? बिलकुल नहीं समझता है, अगर शासक वर्ग इसे विज्ञान समझता, तो इस क्षेत्र में कार्य करनेवालों के लिए कभी-कभी किसी प्रतियोगिता, अधिकृत संगोष्ठियों आदि का आयोजन होता और ज्योतिष क्षेत्र के विद्वानों को पुरस्कारों से सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जाता। दुर्भाग्य की बात है कि आज तक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। यदि पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए, तो लगभग सभी पत्रिकाएँ यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, साक्षात्कार,भविष्यवाणियॉ आदि निकालती ही रहती है, लेकिन जब आज तक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में कोई निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका और जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया, तो ऐसे ज्योतिष से संबंधित लेख, साक्षात्कार,भविष्यवाणियॉ आदि का क्या औचित्य है ? इस तरह मूल तथ्य की परिचर्चा के अभाव में फलित ज्योतिष को जाने-अनजाने काफी नुकसान हुआ है । 
ज्योतिष के सन्दर्भ में कारण और निवारण का सिद्धान्त अपना कर भौतिक जगत की श्रेणी मे ज्योतिष को तभी रखा जा सकता है,जब उसे पूरी तरह से समझ लिया जाये | विज्ञान की परिभाषा के अनुसार 'सिद्धांतों, नियमों, प्रयोगों, समालोचनाओं एवं प्रेक्षण के आधार पर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है वह विज्ञान है' | अब हमें यह विचार करना है कि क्या ज्योतिषशास्त्र इन सभी कसौटियों पर खड़ा उतरता है जिससे इसे विज्ञान कहा जा सकता है | इसके लिए कुछ तथ्यों पर हमें विश्लेषण करना आवश्यकता है |

(१) समस्त ब्रह्मांड की अति सूक्षम हलचल का प्रभाव भी पृथ्वी पर पडता है,सूर्य और चन्द्र का प्रत्यक्ष प्रभाव हम आसानी से देख और समझ सकते है,सूर्य के प्रभाव से ऊर्जा और चन्द्रमा के प्रभाव से समुद में ज्वार-भाटा को भी समझ और देख सकते है,जिसमे अष्ट्मी के लघु ज्वार और पूर्णमासी के दिन बृहद ज्वार का आना इसी प्रभाव का कारण है,पानी पर चन्द्रमा का प्रभाव अत्याधिक पडता है,मनुष्य के अन्दर भी पानी की मात्रा अधिक होने के कारण चन्द्रमा का प्रभाव मानव मस्तिष्क पर भी पडता है,पूर्णमासी के दिन होने वाले अपराधों में बढोत्तरी को आसानी से समझा जा सकता है,जो पागल होते है उनके असर भी इसी तिथि को अधिक बढते है,आत्महत्या वाले कारण भी इसी तिथि को अधिक होते है,इस दिन स्त्रियों में मानसिक तनाव भी अधिक दिखाई देता है,इस दिन आपरेशन करने पर खून अधिक बहता है,शुक्ल पक्ष मे वनस्पतियां अधिक बढती है,सूर्योदय के बाद वन्स्पतियों और प्राणियों में स्फ़ूर्ति का प्रभाव अधिक बढ जाता है,आयुर्वेद भी चन्द्रमा का विज्ञान है जिसके अन्तर्गत वनस्पति जगत का सम्पूर्ण मिश्रण है,कहा भी जाता है कि "संसार का प्रत्येक अक्षर एक मंत्र है,प्रत्येक वनस्पति एक औषधि है,और प्रत्येक मनुष्य एक अपना गुण रखता है,आवश्यकता पहिचानने वाले की होती है",’ग्रहाधीन जगत सर्वम",विज्ञान की मान्यता है कि सूर्य एक जलता हुआ आग का गोला है,जिससेसभी ग्रह पैदा हुए है,गायत्री मन्त्र मे सूर्य को सविता या परमात्मा माना गया है,रूस के वैज्ञानिक "चीजेविस्की" ने सन १९२० में अन्वेषण किया था,कि हर ११ साल में सूर्य में विस्फ़ोट होता है,जिसकी क्षमता १००० अणुबम के बराबर होती है,इस विस्फ़ोट के समय पृथ्वी पर उथल-पुथल,लडाई झगडे,मारकाट होती है,युद्ध भी इसी समय मे होते है,पुरुषों का खून पतला हो जाता है,पेडों के तनों में पडने वाले वलय बडे होते है,श्वास रोग सितम्बर से नबम्बर तक बढ जाता है,मासिक धर्म के आरम्भ में १४,१५,या १६ दिन गर्भाधान की अधिक सम्भावना होती है |
(२) विज्ञान की परिभाषा के अनुसार विज्ञान उसे कहते हैं जिनका प्रयोगशाला में परीक्षण किया जा सके और उसके प्रभाव का अध्ययन संभव हो | ज्योतिषशास्त्र के आलोचक इस आधार पर भी इसे विज्ञान मानने से इंकार करते हैं कि ज्योतिषशास्त्र के सिद्धान्तों एवं नियमों का भौतिक प्रयोगशाला में परीक्षण नहीं किया जा सकता है | यह सही है कि ज्योतिष विज्ञान का भौतिक प्रयोगशाला मे परीक्षण नहीं होता, परंतु इस विज्ञान में भी कारण और प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते है | इस विज्ञान के प्रयोग में गुरूत्वाकर्षण को कारण माना  जाता है व शरीर को वस्तु जिसके उपर अंतरिक्षीय तत्वों के प्रभाव का पौराणिक नियमों एवं सिद्धांतों के आधार पर विश्लेषण किया जाता हैं | इस आधार पर भौतिक विज्ञान के नियमों को मानने वाले ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान कह सकते हैं |
(३) विभिन्न ग्रहों की एक खास अवधि में निश्चित भूमिका को देखते हुए ही ‘गत्यात्‍मक दशा पद्धति की नींव रखी गयी। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपने गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति के अनुसार ही फल दिया करते हैं। उपरोक्त दोनो वैज्ञानिक आधार प्राप्त हो जाने के बाद भविष्यवाणी करना काफी सरल होता चला गया। ‘ गत्यात्मक दशा पद्धति ’ में नए-नए अनुभव जुडत़े चले गए और शीघ्र ही ऐसा समय आया ,जब किसी व्यक्ति की मात्र जन्मतिथि और जन्मसमय की जानकारी से उसके पूरे जीवन के सुख-दुख और स्तर के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र खींच पाना संभव हो गया। धनात्मक और ऋणात्मक समय की जानकारी के लिए ग्रहों की सापेक्षिक शक्ति का आकलण सहयोगी सिद्ध हुआ ।
(४) ज्योतिषियों के एक वर्ग की मान्यता है कि ज्योतिष और जड़ी-बूटियों की मदद से ब्लड कैंसर और अन्य गंभीर रोगों का भी इलाज संभव है। जातक की पत्रिका में यदि चंद्र और मंगल कमजोर स्थिति में हों और शनि रोग, मृत्यु या व्यय के घर में बैठे हैं तो व्यक्ति को ब्लड कैंसर की पूरी-पूरी आशंका रहती है । कुंडली में कमजोर चंद्र सफ़ेद रक्त कण को कम करता है तथा मंगल के कमजोर होने की स्थिति में व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कण कम होते हैं ।
(५) अधिकांश वैज्ञानिक इस आधार पर इसे विज्ञान मानने से इंकार करते हैं कि भौतिक विज्ञान में सिद्धांतों एवं नियमों के आधार पर जब किसी चीज का परीक्षण किया जाता है तब एक बार जो परिणाम मिलता है वही परिणाम दूसरी बार परीक्षण करने पर भी प्राप्त होता है, परंतु ज्योतिषशास्त्र में ऐसा नहीं होता है | जब कि ज्योतिष गणना में जो परिणाम एक बार आता है दूसरे ज्योतिषशास्त्री जब उसी सिद्धांत पर फलादेश करते हैं तो फलादेश अलग आता है | यदि ज्योतिषशास्त्र के उपलब्ध नियमों एवं सिद्धांतों को सूक्ष्मता से देखकर भविष्य कथन किया जाय तो परिणाम में अंतर आना संभव नहीं है, अत: जो अनिश्चित फलादेश की बात कह कर ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान मानने से इंकार करते हैं उन्हें सही नहीं कहा जा सकता |
(६) अरबों-खरबों रुपये के खर्च पर पलनें वाला विज्ञान अभी तक यह भी नहीं जानता कि मंगल लाल क्यों दिखता है, शनि चित्र-विचित्र रंगों से युक्त क्यों है, बृहस्पति पीला क्यों दिखता है आदि और इनका पृथ्वी और पृथ्वी पर रहनें वालों पर क्या कोई प्रभाव पड़ता है ? वह भी तब जब वह इसी सौरमण्डल के सदस्य हैं जिसमें हमारी पृथ्वी है। अनेकानेक प्रश्न हैं जिन्हें विज्ञान जानने का प्रयास कर रहा है और यह प्रयास जारी रहनें भी चाहिये | परन्तु ज्योतिषशास्त्र में आधुनिक वैज्ञानिक साधनों के अभाव में हजारों वर्ष पूर्व इन सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर दे दिया गया था |

(७) वर्तमान समय में जो पंचांग बन रहे हैं, वह लगभग सभी लहरी एफेमरी जो नाटिकल एल्मनॅक पर आधारित है ।  कम्प्यूटर प्रोग्राम में भी डाटाबेस यही एफेमेरी/अल्म है अतः समान चूक वहाँ भी हो गयी है। ज्योतिष गणना में ग्रह आकाश में सदैव एक निश्चित गति से चलते हैं यह ज्योतिष गणना का मुख्य आधार है। अन्तरिक्ष में, सौर धब्बो के अधिक बनने/ कम बननें या किसी केतु (कामेट) के संचरण या अन्य किसी अभिनव खगोलीय घटना वश ग्रहों की गति, भ्रमण स्थिति आदि पर विचलनकारी प्रभाव पड़्ते हैं, उनका आँकलन तभी संभव है जब प्राचीन ज्योतिष गणना पद्धति के अनुसार दृग ज्योतिषीय आधार पर पंचांग निर्मित हों और कम्प्यूटर प्रोग्राम में भी डाटाबेस यही प्राचीन ज्योतिष गणना पद्धति के अनुसार प्रोग्रामिंग की जाये।
(८) वर्तमान विज्ञान ने एक चमत्कारी बात का पता लगाया है कि शनि के दोनों ध्रुवों पर नीली रौशनी चमकती है । अभी हाल ही में आधुनिक और शक्तिशाली हबल टेलिस्कोप से नासा को भेजी गई तस्वीरों ने आश्चर्यजनक और हैरानी में डालने वाला खुलासा किया है | इन तस्वीरों से यह ज्ञात हुआ है कि शनिवार के दिन शनि के दोनों ध्रुवों पर नीली चमकदार रौशनी आश्चर्यजनक तरीके से बढ़ जाती है | यह रौशनी बिल्कुल वैसी ही है, जैसी कि हमारी पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के आकाश में दिखाई देती है । शनिवार की ये रौशनी कई गुना तेज़ क्यों हो जाती है इस बारे में विज्ञान अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है । यह तो स्पष्ट है कि विज्ञान के पास शनि की नीली रौशनी का कोई जवाब नहीं है, लेकिन ज्योतिषशास्त्र के पास है | हज़ारों साल से ही ज्योतिषशास्त्र ने शनि का रंग काला और नीला बताया है । शनि का प्रकोप शांत करने वाला रत्न नीलम है और शनि में दिखने वाली नीली रौशनी भी कुछ कुछ वैसी ही दिखती है। ज्योतिष में शनिवार के दिन का स्वामी भगवान शनि को ही माना जाता है | ज्योतिषशास्त्र मानता है कि शनिवार का स्वामी होने के कारण शनिवार को शनि देव की शक्ति का प्रभाव काफी ज्यादा रहता है । विज्ञान के क्षेत्र में इन तथ्यों को स्वीकार नहीं किया जाता है लेकिन इनका कोई समुचित उत्तर भी नहीं है |
(९) वैज्ञानिकों तक मंगल की धरती से पहुंची जानकारी कहती है कि मंगल की सतह लाल है | मंगल की सतह से मंगल का आकाश भी लाल ही दिखता है | ज्योतिषशास्त्र ने हज़ारों साल पहले कैसे मंगल का रंग लाल मान लिया । ज्योतिषशास्त्र में ये सिद्धांत लिख दिया कि लाल रंग के कपड़े के दान से मंगल ग्रह की शांति होती है और कैसे लाल रंग के मूंगे को मंगल का रत्न मान लिया गया । जब ज्योतिषशास्त्र ने ये नियम बनाए गए थे, तब मंगल ग्रह की कोई भी तस्वीर मौजूद नहीं थी । अब मंगल ग्रह की मिट्टी की जांच कर रहे वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल की ज़मीन में सोना और तांबा जैसी धातुओं की मात्रा हो सकती है और ज्योतिष के मुताबिक तांबा या सोने में ही मंगल के रत्न मूंगे को धारण किया जाता है । सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि बिना मंगल को समझे कोई कैसे उसे लाल रंग से जोड़ सकता है । ज्योतिषशास्त्र ने मंगल को हमेशा से एक गर्म और उग्र ग्रह माना है जो जोश हिंसा और युद्ध का कारक है और अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को अब जाकर ये जानकारी मिली है कि मंगल की सतह पर तापमान बहुत ज्यादा रहता है और साथ ही साथ मंगल के वातावरण में समय-समय पर भयानक तूफान उठते रहते हैं । अब हज़ारों साल पहले ज्योतिषशास्त्र के सिद्धांत लिखने वालों के पास ये जानकारियां ज्योतिषशास्त्र के वैज्ञानिक-दृष्टिकोण को ही पुष्ट करता है 

ज्योतिष को विज्ञान कहने के लिये इतने सब कारण क्या पर्याप्त नही है ? इतने विश्लेषण के पश्चात् मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ज्योतिषशास्त्र निश्चित रूप से विज्ञान कहलाने का अधिकार रखता है यह उस कसौटी पर खड़ा उतरता है जहां से किसी भी शास्त्र विषय को विज्ञान की संज्ञा प्राप्त होती है | ज्योतिषशास्त्र को अंधविश्वास या भ्रम कहने वाले अगर साफ मन से इस विषय का अध्ययन करें तो वे इसे विज्ञान मानने से इंकार नहीं कर सकते हैं | मुझे यह कहने में तनिक संकोच नहीं है कि ज्योतिषशास्त्र कभी एक निश्चित सिद्धांतों पर आधारित विज्ञान रहा था जिसकी रचना करने वालों के पास आकाशगंगा को समझने का कोई न कोई सशक्त माध्यम अवश्य था और अब तो बॉम्बे हाईकोर्ट भी ज्योतिष को विज्ञान होने की मान्यता दे चुका है । दुनिया भर के वैज्ञानिक भले ही ज्योषित को विज्ञान मानने से इनकार करते हों, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि ज्योतिष एक विज्ञान है। अदालत ने ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान के रूप में दी गई मान्यता रद्द करने के लिए दायर जनहित याचिका खारिज कर दी। जनहित मंच नामक गैर सरकारी संगठन की इस याचिका में फर्जी ज्योतिषियों, तांत्रिकों और वास्तुशास्त्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी । 
बॉम्बे हाईकोर्ट की पीठ ने कहा कि जहां तक ज्योतिष शास्त्र से जुड़े आग्रह का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मुद्दे पर विचार कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने भीज्योतिष को विज्ञान बताया है। शीर्ष अदालत ने वर्ष २००४ ईस्वी  में विश्वविद्यालयों को निर्देश भी दिया था कि वे ज्योतिष विज्ञान को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विचार करें । पीठ ने इस संबंध में केंद्र सरकार की ओर से दाखिल शपथ पत्र का भी हवाला दिया । 
सरकार ने शपथ पत्र में कहा है कि ज्योतिषशास्त्र चार हजार साल पुराना विश्वसनीय विज्ञान है और यह दवा व जादुई उपचार अधिनियम (आपत्तिजनक विज्ञापन) सन १९५४ ईस्वी के तहत नहीं आता । इसमें कहा गया है कि इस कानून के दायरे में ज्योतिष शास्त्र और संबंधित विज्ञान नहीं आते हैं । ज्योतिष शास्त्र जैसे समय की कसौटी पर परखे गए विज्ञान पर प्रतिबंध का विचार अनुचित व अन्यायपूर्ण है । यह याचिका जनहित मंच के संयोजक भगवानजी रैयानी और उनके सहयोगी दत्ताराम ने दायर की थी ।
पेस इंटर एस्ट्रोमेडिकल एसोसिएशन गुजरात की अध्यक्ष एवं भारतीय प्राच्य ज्योतिष शोध संस्थान की गुजरात प्रभारी श्रीमती सोनी ने ज्योतिष से जुड़े प्रश्न 'ज्योतिष विज्ञान है, गणित है अथवा ढकोसला है ?' के प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा कि "ज्योतिष ढकोसला नहीं है, यह विज्ञानसम्मत शास्त्र है। इसका उद्‍देश्य जनता के बीच व्याप्त अंधविश्वास को दूर करना है तथा भविष्य की गतिविधियों से परिचित कराना है। ज्यो‍‍तिष विज्ञान से भी पुराना विषय है। वर्तमान में भारत में ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों में भी ज्योतिष को मान्यता मिली हुई है ।"  
अत: यह कहा जा सकता है कि वर्तमान विज्ञान की नई शोध और खोजें ज्योतिष के पूर्व धारणाओं को पुष्ट करने हेतु सबूत इकट्ठे कर रही हैं और एक दिन ज्योतिष फिर से अपनी पुरानी गरिमा को अवश्य प्राप्त कर सकेगा । ज्योतिष समय का विज्ञान है, इसमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और कर्म इन पांच चीजों का अध्ययन कर भविष्य में होने वाली घटनाओं की जानकारी दी जाती है। यह किसी जाति या धर्म को नहीं मानता। वेद भगवान भी ज्योतिष के बिना नहीं चलते। वेद के छः अंग हैं, जिसमें छठा अंग ज्योतिष है। हमने पूर्व जन्म में क्या किया और वर्तमान में क्या कर रहे हैं, इसके आधार पर भविष्य में क्या परिणाम हो सकते हैं, इसकी जानकारी दी 'जाती है ।
'जय हिंद,जय हिंदी'

आधुनिक अंक ज्योतिष



अंक ज्योतिष में अंकों और ब्रह्मांडीय योजना के अंतर्गत अंकों के गुप्त रुझान और प्रवृत्ति का अध्ययन है । प्रत्येक अक्षर की भी अपनी आंकिक उपयोगिता होती है, जोकि ब्रह्मांडीय कंपन से संबंधित होता है । जिस नाम से हम पुकारे जाते हैं उसका अपना अनूठा कंपन होता है, जिसे कुछ अंक तक कम किया जा सकता है । सभी कंपन एक लय में नहीं होते हैं । अंक ज्योतिष के हिसाब से हम इसी प्रकार एक-दूसरे से संबंधित हैं ।
भारतीय ज्योतिषी आर्यभट्ट ने 498 ईसा पूर्व में कहा था, ‘स्थानम स्थानम दस गुणम’ जिसका अर्थ है अंकों को 10 से गुणा करने पर वे 10 गुने अधिक हो जाते हैं । इसे दशमलव पर आधारित आधुनिक अंक प्रणाली की उत्पत्ति कहा जा सकता है। अथर्ववेद में अंक प्रणाली और ज्योतिषशास्त्र में इसके उपयोग का उल्लेख किया गया है ।
भारतीय अंकज्योतिष में नौ ग्रहों सूर्य, चन्द्र, गुरू, यूरेनस, बुध, शुक्र, वरूण, शनि और मंगल की विशेषताओं के आधार पर गणना की जाती है। इन में से प्रत्येक ग्रह के लिए 1 से लेकर 9 तक कोई एक अंक निर्धारित किया गया है, जो कि इस बात पर निर्भर करता है कि कौन से ग्रह पर किस अंक का असर होता है ।
अंकज्योतिष में गणित के नियमों का व्यवहारिक उपयोग करके मनुष्य के अस्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर नजर डाली जा सकती है । व्यक्ति के जन्म के समय ग्रहों की जो स्थिति होती है, उसी के अनुसार उस व्यक्ति का व्यक्तित्व निर्धारित हो जाता है। एक प्राथमिक तथा एक द्वितीयक ग्रह प्रत्येक व्यक्ति के जन्म के समय उस पर शासन करता है। इसलिए, जन्म के पश्चात जातक पर उसी अंक का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है, जो कि जातक का स्वामी होता है। इस व्यक्ति के सभी गुण चाहे वे उसकी सोच, तर्क-शक्ति, भाव, दर्शन, इच्छाएँ, द्वेष, सेहत या कैरियर हो, इस अंक से या इसके संयोग वाले साथी ग्रह से प्रभावित होते हैं । यदि किसी एक व्यक्ति का अंक किसी दूसरे व्यक्ति के अंक के साथ मेल खा रहा हो तो दोनों व्यक्तियों के बीच अच्छा ताल-मेल बनता है ।
अंक ज्योतिष में आपके मूलांक का बहुत अधिक महत्व होता है | आपका मूलांक आपके जन्म की तारीख का योग है। यह अंक यह प्रदर्शित करता है कि आप जन्म के समय क्या थे और आप अपने पूर्वजों के किन गुणों को पूरे जीवन भर साथ ले जाएंगे। जिस नाम से आपको अन्य लोग पुकारते हैं, उससे आप पर बहुत प्रभाव पड़ता है। यदि यह अंकीय रूप से आपके मूलांक से मेल खा जाता है, तो आप अपने और अपने आसपास के लोंगों के लिए ज्यादा खुशी का माहौल बना सकते हैं। जो अंक आपके नाम से उत्पन्न होता है, उसे भाग्य अंक कहा जाता है ।
अंक ज्योतिष के अनुसार जिस प्रकार से आप स्वयं के बारे में अंक ज्योतिष द्वारा जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, उसी प्रकर आप यह भी समझ सकते हैं कि आप अन्य लोगों से किस तरह संबंधित हैं । इसके साथ ही आप यह भी जान सकते हैं कि आप दूसरे लोगों के कितने अनुरूप हैं ।इसका मित्र और शत्रु के आधार पर विभाजन किया जाता है |
आधुनिक अंक ज्योतिष के अनुसार आपके पास अपने शिशु के लिए उसके जीवन पथ अंक के साथ अच्छी तरह से कंपन करने वाले नाम को चुनने की क्षमता होती है । इसी प्रकार, आप अपने नाम को भी बिना उच्चारण और अर्थ बदले हुए, उसे मूलांक के अनुरूप कर सकते हैं ।

आंग्ल-भाषा की वर्णमाला के अनुसार प्रतेक वर्ण का अंक अलग-अलग होता है, जो निम्न सारिणी के अनुसार है:--

       1    2    3    4    5    6    7    8
       A    B    C    D    E    U    O    F
       I    K    G    M    H    V    Z    P
       J    R    L    T    N    W
       Q         S         X
       Y 
 
अंकज्योतिष शास्त्र के व्यवहारिक-नियमों  के अनुसार केवल एक ही नाम व अंक किसी एक व्यक्ति का स्वामी हो सकता है । जातकजीवन में अपने अंकों के प्रभाव के अनुसार ही अवसर व कठिनाइयों का सामना करता है। अंकज्योतिष शास्त्र में कोई भी अंक भाग्यशाली या दुर्भाग्यपूर्ण नहीं हो सकता, जैसे कि अंक ७(सात) को भाग्यशाली व अंक १३(तेरह) को दुर्भाग्यपूर्ण समझा जाता है । हम अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक जीवन में सुख-दुख का सामना करते ही रहते हैं। इन सुख-दुख के लिए कोई मजबूत कारण भी दिखाई नहीं देता है। अंक ज्योतिष में गणनाओं के द्वारा इस पर कुछ हद तक प्रकाश डाला जा सकता है। अंक ज्योतिष की यह गणनायें हमारे जीवन में आवश्यक बदलाव ला सकती हैं और हमारे जीवन को आशावादी दिशा प्रदान कर सकते है । इनके द्वारा हमें सफलता की दिशा भी मिलती है ।

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

'स्वप्न लोक और ज्योतिष'


ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा है कि यह संसार स्वप्न की तरह है। जिस प्रकार जागने पर स्वप्न झूठा प्रतीत होता है, उसी प्रकार आत्मा का ज्ञान प्राप्त होने पर यह संसार मिथ्या प्रतीत होता है । स्वप्न का संसार बड़ा ही अदभुत है और चमत्कारी भी है । क्योंकि इस निद्रा यज्ञ में इंसान उन ऊंचाइयों को छू लेता है, जिसकी कल्पना तक जाग्रत अवस्था में कोई व्यक्ति नहीं कर पाता । हमारे मस्तिष्क को दिन भर जो सिगनल मिलते हैं और भावनाएं जागृत होती है जिन्हें हम चाह कर के भी नहीं प्रकट कर पाते वह हमारे अवचेतन मन में दर्ज होते जाते हैं रात को जब शरीर आराम कर रहा होता है तब यह स्वप्न रूप में प्रकट होते हैं |

उपनिषदों के अनुसार आत्मचेतना में आत्मा की गति स्थूल कोषों से सूक्ष्म कोषों की ओर होती है। किन्तु वह सूक्ष्मतम आनन्दमय कोष में नहीं, बल्कि स्वयं आनन्दमय है। इसी प्रकार चेतना की दृष्टि से आत्मा की चार अवस्थाएँ होती हैं-
(१)--जाग्रत- (जागने की स्थिति, जिसमें सब इन्द्रियाँ अपने विषयों में रमण करती रहती हैं) ।
(२)--स्वप्न- (वह स्थिति जिसमें इन्द्रियाँ तो सो जाती हैं, किन्तु मन काम करता रहता है और अपने संसार की स्वयं सृष्टि कर लेता है) ।
(३)--सुषुप्ति- (वह स्थिति, जिसमें मन भी सो जाता है, स्वप्न नहीं आता, किन्तु जागने पर यह स्मृति बनी रहती है कि, नींद अच्छी तरह आई) |
(४)--तुरीया- (वह स्थिति, जिसमें सोपाधिक अथवा कोषावेष्टित जीवन की सम्पूर्ण स्मृतियाँ समाप्त हो जाती हैं।)

स्वप्न के सन्दर्भ में कुछ प्रसिद्द घटनाएँ:--
‘‘दि अंडर-स्टैंडिंग आफ ड्रीम्स एंड देयर एन्फ्लूएन्सेस ऑन दि हिस्ट्री ऑफ मैन’’ हाथर्न बुक्स न्यूयार्क द्वारा प्रकाशित पुस्तक में एडाल्फ हिटलर के एक स्वप्न का जिक्र है, जो उसने फ्रांसीसी मोर्चे के समय सन् १९१७ में देखा था । उसने देखा कि उसके आसपास की मिट्टी भरभराकर बैठ गई है, वह तथा उसके साथी लोहे में दब गये हैं- हिटलर बचकर भाग निकले, किंतु तभी बम विस्फोट होता है- उसी के साथ हिटलर की नींद टूट गयी । हिटलर अभी उठकर खड़े ही हुए थे कि सचमुच तेज धमाका हुआ, जिससे आसपास की मिट्टी भरभराकर ढह पड़ी और खंदकों में छिपे उनके तमाम सैनिक बंदूकों सहित दबकर मर गये। स्वप्न और दृश्य का यह सादृश्य हिटलर आजीवन नहीं भूले ।
टीपू सुल्तान को अपने स्वप्नों पर आश्चर्य हुआ करता था, सो वह प्रतिदिन स्वप्न डायरी में नोट किया करता था। उनके सच हुए स्वप्नों के विवरण कुछ इस  प्रकार हैं-
‘‘शनिवार 24 तारीख रात को मैंने सपना देखा। एक वृद्ध पुरुष कांच का एक पत्थर लिए मेरे पास आए हैं और वह पत्थर मेरे हाथ में देकर कहते हैं- सेलम के पास जो पहाड़ी है उसमें इस काँच की खान है, यह कांच मैं वहीं से लाया हूँ। इतना सुनते-सुनते मेरी नींद खुल गई ।"
टीपू सुल्तान ने अपने एक विश्वास पात्र को सेलम भेजकर पता लगवाया, तो ज्ञात हुआ कि सचमुच उस पहाड़ी पर काँच का भंडार भरा पड़ा है। इन घटनाओं से इस बात की पुष्टि होती है कि समीपवर्ती लोगों को जिस तरह बातचीत और भौतिक आदान-प्रदान के द्वारा प्रभावित और लाभान्वित किया जा सकता है, उसी तरह चेतना के विकास के द्वारा बिना साधना भी आदान-प्रदान के सूत्र खुले हुए हैं ।
धर्मयुग के १६ फरवरी,१९७५ के अंक में स्वप्नों की समीक्षा करते हुए एक अंधे का उदाहरण दिया गया था, अंधे से पूछा गया कि क्या तुम्हें स्वप्न दिखाई देते हैं इस पर उसने उत्तर दिया-मुझे खुली आँख से भी जो वस्तुएँ दिखाई नहीं देतीं, वह स्वप्न में दिखाई देती हैं। इससे फ्रायड की इस धारणा का खंडन होता है कि मनुष्य दिन भर जो देखता और सोचता-विचारता है, वही दृश्य मस्तिष्क के अंतराल में बस जाते और स्वप्न के रूप में दिखाई देने लगते हैं। निश्चय ही यह तथ्य यह बताता है कि स्वप्नों का संबंध काल की सीमा से परे अतींद्रिय जगत से है अर्थात् चिरकाल से चले आ रहे भूत से लेकर अनंत काल तक चलने वाले भविष्य जिस अतींद्रिय चेतना में सन्निहित हैं, स्वप्न काल में मानवीय चेतना उसका स्पर्श करने लगती है ।
स्वप्न  में मनुष्य की रुचि हमेशा से ही है। हमारे वेदों-पुराणों में भी स्वप्न के बारे में जिक्र किया गया है। 'अग्नि पुराण' में स्वप्न विचार और शकुन-अपशकुन पर भी विचार किया गया है । हमारे ऋषि-मुनियों के अनुसार सपनों का आना ईश्वरीय शक्ति का वरदान है और निद्रा की चतुर्थ अवस्था या रात्रि के अंतिम प्रहर में आए स्वप्न व्यक्ति को भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास कराते हैं । हमारे आदि ऋषि-मुनियों ने स्वप्न के मर्म को समझते हुए इनके ज्योतिषीय पक्ष के शुभा शुभ फलों के बारे में तो बताया, लेकिन यह पहेली अनसुलझी रह गई कि स्वप्न क्यों आते हैं और इनका मनोवैज्ञानिक आधार क्या है ?
स्वप्न के सन्दर्भ में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण:--

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वैवस्टर के अनुसार स्वप्न सोए हुए व्यक्ति के अवचेतन मस्तिष्क में चेतनावस्था के दौरान घटित घटनाओं, देखी हुई आकृतियों, कल्पनाओं व विचारों का अपरोक्ष रूप से चित्रांकन होना है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक फ्रॉयड के अनुसार हमारे दो मस्तिष्क होते हैं- पहला चेतन और दूसरा अवचेतन । हमारा जब चेतन मस्तिष्क सुप्तावस्था में होता है तो अवचेतन मस्तिष्क सक्रिय होना प्रारंभ होता है और इंसान के जीवन में घटी घटनाओं या निर्णयों के उन पहलुओं पर गौर करता है जिन पर चेतन मस्तिष्क में गौर नहीं कर पाता । स्वप्न के बारे में सन 1953 ईस्वी में यूसिन सेरिन्स्की सन १९७६ ईस्वी में मनोवैज्ञानिक ऎलेने हॉबसन व रॉबर्ट मैकार्ले ने अघ्ययन किया और इन्होंने फ्रॉयड के अवचेतन मस्तिष्क की अवधारणा को परिवर्तित रूप में प्रतिपादन किया जिसके कारण इन्हें आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा। इनके अनुसार नींद की चार अवस्था होती हैं। चौथी अवस्था में "रेम" सिद्धांत कार्य करता है। इसमें चेतन मस्तिष्क द्वारा उपेक्षित घटनाओं या अवस्थाओं का समेकित रूप होकर प्रतिकृति के रूप में सामने आते हैं । फ्रॉयड के ही अनुसार बुरे सपने आपको भावनात्मक अवसाद से बचाने के लिए आपका मनोबल बढ़ाते हैं और साथ ही भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास भी कराते हैं ।

स्वप्न के सन्दर्भ में चिकित्सा-विज्ञान और जीव-विज्ञान का दृष्टिकोण:--
जीव वैज्ञानिकों द्वारा किये गए एक अघ्ययन के अनुसार निद्रावस्था के दौरान दबाव कम करने वाला हॉर्मोन "कॉर्टिसोल" का स्त्राव ज्यादा होता है और इंसानी मन की स्मृतियां धीरे-धीरे मंद होती जाती हैं। ऎसे में अवचेतन मस्तिष्क से शेष बची स्मृतियां ही स्वप्न के रू प में साकार होती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि सपनों का संबंध घटित हुई या होने वाली घटनाओं से किसी ना किसी रू प में होता है। हां इनमें स्थान, पात्र व घटना की निरंतरता बीच-बीच में परिवर्तित हो सकती है ।
चिकित्सा-विज्ञान और जीव-विज्ञान के अनुसार स्वप्न दबी इच्छाओं के लिए एक तरह का सेफ्टी वाल्व है। सामान्यत: हर व्यक्ति हर रात करीब 2 घंटे स्वप्न देखता है। स्वप्न कुछ और नहीं, नींद के दौरान पैदा होने वाले विचारों, तस्वीरों और भावनाओं से जुड़ी मानसिक क्रिया है।
हमारी नींद कई चक्रों में बंटी होती है और हर चक्र कई चरणों में। हर चक्र की शुरुआत हल्की नींद से होती है। अंतिम 2 चरणों में गहरी नींद और रेम (रैपिड आई मूवमेंट) का नंबर आता है। हम हर रात 4 से 5 रेम पीरियड से गुजरते हैं। इनकी अवधि 5 से लेकर 45 मिनट तक की होती है। सारे सपने सिर्फ रेम पीरियड में ही दिखते हैं और सिर्फ स्तनधारियों को ही। रेंगने वाले जन्तुओं और कोल्ड ब्लडेड (ठंडे खून वाले) जीव-जन्तुओं को सपने नहीं आते, क्योंकि नींद के दौरान वे रेम पीरियड से नहीं गुजरते हैं।
नींद की शुरुआत में रेम पीरियड काफी छोटा होता है, लेकिन जैसे-जैसे नींद की अवधि लंबी होती जाती है, रेम पीरियड की अवधि भी बढ़ती जाती है। यही वजह है कि हम ज्यादातर सपने सुबह या नींद के आखिरी चक्र में देखते हैं। इसी वजह से कई बार जब हमारी नींद सुबह में खुलती है तो हम रेम पीरियड में होते हैं और थोड़े समय पहले देखे गए सपने दिमाग में मौजूद रहते हैं। अक्सर जो बुरे सपने याद रहते हैं, वह भी सुबह के वक्त ही देखे गए होते हैं। इसकी एकमात्र वजह है रेम पीरियड में नींद का खुलना। रेम पीरियड के बाद नींद खुलने पर व्यक्ति को कुछ भी याद नहीं रहता है। न ही अच्छा न ही बुरा ।
चिकित्सा-विज्ञान और जीव-विज्ञान के अनुसार यदि कोई व्यक्ति स्वप्न  देखें तो बुरे सपने (दु:स्वप्न) कुछ और नहीं बल्कि बढ़-चढ़ कर देखे गए सपने ही हैं। ऐसे सपने देखने का मतलब यह नहीं है कि कोई भूत, प्रेत या पिशाच पीछे पड़ा है। दरअसल ये सपने हम भीतरी तनाव, निराशा, व्याकुलता, मदिरा या फिर ड्रग्स के प्रभाव के कारण देखते हैं। इन चीजों के कारण रेम पीरियड बढ़ जाता है और हम लंबे-लंबे और ऊटपटांग सपने देखते हैं। वहीं कैफिनयुक्त पेय पदार्थों और कुछ दूसरे ड्रग्स का प्रभाव ठीक इसके विपरीत होता है। ये रेम पीरियड को छोटा कर देते हैं। कैफिन या रेम पीरियड को घटाने वाले ड्रग ऊटपटांग सपने देखने वालों के लिए काफी फायदेमंद साबित होते हैं ।
चिकित्सकों का सामना अक्सर ऐसे मरीजों से होता रहता है, जो दु:स्वप्न के शिकार होते हैं। ऐसे लोगों की सामान्य रूप से डर और चिंता के मारे नींद खुलने की शिकायत होती है। नींद खुलने के पीछे अधिकतर का यही कहना होता है कि स्वप्न में वे किसी मृत या जिंदा (जाने-अनजाने) व्यक्ति को देखते हैं। ऐसी स्थितियों को साधारण लोग भूत-प्रेत या पिशाच से जोड़ देते हैं। फिर अशिक्षा या अंधविश्वास के कारण वे ओझा, पुजारी, बाबा, तांत्रिक या किसी ठग के चक्कर में फंस जाते हैं।
बार-बार दु:स्वप्न देखने को ड्रीम एंग्जाइटी डिसॉर्डर कहा जाता है। इसके इलाज की जरूरत होती है। ठीक तरह से इलाज न होने पर इनसे पारिवारिक-जीवन के लिए भी परेशानी पैदा होने का खतरा रहता है। दु:स्वप्नदेखने की बीमारी पुरुषों की तुलना में महिलाओं में ज्यादा पाई जाती है। महिलाओं में यह समस्या युवा अवस्था में शुरू हो जाती है ।

स्वप्न के सन्दर्भ में ज्योतिषीय दृष्टिकोण:--
ऐसा माना जाता है कि यदि कोई बुरा स्वप्न दिखाई दे, तो नींद खुलते ही अपने आराध्य को ध्यान करके पानी पी लेना चाहिए। इसके पश्चात् फिर सोना नहीं चाहिए | ऐसी मान्यता भी है कि दिन में दिखे स्वप्न निष्फल होते हैं ।
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से स्वप्न का शुभ एवम अशुभ फलदायक प्रभाव:--
ज्योतिषशास्त्र के अनेक पुराणों एवम संहिता ग्रंथों में स्वप्नों के शुभाशुभ फल का विस्तृत वर्णन दिया गया है | अनेकों बार स्वप्न के माध्यम से हमें भविष्य में होने वाली शुभ या अशुभ घटना का संकेत मिलता है | मुझे बहुत से व्यक्तियों के ऐसे अनुभव सुनने में आये हैं कि उनको किसी शुभ या अशुभ घटना का संकेत पहले ही स्वप्न में मिल गया था |


शुभ-फलदायक स्वप्न:--ज्योतिषीय दृष्टिकोण से निम्न स्वप्नो का शुभ फल प्राप्त होता है :--


(१) स्वप्न में देव दर्शन , पितृ दर्शन , भाई–बहन और कुटुंबियों का दिखना शुभ माना जाता है ।
(२) स्वप्न में स्वयं को मृतक देखना , सर्प द्वारा काटना , खून निकलना , स्वर्ग दर्शन  , सर्प को मारना सूर्य चंद्र ग्रहण को देखना , सेना को देखना , वर्षा होते दिखाई देना मनोरथ पूर्ण होने के संकेत करता है ।
(३) यदि आप स्वप्न में स्वयं को मल में लिपटा हुआ पाते हैं या सांप ने आपको काट लिया है, तो इसका मतलब है कि आपको धन की प्राप्ति होगी। सपने में आपके सिर पर सांप काट ले, तो आप राजा तक बन सकते हैं ।
(४) स्वप्न में मृत्यु , शमशान मेंअंत्येष्टि , शव आदि दिखाई देते है तो शुभ-लाभ, उन्नति और मनोरथों की प्राप्ति होती है ।
(५) स्वप्न में मृत्यु देखना , लाश देखना , पाखाना देखना आदि शुभ एवं हाथी या घोडे द्वारा पीछा करना कोई बडा सम्मान या पदोन्नति दिलाता है ।
(६) स्वप्न में सुंदर स्त्री या अप्सरा देखना प्रेमी या प्रेमिका से मिलाप कराता है ।
(७) स्वप्न में दांत टूटना या नाखून काटना कर्ज से मुक्ति , ट्रेन दिखना यात्राकारक , बाग – बगीचा या हराभरा मैदान देखना , चिंता से मुक्ति दिलाता है ।

(८) स्वप्न में अपने को उड़ता देखना - यह आत्मविश्वास या स्वतंत्रता एवं मोक्ष का दर्शन है। आधुनिक विचारधारा इसे असाधारण क्षमता के प्रतीक के रूप में देखती है ।
(९) यदि स्वप्न में घोड़े देखें - घोड़े का दिखना स्वस्थ होने का सूचक है। यह परोक्ष दर्शन की क्षमता सुझाता है। कुछ लोग इसका संबंध प्रजनन से जोड़ते हैं ।
(१०) यदि स्वप्न में कबूतर दिखाई दे तो यह शुभ समाचार का सूचक है ।
(११)  यदि किसी व्यक्ति को सपने में गधा दिखाई दे या खुद को गधे की सवारी करते देखे तो इसके भी अलग-अलग फल भविष्य में प्राप्त होते हैं । 
(अ)यदि स्वप्न में व्यक्ति खुद को गधे पर बैठा हुआ देखता है तो उसे किसी विशेष संस्था में कोई ऊंचा पद प्राप्त हो सकता है ।
(ब)यदि स्वप्न में गधे की पीठ पर खुद को कुछ लादते हुए देखे तो समझ लेना चाहिए कि आपके सभी कष्ट और दुख दूर होने वाले हैं। अच्छे मित्र मिल सकते हैं ।

(१२) यदि कोई विवाहित स्त्री स्वप्न में छोटे बच्चे की स्वेटर आदि बुनती है तो उसे शीघ्र ही संतान सुख मिलता है।
(१३) यदि स्वप्न में किसी को सुंदर व नवजात शिशु दिखाई दे तो उसे भी सुंदर संतान का सुख प्राप्त होता है।
(१४) यदि स्वप्न में हरे-भरे खेत दिखे तो उसे संतान की प्राप्ति होती है।
(१५) यदि स्वप्न में अनार दिखाई दे तो संतान के साध धन लाभ भी होता है।
(१६) यदि स्वप्न में सफेद महल, सफेद तोरण या सफेद छत देखता है तो उसे धन व संतान की प्राप्ति होती है।
(१७) यदि स्वप्न में किसी को अपने नाखून बढ़े हुए दिखाई दें तो उसे धन-सम्पत्ति व संतान सुख मिलता है।
(१८) यदि स्वप्न में नि:संतान व्यक्ति सपने में दर्पण में अपना मुख देखता है तो उसे संतान प्राप्ति होती है।
(१९) यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति तिल, चावल सरसों, जौ, अन्न, का ढेर देखता है। उस व्यक्ति को जीवन में सभी सुख मिलते हैं ।
(२०) यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति कलश, शंख और सोने के गहने देखता है तो उसे जीवन में हर सुख मिलता है ।
(२१) यदि स्वप्न में खुद को चाय या चाय की चुस्की लेते देखें तो उसे जीवन में हर्ष उल्लास और समृद्धि मिलती है ।
(२२) यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति अपनी खोई हुई वस्तु प्राप्त करता है तो उसे आगामी जीवन में सुख मिलता है ।
(२३) यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति इन्द्र धनुष देखता है तो उसका जीवन बहुत सुखमय और खुशियों से भरा होता है ।
(२४) यदि स्वप्न में व्यक्ति खुद को पर्वत पर चढ़ता पाए, तो उसे एक दिन सफलता निश्चित मिलती है।
(२५) यदि स्वप्न में भंडारा कराते देखे तो व्यक्ति का जीवन धनधान्य से पूर्ण रहेगा।
(२६) यदि आप स्वप्न में देखते है कि आपका मकान मालिक आपसे किराया मांग रहा है तो समझ लीजिए कि इस स्वप्न का फल अति उत्तम है. भविष्य में आप खुद का मकान लेने वाले है या आपके व्यवसाय या नौकरी में उन्नति होने वाली है |

(२७) यदि स्वप्न में आपको अचानक ही छींक आती है और आप फ़ौरन ही अपने रुमाल से अपनी नाक साफ़ करने लगे है तो इस स्वप्न का फल आपके लिए अति उत्तम औरऐश्वर्यशाली है | भविष्य में आपकी आय में वृद्धि होगी या आय का दूसरा स्रोत मिलेगा, जिससे आपका काया कल्प होने वाला है |
(२८) यदि आप स्वप्न में किसी बच्चे को गोद में लेते है तो स्वप्न शुभ फलदायक होता है | आपको भविष्य में जुए, लॉटरी या सट्टे से बगैर कमाए ही धन मिल सकता है |
(२९) यदि आप स्वप्न में देखते है कि एक शेर आपके सामने आकार गर्जना कर रहा है.आपकी आँखे डर के मारें सहसा ही खुल जाती है, आप जितना डरे हुएं है उतना ही स्वप्न आपके लिए शुभ होगा | आने वाले दिनों में आपको अनेक सुन्दर स्त्रियों का स्नेह और शारीरिक सुख मिलने वाला है |
(३०) यदि आप अभी कुंवारे है, आप स्वप्न में देखते है कि कोई हथियार आपके सामने फर्श पर पड़ा हुआ है, इसका फल बहुत ही शुभ है अर्थात आपको आने वाले समय में शीघ्र ही जीवन साथी मिलने वाला है |
(३१) यदि स्वप्न में भालू आपको पेड़ पर चडता हुआ नजर आता है तो इसका फल बहुत ही शुभ होता है, आपको भविष्य में मनपसंद जीवनसाथी मिलने वाला है |
(३२) यदि स्वप्न में आप देखते है कि कुम्हार घड़ा बना रहा है, तो समझ लीजिए कि अब आपके कष्टों के दिन दूर होने वाले है | इस स्वप्न का फल अत्यंत ही शुभ और समृद्धिदायक होता है
(३३) यदि स्वप्न में आप अपने से उच्चस्थ पदस्थ पुरुष या अधिकारी से अशिष्टता से बात कर रहे है या अभद्र व्यवहार कर रहे है तो आपके लिए इस स्वप्न का फल शुभ है आप जो भी व्यवसाय या कार्य कर रहे होते है उसमें दिनोंदिन उन्नति होनी आरम्भ हो जायेगी |

अशुभ-फलदायक स्वप्न:--
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से निम्न स्वप्नो का अशुभ फल प्राप्त होता है :--

(१) यदि आप स्वप्न में टूटा हुआ हथियार देखते है तो इसका फल अशुभ है अर्थात जीवन साथी के मिलने में विलम्ब होगा, अगर यहीस्वप्न युवा लड़की देखती है तो भी यही फल प्राप्त होगा |
(२) यदि स्वप्न में व्यक्ति को किसी गधे की चीख सुनाई दे तो यह दुख की ओर संकेत करती है । व्यक्ति को किसी प्रकार का कोई कष्ट या विपत्ति आने की संभावना होती है ।
(३) यदि स्वप्न में किसी व्यक्ति को सांप दिखाई देते हैं तो निश्चित ही उसकी कुंडली में काल-सर्प योग होगा। सोते हुए सर्प को अपने शरीर की तरफ आते देख घबरा जाना, पानी पर तैरता हुआ सांप देखना, सांप को उड़ता हुआ देखना, सांप के जोड़े को हाथ पैरों में लिपटा हुआ देखना आदि कुंडली में काल-सर्प योग का प्रतीक होता है |
(४) यदि स्वप्न में कोई व्यक्ति खुद को चावल खाते देखे तो उस व्यक्ति को कई अलग-अलग सफलताएं और असफलताएं प्राप्त होती हैं। सपने में चावल दिखाई देने पर व्यक्ति को कड़ी मेहनत के बाद भी बहुत कम धन प्राप्त होता है ।
(५) यदि कोई व्यक्ति सपने में खोटी चांदी प्राप्त करता है तो इसका मतलब यही है कि निकट भविष्य में आपको धन की हानि हो सकती है। घर की सुख-समृद्धि बुरी तरह प्रभावित होगी । यदिवह व्यक्ति व्यापार करता है तो उसे हानि उठाना पड़ सकती है।
(६) यदि स्वप्न में व्यक्ति खुद को चांदी को गलाते हुए देखता है तो उसे अपने ही लोगों से नुकसान हो सकता है। मित्रों से बैर होने की संभावना बनेगी। चिंताएं और दुख में बढ़ोतरी होगी।
(७) यदि स्वप्न में चांदी की खान दिखाई दे तो उसे बदनामी झेलनी पड़ सकती है। इसी वजह से ऐसा सपना दिखाई देने पर सावधान रहने की आवश्यकता है ।
(८) यदि स्वप्न में व्यक्ति खुद को रोटी बनाता देखे, तो यह रोग का सूचक है ।
(९) वर्तमान में आप किसी खूबसूरत युवा स्त्री से प्यार कर रहे है और रात को स्वप्न में आपने देखा कि भालू आपके सामने खड़ा है तो मामला गडबड है, इसका फल आपके लिए शुभ नहीं है, क्योंकि स्वप्न में भालू को देखना इस बात का सूचक है कि आपकी प्रेमिका पर कोई दूसरा पुरुष भी डोरे डाल रहा है और वह उसकी ओर खींचती चली जा रही है जो निश्चय ही आपके लिए शुभ नहीं है |
(१०) स्वप्न में विकराल देवताओं के दर्शन ,  पिशाच और राक्षसी , नरक द्रश्य , बर्फ गिरते देखना अशुभ माना गया है ।
(११) स्वप्न में पानी में डूब जाना , बराती देखना , शराब पीना , सुंदर स्त्री को पाना , वृक्षों को काटना , विष खाना देखने का फल अशुभ होता है ।
(१२) स्वप्न में सिर का साफा टोपी गिरना , स्त्री से लडाई , दुबला या मोटा होना का फल शुभ परिणाम नहीं देते ।
(१३) स्वप्न में कबूतर , कौवा , गिद्ध , विद्युत , दिखाई देना , काला वस्त्र धारण करना , हंसना , अंगारे , भस्म , हंसता हुआ संन्यासी नदी का सूखना , गीत गाना , कीचड और घी का दिखना अशुभ माना गया है ।
(१४) स्वप्न में गोबर , तेल से स्नान , अग्नि में प्रवेद्गा करना , मरते हुए देखना , गडडे में गिर जाना , भूख लगना , गधे ऊंट की सवारी करना अशुभ फलदायी माना गया है ।
(१५) स्वप्न में दांतो का घिसना , खेलना , काले रंग की स्त्री से प्रेम करना , सियार , कुत्ता , बिलाव , मुर्गा , सर्प , नेवला  मधुमक्खी के दर्शन मांगलिक फल प्रदान नहीं करते ।
(१६) स्वप्न में बिच्छू देखना , मीठा खाना , पर्वत , मंदिर शिखर , ध्वजा देखना सूखे वृक्ष , पुराना धन – सिक्के देखना आंधी तूफान देखना भयंकर दांत सींग वाले जानवर , विचित्र मानव , खाली आलिशन भवन , शीशे का टूटना आदि दृश्य दिखाई देने पर अशुभ फलकारक होकर रोग,भय, पीडा और चिंता प्रदान करते है ।
(१७) स्वप्न में अग्नि , राज्याभिषेक , शादी , बियाबान जंगल , सडे – गले फल , मुरझाए फूल , अंधेरा , आंधी – तूूफान , उल्लू , बाज , सियार , बिल्ली , कौआ , नंगा व्यक्ति , कुत्ते का काटना , घोडे की पीठ या छत से गिरना , झाडू देना , जेब कटना , सूर्य डूबना , महाना या तैरना , भाषण देना , दरवाजे पर ताला लगा आदि देखना अशुभ फलदायक होता है ।
(१८) स्वप्न में यदि भैस या कोई अन्य हिंसक जीव पीछा करता दिखे तो , खतरा सामने है। यदि सांप दिखे तो संकट लेकिन यदि काट ले , तो ,खूब सारी धन की प्राप्ति होती है ।
(१९) स्वप्न में यदि कुत्ता काटे या आप ऊंचाई से गिर रहे हो तो मानहानि या किसी अन्य रुप में कष्ट संभव हैं ।
(२०) आप यदि शादीशुदा एक महिला है और स्वप्न में आपने अपने पति को काला चश्मा लगाते हुये देख रही है और उनके साथ कोई काला पशु भी है तो समझ लीजिए कि आपके पति का किसी दूसरी स्त्री के साथ संबंध चल रहा है |
(२१) आप एक युवा स्त्री है और रात को स्वप्न में आप किसी खूबसूरत और भोगविलास की सुख सुविधाओं से संपन्न बैडरूम में आराम फरमा रही है तो यह स्वप्न आपके लिए शुभ नहीं है इसका मतलब यह है कि भविष्य में आपके किसी पुरुष के साथ संबंध बनने वाले है जिसके कारण आपकी इज्जत और मान सम्मान की हानि होने की संभावना रहेगी |


"देव द्विज श्रेष्ठ वीर गुरू वृहद तपस्विन:। यद्वदन्ति नरं स्वप्ने सत्य मेविति तद्विदु।"
यदि सपने में वेद अघ्ययन देखा तो श्रेष्ठ है। देव, ब्राह्मन, श्रेष्ठ वीर, गुरू, वृहद तपस्वी जो कुछ आपको स्वप्न में कहें उसे सत्य मानें ।

सूर्योदय से कुछ पहले अर्थात ब्रह्म मुहूर्त में देखे गए सपने का फल दस दिनों में सामने आ जाता है। रात के पहले पहर में देखे गए सपने का फल एक साल बाद, दूसरे पहर में देखे सपने का फल छह महीने बाद, तीसरे पहर में देखे सपने का फल तीन महीने बाद और आखिरी पहर के सपने का फल एक महीने में सामने आता है ।
स्वप्न के सन्दर्भ में स्वप्न ज्योतिष के अनुसार स्वप्न चार प्रकार के होते हैं:--
पहला दैविक,
दूसरा शुभ,
तीसरा अशुभ
चौथा मिश्रित |
दैविक व शुभस्वप्न कार्य सिद्ध की सूचना देते हैं। अशुभ स्वप्न कार्य असिद्धि की सूचना देते हैं तथा मिश्रित स्वप्न मिश्रित फलदायक होते हैं। यदि पहले अशुभ स्वप्न दिखे और बाद में शुभ स्वप्न दिखे तो शुभस्वप्न के फल को ही पाता है। अगर आपको लगातार बुरे सपने आते हों तो उसके अशुभ फल से बचने के लिए यह उपाय आपके लिए लाभदायक हो सकते हैं-
(१)- बुरे स्वप्न को देखकर यदि व्यक्ति उठकर पुन: सो जाए अथवा रात्रि में ही किसी से कह दे तो बुरे स्वप्न का फल नष्ट हो जाता है।
(२)- सुबह उठकर भगवान शंकर को नमस्कार कर स्वप्न फल नष्ट करने के लिए प्रार्थना कर तुलसी के पौधे को जल देकर उसके सामनेस्वप्न कह दें। इससे भी बुरे सपनों का फल नष्ट हो जाता है।
(३)- अपने गुरु का स्मरण करने से भी बुरे स्वप्नों के फलों का नाश हो जाता है।
(४)- धर्म शास्त्रों के अनुसार रात में सोते समय अपने आराध्य का स्मरण करने से भी बुरे सपने नहीं आते ।
(५)-चिकित्सा-विज्ञान और जीव-विज्ञान के अनुसार दु:स्वप्न या मृत प्राणियों को सपने में देखना कोई नई बात नहीं है।
(६)-आयुर्वेद में इसकी विस्तार से चर्चा है। वात असंतुलन को इसका कारण माना गया है और वात को संतुलित करने वाली जीवन शैली कोअपनाना इसका इलाज माना गया है।
(७)-योगशास्त्र के अनुसार प्राणायाम, सम्मोहन, काउंसलिंग, ध्यान, योग, जलनेति और नियमित रूप से कसरत वगैरह से दु:स्वप्न के शिकार लोगों को काफी मदद मिलती है। 
हनुमान चालीसा में एक दोहा है: भूत पिशाच निकट नहीं आवे...। मिथकीय संदर्भ में देखें तो हनुमान को ऐसे रूप में दर्शाया गया है जिसे प्राणायाम और उससे जुड़ी दूसरी सिद्धियों पर अधिकार प्राप्त है। दोहे का मूल अर्थ यह है कि प्राणायाम आदि से खुद को जोड़ कर इन व्याधियों से मुक्ति पाई जा सकती है।  

'जय हिंद,जय हिंदी'

'जीवन पर दिशाओं का पड़ने वाला प्रभाव'



सम्पूर्ण सौरमंडल में पृथ्वी एक बहुत बड़ा चुम्बकीय ग्रह है। इस पृथ्वी के दो सिरे हैं : उत्तरी ध्रुव  और दक्षिणी ध्रुव । चुम्बक का लौह तत्व से आकर्षण सर्वविदित है । मनुष्य शरीर का 66 प्रतिशत अंश तरल है जिसमें लौह तत्व की बहुलता है इसलिए मनुष्य एक चलता फिरता चुम्बक है जिसकी संगति भौगोलिक चुम्बक से अवश्य बैठनी चाहिए। इसीलिए दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोना घातक माना गया है क्योंकि इससे भौगोलिक उत्तरी ध्रुव और मानवीय उत्तरी ध्रुव एक मुखी होने के नाते असंतुलन पैदा करता है क्योंकि समान चुम्बकीय ध्रुव विकर्षण कारक होते हैं। हमें सदा दक्षिण की ओर सिर करके सोना चाहिए जिससे भौगोलिक व मानवीय चुम्बकीय ध्रुवों में आकर्षण बैठ सके। पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य एवम अन्य जीव-जंतुओं के जीवन पर दिशाओं के प्रभाव को जानने से यह ज्ञात हो जाता है कि प्रकृति का जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण होता है |  हमें दसों दिशाओं के बारे में कुछ मूलभूत बातें जानना आवश्यक है, यह निम्नलिखित प्रकार से हैं :--
(१) पूर्व-दिशा: यह प्रकाश, ज्ञान, चेतना का स्रोत है। भगवान सूर्य इस दिशा में उदित होकर सभी प्राणियों में स्फूर्ति व उर्जा का संचार करते हैं। इन्द्र इसके देवता हैं और सूर्य ग्रह। पूजा ध्यान, चिंतन तथा अन्य बौद्धिक कार्य पूर्वाभिमुख होकर करने से इनकी गुणवत्ता बढ़ जाती है। इस दिशा की ओर खुलने वाला भवन सर्वोत्तम माना गया है। प्रात:काल पूर्व दिशा से आने वाली हवा का घर में निर्वाध रूप से प्रवेश होना चाहिए ताकि सारा घर सकारात्मक उर्जा से आपूरित हो जाए । पूर्वी दिशा का स्थल ऊँचा हो, गृहस्वामी दरिद्र बन जायेगा संतान अस्वस्थ्य तथा मंदबुद्धि वाली होगी | इस दिशा की ओर खाली जगह रखे बिना सरहद को जोड़कर निर्माण कार्य करने पर या तो पुरुष-संतान की कमी होती है अथवा संतान होने पर विकलांग होगी |

(२) आग्नेय: अग्नि इसके देवता हैं और शुक्र ग्रह। आग्नेय दिशा में जलाशय आदि (waterbody) नहीं होना चाहिए। इस दिशा में रसोई का होना बहुत शुभ है। आग्नेय दिशा में ऊंची भूमि धनदायक मानी गई है। इस दिशा की ओर मुंह करके गंभीर चिंतन कार्य नहीं करना चाहिए।

(३) दक्षिण-दिशा: इसके देवता यम हैं और मंगल ग्रह। यह दिशा सबसे अशुभ मानी गई है परन्तु इस ओर सर कर सोना स्वास्थ्य-र्वध्क व शांतिदायक है। यदि इस ओर भूमि ऊंची हो तो वह सब कामनाएं संपूर्ण करती है और स्वास्थ्य र्वध्क होती है। भवन कभी भी दक्षिण की ओर नहीं खुलना चाहिए बल्कि इस दिशा में शयन-कक्ष होना उत्तम है।

(४) दक्षिण-पश्चिम: निऋति नामक राक्षस इसका अधिष्ठता है और राहु-केतु इसके ग्रह हैं। यह दिशा भी कुछ शुभ नहीं है। पर गृह स्वामी और स्वामिनी का निवास स्थान इसी दिशा में होने से उनका अधिकार बढ़ता है। संभवत: यह इस बात का द्योतक है कि शासक की तरह गृहस्वामी को भी अवांछनीय और शरारती तत्वों पर नियंत्राण रखना चाहिए। इस दिशा में भी द्वार नहीं होना चाहिए तथा इस ओर जल-प्रवाह प्राणघातक, कलहकारी व क्षयकारक माना गया है। इस दिशा में शौचालय, भंडार-गृह होना उचित है।

(५) पश्चिम दिशा: वरुण इसके देवता हैं और शनि ग्रह। यह सूर्यास्त की दिशा है। इसलिए पश्चिमाभिमुख होकर बैठना मन में अवसाद पैदा करता है। पश्चिम में भोजन करने का स्थान उत्तम है। सीढ़ियां, बगीचा, कुंआ आदि भी इस ओर हो सकता है। पश्चिम की ओर सिर करके सोने से प्रबल चिन्ता घेर लेती है।

(६) वायव्य दिशा : इस दिशा के देवता वायु हैं तथा चन्द्रमा ग्रह। यह दिशा चंचलता का प्रतीक है। इस दिशा की ओर मुख करके बैठने से मन में चंचलता आती है और एकाग्रता नष्ट होती है। जिस कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो, उसे इस दिशा में निवास करना चाहिए जिससे उसका विवाह शीघ्र हो जाए। दुकान आदि व्यापारिक प्रतिष्ठान वायव्य दिशा में होने से ग्राहकों का आवागमन बढ़ेगा तथा सामान जल्दी बिकेगा। ध्यान चिंतन तथा पठन-पाठन के लिए यह दिशा उत्तम नहीं है।

(७) उत्तर दिशा : कुबेर तथा चन्द्र इसके देवता हैं तथा बुद्ध इसका ग्रह है। यह दिशा शुभ कार्यों के लिए उत्तम मानी गई है। पूजा, ध्यान, चिंतन, अध्ययन आदि कार्य उत्तराभिमुख होकर करने चाहिए। धन के देवता कुबेर की दिशा होने के कारण इस दिशा की ओर द्वार समृद्धि दायक माना गया है। देव-गृह, भंडार और घन-संग्रह का स्थान इसी दिशा में होना चाहिए। इस ओर जलाशय (water body) का होना अत्युत्तम है पर कभी भी इस ओर सिर करके नहीं सोना चाहिए।

(८) ईशान (उत्तर-पूर्व) इसके देवता भगवान शंकर और ग्रह बृहस्पति हैं। दसों दिशाओं में यह सर्वोत्तम दिशा है। यह ज्ञान (पूर्व) और समृद्धि; (उत्तर) का मेल है। इस ओर द्वार होना सबसे अच्छा है। इससे आने वाली वायु सारे घर को सकारात्मक उर्जा से परिपूरित कर देती है। पूजा स्थान इसी दिशा में होना चाहिए। जल-स्थान (water body) और बगीचा आदि इस दिशा के सुप्रभाव को बढ़ा देता है और घर में सुख-समृद्धि लाता है । 
भूमि का ढाल उत्तर या पूर्व की ओर शुभ होता है । भूखण्ड का उत्तर एवं पूर्वी भाग सबसे नीचा होना चाहिए ।

इसके अतिरिक्त दो दिशाएं और हैं- ऊर्ध्व ऐवम अध: (उपर व नीचे) अर्थात आकाश और पाताल |

(९) आकाश (ऊर्ध्व ) दिशा : धरती के वाह्य अन्तरिक्ष का वह भाग जो उस पिण्ड के सतह से दिखाई देता है, वही आकाश (ऊर्ध्व दिशा) है । अनेक कारणों से इसे परिभाषित करना कठिन है । दिन के प्रकाश में पृथ्वी का आकाश गहरे-नीले रंग के सतह जैसा प्रतीत होता है जो हवा के कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णनके परिणामस्वरूप घटित होता है । नासा के केपलर टेलीस्कोप  ने ग्रहों की पहचान करते समय यह पाया कि कोई 50 करोड़ ग्रह गोल्डीलॉक्स जोन के रूप में हैं, जहां का जलवायु न तो बहुत गरम और न तो बहुत ठंढा है, और वहां जीवन सम्भव हो सकता है । वैज्ञानिकों ने उन ग्रहों की संख्याओं को लिया है, जिन्हें उन्होंने रात्रिकालीन आकाश के एक छोटे से हिस्से की तलाश के प्रथम वर्ष में पाया था, और उसके बाद उन्होंने एक आंकड़ा तैयार किया कि ग्रहों के पास कितने तारे हो सकते हैं। नासा के केपलर टेलीस्कोप  ने ग्रहों की पहचान की, क्योंकि वे पृथ्वी और तारों के बीच की कक्षा से होकर गुजरते हैं । अभी तक नासा के केपलर टेलीस्कोप ने 1,235 प्रतिनिधि ग्रह पाए हैं। इनमें से 54 गोल्डीलॉक्स जोन में हैं, जहां जीवन सम्भव हो सकता है ।

(१०) पाताल(अध:) दिशा : समस्त भूमण्डल पचास करोड़ योजन विस्तार वाला है। इसकी ऊंचाई सत्तर सहस्र योजन है। इसके नीचे सात पाताल नगरियां हैं । हिन्दू धर्म के अनुसार पाताल पृथ्वी के नीचे होते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार सात प्रकार के पाताल लोक होते हैं । ये पाताल लोक इस प्रकार से हैं:-
(i )अतल
(ii)वितल
(iii)नितल
(iv)गभस्तिमान
(v)महातल
(vi)सुतल
(vii)पाताल
सुन्दर महलों से युक्त वहां की भूमियां शुक्ल, कृष्ण, अरुण और पीत वर्ण की तथा शर्करामयी (कंकरीली), शैली (पथरीली) और सुवर्णमयी हैं। वहां दैत्य, दानव, यक्ष और बड़े बड़े नागों की जातियां वास करतीं हैं। वहां अरुणनयन हिमालय के समान एक ही पर्वत है।

मुख्य दिशाएँ वास्तु या मकान की मध्य रेखा से 22.5 अंश या ज्यादा घूमी हुई हो तो ऐसे वास्तु को विदिशा में बना मकान या वास्तु कहा जाता है। ऐसे विदिशा मकान में वास्तु के उक्त सभी नियम व प्रभाव पूरी तरह नहीं लागू होते । यदि किसी घर में वास्तुदोष पता नहीं हो अथवा ऐसा वास्तुदोष हो जो ठीक करना संभव न हो तो उस मकान के चारों कोनों में एक-एक कटोरी मोटा (ढेलावाला) नमक रखा जाय। प्रतिदिन कमरों में नमक के पानी का अथवा गौमूत्र (अथवा गौमूत्र से निर्मित फिनाइल) का पौंछा लगाया जाय। इससे ऋणात्मक ऊर्जाओं का प्रभाव कम हो जायेगा। जब नमक गीला हो जाये तो वह बदलते रहना आवश्यक है। वास्तु दोष प्रभावित स्थल पर देशी गाय रखने से भी वास्तुदोष का प्रभाव क्षीण होता है ।
'जय हिंद,जय हिंदी'   

'सूर्य-राशियों (Sun-Signs) की नई पद्धति'



आपकी राशि क्या है ? इस सवाल का जवाब देने से पहले जरा ठहरिए, क्योंकि पृथ्वी का अलाइनमेंट बदलने से सभी राशियों का समय भी बदल गया है। इसके अलावा अब नई पद्धति में राशियों(Sun Signs) की संख्या १२ के स्थान पर १३ राशियां हो गई हैं। यह शोध भले ही नया हो, लेकिन यह  परिवर्तन कई हजार वर्ष पहले ही आ चुका है, जो अब हमारे सामने नई शोध के रूप में आ पहुंचा है |शोधकर्ताओं का कहना है कि यह परिवर्तन अचानक रातोंरात नहीं आया है । विगत तीन हजार सालों से साल के अलग-अलग समय के लिए १२ राशियां तय थीं। इस दौरान तारे अपनी चाल बदल चुके हैं और लगातार सूर्य की परिक्रमा कर रही पृथ्वी की स्थिति भी बदल गई है। इसकी वजह से राशियां करीब एक महीने आगे बढ़ गई हैं। यही कारन है कि अधिकांश भविष्यवाणियां गलत साबित हो रही है |
अब तक हम अपने सूर्य राशियां(Sun Signs) देखते आ रहे थे, लेकिन चंद्रमा की ओर गुरुत्वाकर्षण बल बढ़ने के कारण सितारों की स्थितियां बदल गई हैं। अब चंद्र राशि को देख कर ही भविष्यवाणी सटीक बैठेगी | ऐसा होने से एक और नई राशि बन गई है, जिसका नाम ओफियूकस रखा गया है। यह राशि वृश्चिक के बाद और धनु के पहले आएगी और इस प्रकार राशियों की संख्या १३ बन गई है!

इस हिसाब से नई पद्धति आने के बाद अधिकांश लोगों की राशि बदल जाएगी और दुनिया के बड़े-बड़े ज्‍योतिषी इस पर चर्चा में जुट गए हैं। जानकारों का कहना है कि नई पद्धति में भले ही किसी शख्स की राशि बदल जाए पर जन्म कुंडली पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा | अब देखतें है कि आगे भविष्यवाणी कैसे की जा सकेगी!शोधकर्ता-ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि ओफियूकस राशि वाला व्यक्ति ईमानदार, बुद्धिजीवी, इर्ष्यालु और सेक्स अपील वाला होगा।
आप नीचे देखिए राशियों के क्रमांक
पर ध्यान दीजिए 
और जानिए, नई पद्धति लागू होने पर आपकी राशि क्या होगी--

मेष: १८ अप्रैल से १३ मई
वृषभ:१३ मई से २१ जून
मिथुन : २१ जून से २० जुलाई
कर्क : २० जुलाई से १० अगस्‍त
सिंह : १० अगस्‍त से १६सितंबर
कन्‍या : १६ सितंबर से ३० अक्‍तूबर
तुला : ३० अक्‍तूबर से २३ नवंबर
वृश्चिक : २३ नवंबर से २९ नवंबर
ओफियूकस : २९ नवंबर से १७ दिसंबर
धनु : १७ दिसंबर से २० जनवरी
मकर : २०जनवरी से १६ फरवरी
कुंभ: १६ फरवरी से ११ मार्च
मीन : ११ मार्च से १८ अप्रैल

'जय हिंद,जय हिंदी'

'भारतीय ज्योतिषशास्त्र और इसके भेद'



भारतीय ज्योतिष का प्राचीनतम इतिहास (खगोलीय विद्या) के रूप सुदूर भूतकाल के गर्भ मे छिपा है,केवल ऋग्वेद आदि प्राचीन ग्रन्थों में स्फ़ुट वाक्याशों से ही आभास मिलता है,कि उसमे ज्योतिष का ज्ञान कितना रहा होगा। निश्चित रूप से ऋग्वेद ही हमारा प्राचीन ग्रन्थ है,बेवर मेक्समूलर जैकीबो लुडविंग ह्विटनी विंटर निट्ज थीवो एवं तिलक ने रचना एवं खगोलीय वर्णनो के आधार पर ऋग्वेद के रचना का काल ४००० ई. पूर्व स्वीकार किया है। चूंकि ऋग्वेद या उससे सम्बन्धित ग्रन्थ ज्योतिष ग्रन्थ नही है,इसलिये उसमे आने वाले ज्योतिष सम्बन्धित लेख बहुधा अनिश्चित से है,परन्तु मनु ने जैसा कहा है कि "भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिद्धयति"। इससे स्पष्ट है कि वेद त्रिकाल सूत्रधर है,और इसके मंत्र द्रष्टा ऋषि भी भी त्रिकालदर्शी थे ।
ज्योतिष शास्त्र एक बहुत ही वृहद ज्ञान है। इसे सीखना आसान नहीं है। ज्योतिष शास्त्र को सीखने से पहले इस शास्त्र को समझना आवश्यक है। सामान्य भाषा में कहें तो ज्योतिष माने वह विद्या या शास्त्र जिसके द्वारा आकाश स्थित ग्रहों, नक्षत्रों आदि की गति, परिमाप, दूरी इत्या‍दि का निश्चय किया जाता है।
ज्योतिष शास्त्र की व्युत्पत्ति 'ज्योतिषां सूर्यादि ग्रहाणां बोधकं शास्त्रम्‌' की गई है। हमें यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि ज्योतिष भाग्य या किस्मत बताने का कोई खेल-तमाशा नहीं है। यह विशुद्ध रूप से एक विज्ञान है। ज्योतिष शास्त्र वेद का अंग है। ज्योतिष शब्द की उत्पत्ति 'द्युत दीप्तों' धातु से हुई है। इसका अर्थ, अग्नि, प्रकाश व नक्षत्र होता है। शब्द कल्पद्रुम के अनुसार ज्योतिर्मय सूर्यादि ग्रहों की गति, ग्रहण इत्यादि को लेकर लिखे गए वेदांग शास्त्र का नाम ही ज्योतिष है।
छः प्रकार के वेदांगों में ज्योतिष मयूर की शिखा व नाग की मणि के समान सर्वोपरी महत्व को धारण करते हुए मूर्धन्य स्थान को प्राप्त होता है। सायणाचार्य ने ऋग्वेद भाष्य भूमिका में लिखा है कि ज्योतिष का मुख्य प्रयोजन अनुष्ठेय यज्ञ के उचित काल का संशोधन करना है। यदि ज्योतिष न हो तो मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र, ऋतु, अयन आदि सब विषय उलट-पुलट हो जाएँ।
ज्योतिष शास्त्र के द्वारा मनुष्य आकाशीय-चमत्कारों से परिचित होता है। फलतः वह जनसाधारण को सूर्योदय, सूर्यास्त, चन्द्र-सूर्य ग्रहण, ग्रहों की स्थिति, ग्रहों की युति, ग्रह युद्ध, चन्द्र श्रृगान्नति, ऋतु परिवर्तन, अयन एवं मौसम के बारे में सही-सही व महत्वपूर्ण जानकारी दे सकता है। इसलिए ज्योतिष विद्या का बड़ा महत्व है ।
महर्षि वशिष्ठ का कहना है कि प्रत्येक ब्राह्मण को निष्कारण पुण्यदायी इस रहस्यमय विद्या का भली-भाँति अध्ययन करना चाहिए क्योंकि इसके ज्ञान से धर्म-अर्थ-मोक्ष और अग्रगण्य यश की प्राप्ति होती है। एक अन्य ऋषि के अनुसार ज्योतिष के दुर्गम्य भाग्यचक्र को पहचान पाना बहुत कठिन है परन्तु जो जान लेते हैं, वे इस लोक से सुख-सम्पन्नता व प्रसिद्धि को प्राप्त करते हैं तथा मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग-लोक को शोभित करते है |

ग्रह नक्षत्रों के परिज्ञान से काल का उद्बोधन करने वाला शास्त्र ज्योतिष शास्त्र ही है। प्रन्तु उस उद्बोधन के साथ आकाशीय चमत्कार को देखने के लिये गणित ज्योतिष के तीन भेद किये गये हैं:-
१.सिद्धान्त गणित--
जिस गणित के द्वारा कल्प से लेकर आधुनैक काल तक के किसी भी इष्ट दिन के खगोलीय स्थितिवश गत वर्ष मास दिन आदि सौर सावन चान्द्रभान को ज्ञात कर सौर सावन अहर्गण बनाकर मध्यमादि ग्रह स्पष्टान्त कर्म किये जाते है,उसे सिद्धान्त गणित कहा जाता है।
२. तंत्र गणित--
जिस तंत्र द्वारा वर्तमान युगादि वर्षों को जानकर अभीष्ट दिन तक अहर्गण या दिन समूहों के ज्ञान के मध्यमादि ग्रह गत्यादि चमत्कार देखा जाता है,उसे तंत्र गणित कहा जाता है।
३. करण गणित
वर्तमान शक के बीच में अभीष्ट दिनों को जानकर अर्थात किसी दिन वेध यंत्रों के द्वारा ग्रह स्थिति देख कर और स्थूल रूप से यह ग्रह स्थिति गणित से कब होगी,ऐसा विचार कर तथा ग्रहों के स्पष्ट वश सूर्य ग्रहण आदि का विचार जिस गणित से होता है,उसे करण गणित कहते हैं ।
तंत्र तथा करण ग्रन्थों का निर्माण वेदों से हजारों वर्षों के उपरान्त हुआ,अत: इस पर विचार न करके वेदों में सिद्धान्त गणित सम्बन्धी बीजों का अन्वेषण आवश्यक होगा। वेदों में सूर्य के आकर्षण बल पर आकाश में नक्षत्रों की स्थिति का वर्णण मिलता है ।

संपूर्ण भारतीय ज्योतिषशास्त्र को मूलतः तीन भागों में बाँटा जा सकता है---
(१) सिद्धान्त ज्योतिष:-
काल गणना की एक विशेष सूक्ष्म माप त्रुटि से लेकर प्रलय के अन्त तक कालों का आकलन, उनका मान, उनका भेद, उनका चार (चलन), आकाश में उनकी गति आदि क्रम से द्विविध प्रकार की गणित से उनके प्रश्न तथा उत्तर जिसमें निहित है। पृथ्वी और आकाश के मध्य स्थित ग्रहों का जिसमें कथन और उनको जानने, वैध करने का यन्त्र आदि वस्तुओं का जिसमें गणित निहित हो, उस प्रबन्ध को विद्वानों ने सिद्धान्त रूप से अभिहित किया है।

सिद्धान्त ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थों के नाम:--
सिद्धान्त ग्रन्थों में सूर्य सिद्धान्त, वशिष्ठ सिद्धान्त, ब्रह्म सिद्धान्त, रोमक सिद्धान्त, पौलिश सिद्धान्त, ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त, पितामह सिद्धान्त आदि प्रसिद्ध सिद्धान्त ग्रन्थ हैं ।
सिद्धान्त ज्योतिष के प्रमुख आचार्यों के नाम:--
जिन्होंने ज्योतिष शास्त्र को चलाया ऐसे ज्योतिष शास्त्र के 18 प्रवर्तक आचार्य माने जाते हैं। ये हैं- ब्रह्मा, आचार्य, वशिष्ठ, अत्रि, मनु, पौलस्य,रोमक, मरीचि, अंगिरा, व्यास, नारद, शौनक, भृगु, च्यवन, यवन, गर्ग, कश्यप और पाराशर |


(२) संहिता ज्योतिष:--
ग्रहों की चाल, वर्ष के लक्षण, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, कण, मुहूर्त, ग्रह-गोचर भ्रमण, चन्द्र ताराबल, सभी प्रकार के लग्नों का निदान, कर्णच्छेद, यज्ञोपवीत, विवाह इत्यादि संस्कारों का निर्णय तथा पशु-पक्षी चेष्टा ज्ञान, शकुन विचार, रत्न विद्या, अंग विद्या, आकार लक्षण, पक्षी व मनुष्य की असामान्य चेष्टाओं का चिन्तन संहिता विभाग का विषय है।

संहिता ज्योतिष के प्रमुख ग्रन्थों के नाम:-
संहिता ग्रन्थों में वृहत्संहिता, कालक संहिता, नारद संहिता, गर्ग संहिता, भृगु संहिता, अरुण संहिता, रावण संहिता, लिंग संहिता, वाराही संहिता, मुहूर्त चिन्तामण इत्यादि प्रमुख संहिता ग्रन्थ हैं।

संहिता ज्योतिष के प्रमुख आचार्यों के नाम:-
मुहूर्त गणपति, विवाह मार्तण्ड, वर्ष प्रबोध, शीघ्रबोध, गंगाचार्य, नारद, महर्षि भृगु, रावण, वराहमिहिराचार्य सत्य-संहिताकार रहे हैं ।

(३) होरा शास्त्र:-
राशि, होरा, द्रेष्काण, नवमांश, चलित, द्वादशभाव, षोडश वर्ग, ग्रहों के दिग्बल, काल बल, चेष्टा बल, ग्रहों के धातु, द्रव्य, कारकत्व, योगायोग, अष्टवर्ग, दृष्टिबल, आयु योग, विवाह योग, नाम संयोग, अनिष्ट योग, स्त्रियों के जन्मफल, उनकी मृत्यु नष्टगर्भ का लक्षण प्रश्न एवं ज्योतिष के फलित विषय पर जहाँ विकसित नियम स्थापित किए जाते हैं, वह होरा शास्त्र कहलाता है ।

होरा शास्त्र के प्रमुख ग्रन्थों के नाम:-
सबसे प्रसिद्ध ग्रन्थ वृहद पाराशर होरा शास्त्र मानसागरी, सारावली, वृहत्जातक, जातकाभरण, चमत्कार चिन्तामणि, ज्योतिष कल्पद्रुम, जातकालंकार, जातकतत्व होरा शास्त्र इत्यादि हैं।

होरा शास्त्र के प्रमुख आचार्यों के नाम:-
पुराने आचार्यों में पाराशर, मानसागर, कल्याणवर्मा, दुष्टिराज, रामदैवज्ञ, गणेश, नीपति आदि हैं |
इन तीन स्कन्धों वाला उत्तम भारतीय ज्योतिषशास्त्र ही वेदों का पवित्र नेत्र कहा गया है ।

'जय हिंद,जय हिंदी'

शनिवार, 2 जुलाई 2011

'ज्योतिष और जीवन के विभिन्न आयामों का सम्बन्ध'



यह सर्वविदित है कि ज्योतिषशास्त्र का सम्बन्ध प्राचीनकालीन वेदों से है परन्तु इसका यह तात्पर्य यह नहीं कि ज्योतिषशास्त्र केवल एक ग्रन्थ मात्र है । अपितु यह एक विज्ञान है जो अपने गणितीय समीकरणों के ज़रिये आकाशीय ग्रह नक्षत्रों की चाल बताने के साथ - साथ सूर्य - चन्द्र ग्रहण, तिथि, व्रत - त्यौहार, ऋतु परिवर्तन, आदि का भी इसी के माध्यम से पता लगता है । ज्योतिषीय गणना‌ओं के आधार पर ही एक भविष्यवक्‍ता मानव जीवन से जुड़े अनेक पहलु‌ओं के विषय में हमें इसके विविध प्रकारों के माध्यम से बताता है । आज बदलते वातावरण के साथ हम जितना आधुनिक होते जा रहे हैं उतना ही ज़्यादा हम अपने भविष्य को जानने के लि‌ऐ भी आतुर रहने लगे हैं । यही वजह है कि आज ज्योतिष विद्या को अनेक भ्रान्तियों ने आ घेरा है जिस कारण ज्योतिष के सन्दर्भ में भ्रम और धोखाधडी का खतरा भी बढ़ने लगा है । प्रस्तुत आलेख के माध्यम से मेरा यह प्रयास है कि साधारण जन तक ज्योतिष और जीवन के विभिन्न लक्षणों का सम्बन्ध विभिन्न आयामों के माध्यम से पहुंचे और इसके सन्दर्भ में निरंतर फ़ैल रहे भ्रम दूर हो सकें | 

चिकित्सा-विज्ञान और जीव-विज्ञान के अनुसार मनुष्य के अंगों में स्फुरण एक प्राकृतिक क्रिया है लेकिन  ज्योतिषीय दृष्टिकोण के अनुसार अंगों में स्फुरण भविष्य के संकेतों के रूप में लेता है । अंगों में होने वाले स्फुरण से भी हम भविष्य की घटनाओं का अनुमान लगा सकते हैं । कुछ अंगों के फड़कने का शुभ और कुछ का अशुभ फल होता है :-- 
(१)-यदि किसी के सिर का पिछला हिस्सा फड़के तो उसकी मन की इच्छाएं पूरी होने की सूचना मानना चाहिए ।
(२)-दोनों भौंहों के बीच फड़के तो यह निकट भविष्य में प्रेम मिलने का संकेत है। दाहिना गाल फड़के तो सम्मान मिलता है ।
(३)-दाहिनी भौंह फड़के तो आर्थिक लाभ और पुत्र प्राप्ति की सूचना है। दाहिना कान फड़के तो आपका पद बढ़ सकता है यानी कि प्रमोशन के योग बनते हैं ।
(४)-गर्दन फड़के तो आर्थिक लाभ तो मिलता ही है साथ ही स्त्री से भी सुख मिलता है ।
(५)-ऊपरी होंठ का फड़कना भी कार्यस्थल पर प्रमोशन के योग का संकेत है ।
(६)-माथे पर फड़कन हो तो समझिए आप धनवान बनने वाले हैं ।
(७)-दाहिना बगल फड़के तो आपका ऐश्वर्य बढ़ता है ।
(८)-दाहिनी हथेली के फड़कने से आर्थिक लाभ मिलता है ।
(९)-पैर का अंगूठा भी फड़के तो आर्थिक लाभ की प्राप्ति होती है ।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मनुष्य के शरीर पर तिल का अंगानुसार प्रभाव इस प्रकार समझना चाहिए :--
(१) जिस व्‍यक्ति के माथे पर तिल हो तो जातक बलवान होता है।
(२) जिस व्‍यक्ति के ललाट पर दायीं तरफ तिल हो, उसे प्रतिभा का धनी माना जाता है और बायीं तरफ होने पर उसे फिजूलखर्च करने वाला माना जाता है। जिसके ललाट के मध्य में तिल हो, उस व्‍यक्ति को अच्छा प्रेमी माना जाता है।
(३) जिस व्‍यक्ति (स्त्री/पुरुष) के ठुड्डी पर तिल हो तो अपने विपरीत लिंगी साथी (स्त्री/पुरुष) से प्रेम नहीं रहता है पर व्यक्ति सफल और संतुष्ट होता है।
(४) जिस व्‍यक्ति के दोनों भौहों के बीच तिल हो तो यात्रा बहुत करनी पड़ती है। दायीं भौं पर तिल वाले व्यक्ति का वैवाहिक जीवन सफल रहता है।
(५) जिस व्‍यक्ति के दाहिनी आंख पर तिल हो तो स्त्री से प्रेम होता है और बायीं आंख पर तिल हो तो स्‍त्री से विवाद या कलह होती है। किन्‍तु आंख पर तिल कंजूस प्रवृत्ति बनाता है। जिसके आंख के अंदर तिल हो, वह व्यक्ति कोमल हृदय अर्थात भावुक होता है।
(६) जिस व्‍यक्ति के पलकों पर तिल जातक को संवेदनशील और एकांतप्रिय बनाता है।
(७) जिस व्‍यक्ति के दाएं गाल पर तिल हो तो जातक धनी होता है और वैवाहिक जीवन सफल रहता है। यदि बाएं गाल पर तिल हो तो जातक का खर्च बहुत होता है और संघर्षपूर्ण जीवन का द्योतक है।
(८) जिस व्‍यक्ति के होंठ पर तिल हो तो विषय-वासना में रत रहे या अधिक रुचि रहे। ऐसा व्यक्ति विलासी प्रवृत्ति का माना जाता है।
(९) जिस व्‍यक्ति के मुंह के पास तिल होता है, वह एक न एक दिन धन प्राप्त करता है ।
(१०) जिस व्‍यक्ति के  नाक पर तिल होने पर माना जाता है कि व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होगा ।
(११) जिस व्‍यक्ति के कान पर तिल हो तो जातक अल्‍पायु होता है, परन्‍तु वह धीर, गंभीर और विचारशील होता  है ।
(१२) जिस व्‍यक्ति के गर्दन पर तिल हो तो बहुत आराम मिलता है और व्यक्ति अच्छा मित्र होता है ।
(१३) जिस व्‍यक्ति के दायें कंधे पर तिल होता है, वे दृढ संकल्पित होते हैं ।
(१४) जिस व्‍यक्ति के दाहिनी भुजा पर तिल हो तो मान-सम्‍मान मिले और यदि बायीं भुजा पर तिल हो तो जातक झगड़ालू होता है।
(१५) जिस व्‍यक्ति के नाक पर तिल हो तो भी यात्रा बहुत करनी पड़ती है ।
(१६) जिस व्‍यक्ति के बायें कंधे पर तिल होता है, वह व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का होता है।
(१७) जिस व्‍यक्ति के कंधे और कोहनी के मध्य तिल होने पर माना जाता है कि व्यक्ति में उत्सुक प्रवृत्ति का है।
(१८) जिस व्‍यक्ति के कोहनी पर तिल होना विद्वान होने का संकेत है।
(१९) जिस व्‍यक्ति के दाहिनी छाती पर तिल हो तो स्‍त्री से बहुत प्रेम हो और यदि बायीं छाती पर तिल हो तो ऐसे व्यक्ति का स्‍त्री से बहुत झगड़ा होता है।
(२०) जिस व्‍यक्ति के कमर पर तिल हो तो जीवन परेशानियो से व्‍यतीत होता है। कमर पर दायीं ओर तिल होना यह दर्शाता है कि व्यक्ति अपनी बात पर अटल रहने वाला और सच्चाई पसंद करने वाला है।
(२१) जिस व्‍यक्ति के दोनों छाती के मध्‍य में तिल हो तो जीवन सुख से बीतता है।
(२२) जिस व्‍यक्ति के पेट पर तिल हो तो जातक अच्‍छा भोजन खाने में रुचि रखता है।
(२३) जिस व्‍यक्ति के पीठ पर तिल हो तो जातक यात्रा बहुत करता है।
(२४) जिस व्‍यक्ति के नाभि पर तिल मनमौजी प्रवृत्ति का संकेत है।
(२५) जिस व्‍यक्ति के टखना पर तिल हो यह इस बात का सूचक है कि आदमी खुले विचारों वाला है।
(२६) जिस व्‍यक्ति के कूल्हे पर तिल होने पर माना जाता है कि व्यक्ति शारिरिक व मानसिक दोनों स्तर पर परिश्रमी होता है।
(२७) जिस व्‍यक्ति के दायीं हथेली पर तिल हो तो जातक शक्तिशाली होता है और बायीं हथेली पर तिल हो तो जातक बहुत खर्चीला होता है।
(२८) जिस व्‍यक्ति के दायें हाथ के ऊपर तिल हो तो जातक धनी होता है और बाएं हाथ के ऊपर तिल हो तो बहुत कम खर्च करता है।
(२९) जिस व्‍यक्ति के कोहनी और पोंहचे के मध्य कहीं तिल होता है, वह रोमांटिक प्रवृत्ति का होता है।
(३०) जिसके घुटने पर तिल हो, वह व्यक्ति सफल वैवाहिक जीवन जीता है।
(३१) जिस व्‍यक्ति के दाएं पैर में तिल हो तो जातक बुद्धिमान होता है और बाएं पैर पर तिल हो तो जातक बहुत खर्चीला होता है। पांव पर तिल लापरवाही का द्योतक है।
(३२) जिस व्‍यक्ति के जोड़ों पर तिल हो, तो यह शारिरिक दुर्बलता की निशानी माना जाता है।
मनुष्य के किसी भी अंग तिल यदि बड़ा हो, तो शुभ होने के साथ अच्‍छा शकुन बढ़ाता है।  हल्के रंग का तिल शुभ होता है । यदि तिल पर लाल हो, तो वो शुभ नहीं माना जाता और न ही अच्छा भी लगता है । तिल गहरे रंग का हो, तो माना जाता है कि बड़ी बाधाएं सामने आएंगी और जिस अंग पर जो फल होगा वह अधिक मिलेगा ।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार घर में छिपकली किसी के ऊपर छिपकली गिर जाती है तो इसके फल निम्नलिखित रूप से प्राप्त होते हैं-
(१)-यदि आंखों पर छिपकली गिर जाए तो समझ लें कि निकट भविष्य में आपको धन प्राप्त होता है।
(२)-यदि कंधों पर छिपकली गिर जाती है तो कई समस्याओं से मुक्ति मिलने की संभावनाएं बनती हैं।
(३)-हाथों पर छिपकली गिरने पर समझ लें कि आपको नई ड्रेसेस मिलने के योग बनेंगे।
(४)-दाहिने कान पर छिपकली गिरने का मतलब है आपकी आयु लंबी है।
(५)-कमर पर छिपकली गिरती है तो निश्चित ही धन लाभ होगा।


ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मनुष्य के हाथों की रेखाएं हमारा भूत, भविष्य और वर्तमान बता देती है। हाथों की रेखाओं में ही आपकी उम्र भी छिपी हुई है। आपके कितने वर्ष जीवित रहेंगे इसका एक संकेत हमारे हाथों में ही है। जहां से आपका पंजा शुरू होता है, वहां कुछ रेखाएं जाली के समान देती है। इन रेखाओं को मणिबंध कहा जाता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मणिबंध की रेखाएं भी हमारी आयु की ओर संकेत करती है। यह रेखाएं सभी के हाथों में अलग-अलग प्रकार की होती है। वैसे तो पूरे हाथ की लकीरों का अवलोकन करके ही सही-सही आयु पता की जाती है परंतु मणिबंध से आप खुद मालुम कर सकते हैं कि आपका जीवन लगभग कितने वर्ष का है :--
(१)-यदि मणिबंध में चार रेखाएं दिखाई दे तो आपकी आयु लगभग १२० वर्ष की होगी ।
(२)-यदि मणिबंध में 3 रेखाएं हैं तो आपकी आयु लगभग ९० वर्ष होगी ।
(३)- यदि मणिबंध में 2 रेखाएं हैं तो आपकी आयु लगभग ६० वर्ष होगी ।
(४)- यदि मणिबंध में 3 रेखाएं हैं तो आपकी आयु लगभग ३० वर्ष होगी ।
(५)- यदि मणिबंध में कोई रेखा नहीं हैं तो आपकी अल्पायु में मृत्यु होगी । शेष ईश्वर कल्याण करे.......

वास्तुशास्त्र के दृष्टिकोण से सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के उपाय :--
यदि आप वर्तमान समय की मानसिक-तनाव से भरी ज़िंदगी से मुक्ति चाहते हैं तो निम्नलिखित वास्तुशास्त्र के दृष्टिकोण से प्रयोग अवश्य अपनाएं, इनको अपनाने से आप खुद को सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर महसूस करेंगे।
(१) रसोईघर में  अग्रि और पानी साथ न रखें।
(२) रसोईघर का पत्थर काला नहीं रखें।
(३) रसोईघर में बैठकर ही भोजन करें।
(४) रसोईघर में रात में झूठे बर्तन न रखें।
(५) दिन में एक बार चांदी के गिलास का पानी पीएं। इससे क्रोध पर नियंत्रण होता है।
(६) संध्या के समय  पर खाना न खाएं और नही स्नान करें।
(७) संध्या के समय घर में सुगंधित एवं पवित्र धुआ करें।
(८) घर में शयन कक्ष में मदिरापान नहीं करें। अन्यथा रोगी होने तथा डरावने सपनों का भय होता है।
(९) घर में कंटीले पौधे नहीं लगाएं।
(१०) अपने घर में चटकीले रंग का प्रयोग यथासंभव नहीं कराये।
(११) घर में जाले न लगने दें, इससे मानसिक तनाव कम होता है।
(१२) घर में कोई रोगी हो तो एक कटोरी में केसर घोलकर उसके कमरे में रखे दें। वह जल्दी स्वस्थ हो जाएगा।
(१३) घर में ऐसी व्यवस्था करें कि वातावरण सुगंधित रहे। सुगंधित वातावरण से मन प्रसन्न रहता है ।


वास्तुशास्त्र के दृष्टिकोण से भवन का निर्माण अनुरूप होने पर मनुष्य को अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में कामयाबी मिलती है | इसके लिए अपने घर का निर्माण कराते समय निम्नलिखित बिन्दुओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिए :--

(१) यदि  घर  में पूर्व से पश्चिम की तरफ चढ़ने वाली सीढ़ियाँ हों तो भवन मालिक को लोकप्रियता और यश की प्राप्ति होती है ।
(२) यदि घर  में उत्तर से दक्षिण की तरफ चढ़ने वाली सीढ़ियाँ हों तो  घर के मालिक को धन की प्राप्ति होती है ।
(३) घर की दक्षिण दीवार के सहारे सीढ़ियाँ धनदायक होती हैं ।
(४) घर की सीढ़ियाँ प्रकाशमान और चौड़ी होनी चाहिए। सीढ़ियों की विषम संख्या शुभ मानी जाती है। सामान्यतः एक मंजिल पर सत्रह सीढ़ियाँ शुभ मानी जाती हैं ।
(५) घर की घुमावदार सीढ़ियाँ श्रेष्ठ मानी जाती हैं। सीढ़ियों का घुमाव घड़ी की परिक्रमा-गति के अनुसार होना चाहिए ।
(६) यदि घर की सीढ़ियाँ सीधी हों तो दाहिनी ओर ऊपर जाना चाहिए ।
(७) घर के मध्य भाग में  भूलकर भी सीढ़ी न बनाएँ अन्यथा बड़ी हानि हो सकती है ।
(८) घर के पूर्व दिशा में सीढ़ियाँ हों, तो हृदय रोग बनाती हैं ।
(९) यदि घर की सीढ़ियाँ चक्राकार सर्पिल हों, तो 'ची' ऊर्जा, ऊपर की ओर प्रवाहित नहीं हो पातीं, जिससे भवन मालिक को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है ।
(१०) घर के ईशान कोण में बनी सीढ़ी पुत्र संतान के विकास में बाधक होती है ।
(११) घर के मुख्य दरवाजे के सामने बनी सीढ़ी आर्थिक अवसरों को समाप्त कर देती है ।
(१२)घर की सीढ़ियों के नीचे पूजाघर का निर्माण नहीं करना चाहिए।
(१३) घर को बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि मुख्य दरवाजे पर खड़े व्यक्ति को घर की सीढ़ियाँ दिखाई नहीं देना चाहिए |

वास्तुशास्त्र के इन छोटे-छोटे उपायों से आप अवश्य ही शांति का अनुभव करेंगे।

ज्‍योतिषशास्त्र ने बहुत से क्षेत्रों की खोज है तथा उसके बहु आयाम है । सत्य तो यह है कि कोई नहीं जानता कि आने वाले कल क्या होगा । हम दिन-प्रतिदिन  के कामकाज में परिणामों का केवल अनुमान ही लगाते रहते हैं। अनेकों बार हमारा अंदाजा सही भी निकलता है और कई बार उम्मीदों के विपरीत परिणाम आते हैं । यह उसी प्रकार से है जैसे तपती धूप में व्यक्ति स्वयं को धूप से बचाने के लिये छाता तो लगा सकता है, परन्तु सूर्य को नहीं हटा सकता है । इसलिये ज्योतिषशास्त्र पर विश्वास रखने के साथ ही हमें अपने पुरूषार्थ पर भी भरोसा रखना चाहिये ।

आप प्रस्तुत आलेख के सन्दर्भ अपनी प्रतिक्रिया खुल कर दीजिये, जिससे मैं भविष्य में इस दिशा में और सार्थक प्रयास कर सकूँ |
'जय हिंद,जय हिंदी'

बुधवार, 15 जून 2011

'चन्द्रग्रहण का मानव पर असर"



विक्रमी संवत २०६८ में पृ्थ्वी पर कुल पांच ग्रहण घटित होने का संयोग बना है | इन्हीं पांचों ग्रहणों में से एक ग्रहण चन्द्रग्रहण है. यह चन्द्रग्रहण १५ जून,  २०११, बुधवार के दिन होगा | आज १५ जून को लगने वाले खग्रास चंद्रग्रहण बुधवार को ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को १५ और १६ जून की मध्यरात्रि को संपूर्ण भारत में खग्रास के रूप में दिखाई देगा। भारत में जब १५जून की रात्रि ११.५३ मिनट पर चंद्रग्रहण शुरू होगा तो पूरे भारत में चंद्रमा उदय हो चुका होगा । भारत के सभी नगरों और ग्रामों में १५जून को शाम ७.०० से ७.३० बजे के बीच चंद्रमा का उदय हो चुका होगा। ग्रहण १६जून को प्रात: ३.३७ मिनट पर समाप्त होगा। भारत के अतिरिक्त यह चंद्रग्रहण दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप, मध्य पूर्वी एशिया, आस्ट्रेलिया, दक्षिण पश्चिम प्रशांत महासागर, उत्तर पूर्वी रूस में दिखाई देगा। इस ग्रहण का सूतक १५जून दोपहर २.५३ मिनट से प्रारंभ हो जाएगा ।
सन २०११ में होने वालें छह ग्रहणों की श्रृंखला में सबसे पहले गत चार जनवरी को आंशिक सूर्य ग्रहण का नजारा भारत के उत्तर पश्चिम हिस्से जम्मू कश्मीर, पंजाब, दिल्ली जयपुर और शिमला में देखने को मिला था। एक जून को आंशिक सूर्य ग्रहण रह चूका है   और १५ जून को पूर्ण चन्द्र ग्रहण तथा एक जुलाई को आंशिक सूर्य ग्रहण होगा। इसके अलावा २५नवंबर को आंशिक सूर्य ग्रहण और १० दिसंबर को पूर्ण चन्द्र ग्रहण होगा |
आज का चन्द्रग्रहण रात्रि ११ बजकर ५२ मिनट छह सेकेंड पर प्रारंभ होगा इसका मध्यकाल एक बजकर ४२ मिनट छह सेकंड पर और मोक्ष रात्रि तीन बजकर ३२ मिनट छह सेकेंड पर होगा। एक जुलाई को दोपहर में होने वाला आंशिक सूर्य ग्रहण भारत के किसी भी हिस्से में नही दिखाई देगा। वर्ष २०११ में होने वालें छह ग्रहणों की श्रृंखला में सबसे पहले गत चार जनवरी को आंशिक सूर्य ग्रहण कानजारा भारत के उत्तर पश्चिम हिस्से जम्मू कश्मीर, पंजाब, दिल्ली जयपुर और शिमला में देखने को मिला था। अब एक जून को आंशिक सूर्य ग्रहण और १५ जून को पूर्ण चन्द्र ग्रहण तथा एक जुलाई को आंशिक सूर्य ग्रहण होगा। इसके अलावा २५ नवंबर को आंशिक सूर्य ग्रहण और १० दिसंबर को पूर्ण चन्द्र ग्रहण होगा । भारत के दक्षिण पूर्वी राज्यों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, आसाम, चीन और पूर्वी एशिया तथा पश्चिम ऑस्ट्रेलिया में दिखाई देगा। 

चंद्रग्रहण के सन्दर्भ में वैज्ञानिक दृष्टिकोण:--
वहीँ वैज्ञानिकों कि राय में चन्द्र ग्रहण का लग्न एक सामान्य खगोलिक घटना है..और इसका किसी भी तरह मानव जीवन पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता…आँखों पर भी इसका प्रभाव नहीं पड़ता है, और ना ही रेडियेशन का दुष्प्रभाव ही चन्द्र ग्रहण के दौरान पड़ता है..चन्द्र ग्रहण का सिर्फ चुम्बकीय प्रभाव ही पड़ता है…चन्द्र ग्रहण के बारे में जानकारों ने बताया कि ये पहली बार ऐसा है कि चाँद बिलकुल बीच में आ रहा है.यानि कि सूरज चंद्रमा और पृथ्वी एक सीध में आ जा रहे है..इस वजह से इतना लम्बा चन्द्र ग्रहण लग रहा है |

चंद्रग्रहण के सन्दर्भ में ज्योतिषशास्त्र का दृष्टिकोण:--
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहण की छाया कहीं भी पड़े लेकिन भूमंडल का चुंबकीय क्षेत्र पूर्ण रूप से असंतुलित होता है। ग्रहण के समय भूमंडल का वातावरण सामान्य नहीं होता, सूर्य चंद्र से निरंतर प्राप्त होने वाली जीवनदायिनी ऊर्जा असंतुलित हो जाती है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार ग्रहणमाला योग का अर्थ लगातार तीन ग्रहण होना कहलाता है। इस ग्रहण का असर जनसाधारण में अशांति, आतंकवाद और बेरोजगारी तथा मंहगाई जैसे रोजमर्रा की समस्याओं से जूझने में ज्यादा असरदार साबित होगा। अधिकांश लोगों के लिए साल का मध्य भाग हाहाकार और त्राहि से भरा होगा ।ज़ब चन्द्र ग्रहण पूर्णिमा तिथि को होता है। सूर्य व चन्द्रमा के बीच पृथ्वी के आ जाने से पृथ्वी की छाया से चन्द्रमा का पूरा या आंशिक भाग ढक जाता है तो पृथ्वी के उस हिस्से में चन्द्र ग्रहण नजर आता है। चन्द्र ग्रहण दो प्रकार का नजर आता है। पूरा चन्द्रमा ढक जाने पर सर्वग्रास चन्द्रग्रहण तथा आंशिक रूप से ढक जाने पर खण्डग्रास चन्द्रग्रहण लगता है।

चन्द्रग्रहण का विभिन्न  राशियों पर प्रभाव :--
इस बार लगने वाला चन्द्रग्रहण वृश्चिक राशि में लग रहा है | ग्रहण का प्रभाव अलग अलग  राशियों पर दिखाई पड़ता है जिसमे ८ राशियों पर जहा बुरा प्रभाव रहता है वही चार राशियों पर अच्छा प्रभाव  रहता है | राशियों पर प्रभाव —–
मिथुन ,कन्या ,मकर और कुम्भ राशियों के जातक के लिये ये ग्रहण शुभ रहेगा |
मेष, मिथुन, सिंह व वृश्चिक राशि के लिए मध्यम
वृष, कन्या व धनु व मकर राशि के लिए अशुभ
कर्क, तुला, कुंभ व मीन राशि वालों के लिए शुभ।
बुद्ध और शनि प्रधान लोगों को भी इस ग्रहण का लाभ मिलेगा !
इस चन्द्र ग्रहण का ९० दिनों तक शुभ या अशुभ प्रभाव जबरदस्त देखने को मिलेगा |


विभिन्न राशियों पर इस चन्द्रग्रहण का प्रभाव निम्नलिखित प्रकार से होने की सम्भावना है —
(१.)मेष राशि —-
इस राशि के व्यक्तियों को यह ग्रहण गुप्त चिन्ताएं दे सकता है. इसके फलस्वरुप मेष राशि के व्यक्तियों के खर्च बढ सकते है | 
मेष राशि के लिये ये ग्रहण मृत्युसम कष्टदायक होगा और स्वाभिमान को आहत करेगा |
(२.)वृ्षभ राशि—–
आपके लिए यह चन्द्रग्रहण शुभफलकारी रहेगा. इस ग्रहण के प्रभाव से आपको लाभ, सुख व धर्म कार्यो में आपकी रुचि में वृ्द्धि होगी | 
वृष राशि के लिये जीवन साथी के साथ तनाव की स्थिति पैदा हो सकती है  |
(३.)मिथुन राशि—–
इस राशि के व्यक्तियों के लिए वैवाहिक जीवन की परेशानियों में वृ्द्धि होगी. साथ ही सावधानी से रहें, धन की हानि हो सकती है |
(४.)कर्क राशि———–
कर्क राशि के व्यक्तियों के रोग, कष्ट बढ सकते है, व्यर्थ के भय और व्यय बढने के भी योग बन रहे है | 
कर्क राशि के जातकों को बिना वजह विपत्तियों का सामना करना पड़ सकता है | भूमि वाहन सम्बंधित चिंता के भी योग बन रहे है |
(५.)सिंह राशि——-
सिंह राशि के लिए चन्द्रग्रहण अनुकुल फल देने वाला नहीं रहेगा. इस अवधि में इस राशि के व्यक्तियों की मानहानि की संभावनाएं बन रही है. तथा अनचाहे विषयों पर खर्च हो सकते है | 
सिंह राशि वालों को मनोव्यथा का कारक बनेगा ये ग्रहण यही नही पारिवारिक संकट भी झेलना पड़ सकता है  |
(६.)कन्या राशि —–
कन्या राशि के लिए यह समय कार्यसिद्धि के अनुकुल रहेगा. इसके प्रभाव से ग्रहण के बाद सभी मंगल कार्य पूरे होगें | 
कन्या राशि वालों के लिये ये ग्रहण शुभकारी है |
(७.)तुला राशि ——-
तुला राशि वालों को चन्द्र ग्रहण का प्रभाव शुभ रुप में प्राप्त होगा. तुला राशि के लिए धन लाभ, परन्तु व्यय भी बढेगें | 
तुला राशि के जातकों को धन और सम्मान की हानि  सहनी पड़ सकती है |
(८.)वृश्चिक राशि----
वृश्चिक राशि में ग्रहण लगने के कारण इस राशि के लोगों को सावधान रहना होगा | वृश्चिक राशि के जातकों को सावधान रहना होगा क्योकि दुर्घटना का योग बना रहा है |
(९.)धनु राशि —–धनु राशि के व्यक्ति भी सम्भावित दुर्घटनाओं से सतर्क रहें, यात्राएं करते हुए सावधानी रखें | धनु राशि में के लोगों का धन संपत्ति के नुकसान का योग बना रहा है | 
(१०.)मकर राशि ——-
मकर राशि के लिए इस चन्द्रग्रहण का प्रभाव धन हानि लेकर आ सकता है. साथ ही चोट आदि का भय बना हुआ है |
(११.)कुम्भ राशि ——
कुम्भ राशि के लिए चन्द्र ग्रहण के फल शुभ रहेगें. इसके फलस्वरुप धन लाभ, खुशियां प्राप्त हो सकती है |
(१२.)मीन राशि——–
यह चन्द्रग्रहण मीन राशि के रोग, कष्ट, खर्चों में वृ्द्धि करेगा | 
मीन राशि के लोगों को सम्मान की लड़ाई लड़नी पड़ सकती है |

पृथ्वी की छाया सूर्य से ६ राशि के अन्तर पर भ्रमण करती है तथा पूर्णमासी को चन्द्रमा की छाया सूर्य से ६ राशि के अन्तर होते हुए जिस पूर्णमासी को सूर्य एवं चन्द्रमा दोनों के अंश, कला एवं विकला पृथ्वी के समान होते हैं अर्थात एक सीध में होते हैं, उसी पूर्णमासी को चन्द्र ग्रहण लगता है।
चन्द्रमा और सूर्य के बीच पृथ्वी का आना ही चन्द्र ग्रहण कहलाता है। चंद्र ग्रहण तब होता है जब सूर्य व चन्द्रमा के बीच पृथ्वी इस तरह से आ जाता है कि पृथ्वी की छाया से चन्द्रमा का पूरा या आंशिक भाग ढक जाता है और पृथ्वी सूर्य की किरणों के चांद तक पहुंचने में अवरोध लगा देती है। तो पृथ्वी के उस हिस्से में चन्द्र ग्रहण नज़र आता है। चन्द्र ग्रहण दो प्रकार का नज़र आता है।
०१.—पूरा चन्द्रमा ढक जाने पर सर्वग्रास चन्द्रग्रहण ।
०२.–आंशिक रूप से ढक जाने पर खण्डग्रास (उपच्छाया) चन्द्रग्रहण लगता है। ऐसा केवल पूर्णिमा के दिन संभव होता है, इसलिये चन्द्रग्रहण हमेशा पूर्णिमा के दिन ही होता है।
सूर्य की तपन के साथ विभिन्न हिस्सो में पड़ रही भीषण गर्मी के बीच जून के प्रथम पखवाड़े में दो ग्रहण होंगे। इसमें से १५ जून को होने वाला पूर्ण चन्द्र ग्रहण संपूर्ण भारत में दिखाई देगा जबकि एक जून को लगने वाला आशिंक सूर्य ग्रहण भारत में नहीं दिखायी देगा। प्राचीन समय से कालगणना की नगरी उज्जैन में स्थित शासकीय जीवाजी वेधशाला के अधीक्षक ने आज बताया कि 15 जून कापूर्ण चन्द्र ग्रहण पूरे देश में दिखाई देगा।
विक्रमी संवत २०६८ में पृ्थ्वी पर कुल पांच ग्रहण घटित होगें. इन्हीं पांचों ग्रहणों में से एक ग्रहणचन्द्रग्रहण है. यह चन्द्रग्रहण १५ जून, २०११, बुधवार के दिन होगा. यह ग्रहण ज्येष्ठ पूर्णिमा को १५ तथा १६जून, सन २०११ ईं की मध्यगत रात्रि को सम्पूर्ण भारत में खग्रास रुप में दिखाई देगा. इस ग्रहण का स्पर्श-मोक्ष इस प्रकार रहेगा—
१५ जून को खग्रास चंद्रग्रहण—-
दिन-बुधवार—–
ज्येष्ठा नक्षत्र, वृश्चिक व धनु राशि में—–
ग्रहण स्पर्श-रात ११.५२ बजे—-
मध्य-१.३० बजे—-
मोक्ष (समाप्त) २.३३ बजे—-
सूतक प्रारंभ- दोपहर ३.५२ बजे —–
ग्रहण की कुल अवधि ३ घण्टे ४० मिनट की है. भारत में जब १५ जून २०११ की रात्रि ११ बजकर ५३ मिनट पर यह चन्द्रग्रहण शुरु होगा. उस समय सम्पूर्ण भारत में चन्द्र उदय हो चुका होगा. भारत के सभी नगरों, में १५ जून को सायं ५:०० से सायं ७:३० बजे तक चन्द्र उदय हो जायेगा. तथा यह खग्रास चन्द्रग्रहण १५ जून की रात्रि २३ घण्टे ५३ से प्रारम्भ होकर अगले दिन १६ जून की प्रात: ३ बजकर ३३ मिनट पर समाप्त होगा.
चन्द्रग्रहण कहां कहां देखा जा सकेगा —- भारत, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, यूरोप व अटलांटिक महासागर।
चन्द्रग्रहण सूतक विचार ——
इस ग्रहण का सूतक १५  जून २०११ को दोपहर २ बजकर ५३ मिनट प्रारम्भ हो जायेगा.
ग्रहण काल तथा बाद में करने योग्य कार्य ——
ग्रहण के सूतक और ग्रहण काल में स्नान, दान, जप, पाठ, मन्त्र, सिद्धि, तीर्थ स्नान, ध्यान, हवनादि शुभ कार्यो का करना कल्याणकारी रहता है. धार्मिक लोगों को ग्रहण काल अथवा 15 जून के सूर्यास्त के बाद दान योग्य वस्तुओं का संग्रह करके संकल्प कर लेना चाहिए. तथा अगले दिन 16 जून को प्रात: सूर्योदय के समय पुन: स्नान करके संकल्पपूर्वक योग्य ब्राह्माण को दान देना चाहिए. धर्म सिन्धु के अनुसार, ग्रहण मोक्ष उपरान्त पूजा पाठ, हवन- तर्पण, स्नान, छाया-दान, स्वर्ण-दान, तुला-दान, गाय-दान, मन्त्र- अनुष्ठान आदि श्रेयस्कर होते हैं। ग्रहण मोक्ष होने परसोलह प्रकार के दान, जैसे कि अन्न, जल, वस्त्र, फल आदि जो संभव हो सके, करना चाहिए।
सूतक व ग्रहण काल में मूर्ति स्पर्श करना, अनावश्यक खाना-पीना, मैथुन, निद्रा, तैल, श्रंगार आदि करना वर्जित होता है. झूठ-कपटादि, वृ्था- अलाप आदि से परहेज करना चाहिए. वृ्द्ध, रोगी, बालक व गर्भवती स्त्रियों को यथानुकुल भोजन या दवाई आदि लेने में दोष नहीं लगता है.
कुप्रभाव से ऐसे बचें —–
ग्रहण का सूतक तीन प्रहर यानी नौ घंटे पहले से शुरू होगा। सूतक और ग्रहण काल में भगवान की पूजा व मूर्ति स्पर्श नहीं करना चाहिए। ग्रहण के कुप्रभाव से बचने के लिए भगवान के नाम कास्मरण करें। ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान व चंद्रमा से संबंधित सफेद वस्तुएं व अन्न दान करें।
ग्रहण का बाजार पर प्रभाव——
यह चन्द्रग्रहण ज्येष्ठ मास में घटित होने के कारण ब्राह्माण, राजा, राजस्त्री, महागण, मदिरा सेवन करने वालों को पीडा- कष्ट लेकर आयेगा. इसके फलस्वरुप धान्य तेज हो सकते है. ग्रहण बुधवाद के दिन होने से चावल की फसल को हानि, सोना, पीतल धातुओं में तेजी हो सकती है.
एक जून से एक जुलाई तक तीन ग्रहण पड़ेंगे। इसमें दो सूर्यग्रहण और एक चंद्रग्रहण होगा। दोनों सूर्यग्रहण तो भारत में दिखाई नहीं देंगे लेकिन १५ जून को पड़ने वाला खंडग्रास चंद्रग्रहण पूरे भारत में दिखाई देगा। ज्योतिषियों के अनुसार ग्रहण चाहे कहीं भी पड़े लेकिन एकसाथ तीन ग्रहण काहोना अशुभ है। ज्योतिषियों के अनुसार ग्रहण जहां दिखाई देता है वहीं उसका प्रभाव होता है और सूतक माना जाता है। इसलिए भारत में पड़ने वाले खग्रास चंद्रग्रहण का सूतक ही यहां माना जाएगा। इसका राशियों पर प्रभाव पड़ेगा। ग्रहण के योग से दुनिया के कई हिस्सों में प्राकृतिक प्रकोप सहित बड़ी घटनाएं घट सकती है।
दूसरा चंद्र ग्रहण – इसी तरह साल २०११ के अंत में १० दिसंबर को भी खग्रास चंद्र ग्रहण होगा। यह मृगशिरा नक्षत्र व वृष राशि में होगा। ग्रहण शाम ६ बजकर १५ मिनट पर शुरू होगा और रात ९ बजकर १५ मिनट पर समाप्त होगा। यह ग्रहण मृगशिरा नक्षत्र व वृष राशि वालों के लिए अनिष्टकारी रहेगा ।