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सोमवार, 14 नवंबर 2011

'ग्यारह बाल-गीत'



बाल-दिवस के अवसर पर नन्हे मुन्ने अपने देश के कर्णधारों को अनेकानेक स्नेहसिक्त शुभकामनायें......

आज बाल दिवस के अवसर पर ग्यारह बाल-गीत मेरे प्य्रे नन्हे-मुन्ने बच्चों को उपहारस्वरूप.........
(१)
टिमटिम तारे, चंदा मामा,
माँ की थपकी मीठी लोरी|
सोंधी मिटटी, चिडियों की बोली,
लगती प्यारी माँ से चोरी ||
सुबह की ओस सावन के झूले,
खिलती धूप में तितली पकड़ना|
माँ की घुड़की पिता का प्यार,
रोते रोते हँसने लगना ||
पल में रूठे, पल में हँसते ,
अपने आप से बातें करना |
खेल खिलौने साथी संगी ,
इन सबसे पल भर में झगड़ना ||
लगता है वो प्यारा बचपन ,
शायद लौट के ना आए |
जहाँ उसे छोड़ा था हमने ,
वहीं पे हमको मिल जाए ||
'जय हिंद,जय हिंदी'
(२)
खों-खों करके उछला बन्दर ।
जो जीते कहलाए सिंकन्दर ।।
टिउ - टिउ जब तोता बोला ।
पिंकी ने पिंजरे को खोला ।।
चूँ - चूँ करके चूहा बोला ।
सूरज गरम आग का गोला ।।
बिल्ली बोली म्याऊँ-म्याऊँ ।
दूध मलाई डट के खाऊँ ।।
घोड़ा जोर से हिनहिनाया ।
हमने अनुशासन अपनाया ।।
में- में कर बकरी मिमियाई ।
हमको भाती खूब मिठाई ।।
टर्र - टर्र मेंढक टर्राया ।
मेहनत से 
मैं ना घबराया ।|
ढेचूँ-ढेचूँ गधा जो रेंका ।
कचरा  कूड़ेदान में फेंका ।।
भौं - भौं करके कुत्ता भौंका ।
आया इक आंधी का झोंका ।।
गर्र-गर्र करके शेर दहाड़ा ।
स्कूल में पढाया पहाड़ा ।।
 
(साभार- दीनदयाल शर्मा)

(३)
अक्कड़ मक्कड़ ,धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख,दोनों अक्खड़,
हाट से लौटे,ठाठ से लौटे,
एक साथ एक बाट से लौटे |
बात-बात में बात ठन गयी,
बांह उठीं और मूछें तन गयीं |
इसने उसकी गर्दन भींची,
उसने इसकी दाढी खींची |
अब वह जीता, अब यह जीता;
दोनों का बढ चला फ़जीता;
लोग तमाशाई जो ठहरे ,
सबके खिले हुए थे चेहरे |
मगर एक कोई था फक्कड़,
मन का राजा कर्रा - कक्कड़;
बढा भीड़ को चीर-चार कर,
बोला ‘ठहरो’ गला फाड़ कर |
अक्कड़ मक्कड़ ,धूल में धक्कड़,
दोनों मूरख,दोनों अक्खड़,
गर्जन गूंजी, रुकना पड़ा,
सही बात पर झुकना पड़ा !
उसने कहा सधी वाणी में,
डूबो चुल्लू भर पानी में;
ताकत लड़ने में मत खोऒ,
चलो भाई चारे को बोऒ |
खाली सब मैदान पड़ा है,
आफ़त का शैतान खड़ा है,
ताकत ऐसे ही मत खोऒ,
चलो भाई चारे को बोऒ ||
(साभार-भवानीप्रसाद मिश्र)

(४)
अक्कड़-बक्कड़ बोकरी,बाबाजी की टोकरी ।
टोकरी से निकला बंदर,बंदर ने मारी किलकारी |
किलकारी से हो गया शोर,शोर मचाते आ गए बच्चे |
बच्चे सारे मन के कच्चे |
कच्चे-कच्चे खा गए आम,आम के आम गुठली के दाम |
दाम बढ़े हो गई महंगाई,महंगाई में पड़े न पार |
पार करें हम कैसे नदिया,नदिया में नैया बेकार |
बेकार भी हो गई पेटी,पेटी में ना पड़ते वोट |
वोट मशीनों में है बटन,बटन दबाओ पड़ गए वोट |
वोट से बन गए सारे नेता,नेता भी लगते अभिनेता |
अभिनेता है मंच पे सारे,सारे मिलकर दिखाते खेल |
खेल देखते हैं हम लोग,लोग करें सब अपनी-अपनी |
अपनी डफली अपना राग |
राग अलापें अजब-गजब हम,हम रहते नहीं रलमिल सारे |
सारे मिलकर हो जाएँ एक,एक-एक मिल बनेंगे ताकत |
ताकत सफलता लाएगी,लाएगी खुशियाँ हर घर-घर |
घर-घर दीप जलाएगी ।
(साभार- दीनदयाल शर्मा)

(५)
सदा हमें समझाए नानी,नहीं व्यर्थ बहाओ पानी ।
हुआ समाप्त अगर धरा से,मिट जायेगी ये ज़िंदगानी ।
नहीं उगेगा दाना-दुनका,हो जायेंगे खेत वीरान ।
उपजाऊ जो लगती धरती,बन जायेगी रेगिस्तान ।
हरी-भरी जहाँ होती धरती,वहीं आते बादल उपकारी ।
खूब गरजते, खूब चमकते,और करते वर्षा भारी ।
हरा-भरा रखो इस जग को,वृक्ष तुम खूब लगाओ ।
पानी है अनमोल रत्न,तुम एक-एक बूँद बचाओ ।
(साभार-  श्याम सुन्दर अग्रवाल)

(६)
एक किरण आई छाई,दुनिया में ज्योति निराली |
रंगी सुनहरे रंग में,पत्ती-पत्ती डाली डाली |
एक किरण आई लाई,पूरब में सुखद सवेरा |
हुई दिशाएं लाल,लाल हो गया धरा का घेरा |
एक किरण आई हंस-हंसकर,फूल लगे मुस्काने |
बही सुंगंधित पवन,गा रहे भौरें मीठे गाने |
एक किरण बन तुम भी,फैला दो दुनिया में जीवन |
चमक उठे सुन्दर प्रकाश से,इस धरती का कण कण |
(साभार-   सोहनलाल द्विवेदी )

(७)
ये जो देख रहो हो,धरती माँ के बच्चे।
तुम फूलों के गुच्छे,ये भी हैं तुम जैसे
इन्हें देखकर मधुर,गीत, पंछी गाते हैं,
थकी हुई आँखों में,सपने तिर जाते हैं।
उजली रातों में ये,
मोहक प्यारे-प्यारे।
लगते नभ के तारे,दिन में इंद्रधनुष-से,
जब तक ये हैं,तब तक भू पर सुंदरता है,
भोली-भाली परियों,की-सी कोमलता है।
पौधों की डालों पर,इनको मुसकाने दो,
दुनिया के आँगन में,ख़ुशबू भर जाने दो।
(साभार- रमेश कौशिक)

(८)
बांध शीश पर कफन,बढ़े चलो जवान,
आंधियो को मोड़ दे,तू बन के तूफान।
बढ़े चलो जवान...
हिन्द की सरहद को,पार जा करे,
उसके शीश पर पलट,तू काल सा पड़े।
तुझसे होनहार पे,हम सबको है गुमान।
आंधियो को मोड़ दे,तू बन के तूफान।
बढ़े चलो जवान...
वीरों की धरा पे तूने,है लिया जन्म,
मां के वीर लाड़लो की,है तुझे कसम !
काल भी हो सामने,उखड़ न पाए पांव।
आंधियो को मोड़ दे,तू बन के तूफान।
बढ़े चलो जवान...
 (साभार- शिवराज भारतीय)

(९)
अभी अभी थी धूप, बरसने,लगा कहाँ से यह पानी,
किसने फोड़ घड़े बादल के,की है इतनी शैतानी।
सूरज ने क्‍यों बंद कर लिया,अपने घर का दरवाजा़,
उसकी माँ ने भी क्‍या उसको,बुला लिया कहकर आजा।
ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैं,बादल हैं किसके काका,
किसको डाँट रहे हैं, किसने कहना नहीं सुना माँ का।
बिजली के आँगन में अम्‍माँ,चलती है कितनी तलवार,
कैसी चमक रही है फिर भी,क्‍यों खाली जाते हैं वार।
क्‍या अब तक तलवार चलाना,माँ वे सीख नहीं पाए,
इसीलिए क्‍या आज सीखने,आसमान पर हैं आए।
एक बार भी माँ यदि मुझको,बिजली के घर जाने दो,
उसके बच्‍चों को तलवार,चलाना सिखला आने दो।
खुश होकर तब बिजली देगी,मुझे चमकती सी तलवार,
तब माँ कर न कोई सकेगा,अपने ऊपर अत्‍याचार।
पुलिसमैन अपने काका को,फिर न पकड़ने आएँगे,
देखेंगे तलवार दूर से ही,वे सब डर जाएँगे।
अगर चाहती हो माँ काका,जाएँ अब न जेलखाना,
तो फिर बिजली के घर मुझको,तुम जल्‍दी से पहुँचाना।
काका जेल न जाएँगे अब,तूझे मँगा दूँगी तलवार,
पर बिजली के घर जाने का,अब मत करना कभी विचार।
(साभार- सुभद्राकुमारी चौहान)

(१०)
छीनकर खिलौनो को बाँट दिये गम ।
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम।।
अच्छी तरह से अभी पढ़ना न आया,
कपड़ों को अपने बदलना न आया,
लाद दिए बस्ते हैं भारी-भरकम।
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम।।
अँग्रेजी शब्दों का पढ़ना-पढ़ाना,
घर आके दिया हुआ काम निबटाना,
होमवर्क करने में फूल जाये दम।
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम।।
देकर के थपकी न माँ मुझे सुलाती,
दादी है अब नहीं कहानियाँ सुनाती,
बिलख रही कैद बनी, जीवन सरगम।
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम।।
इतने कठिन विषय कि छूटे पसीना,
रात-दिन किताबों को घोट-घोट पीना,
उस पर भी नम्बर आते हैं बहुत कम।
बचपन से दूर बहुत दूर हुए हम।।
(साभार-जगदीश व्योम)

(११)
चन्दा मामा दूर के.........
छिप-छिप कर खाते हैं हमसे,लड्डू मोती चूर के,
लम्बी-मोटी मूँछें ऐंठे,सोने की कुर्सी पर बैठे,
धूल-धूसरित लगते उनको,हम बच्चे मज़दूर के,
चन्दा मामा दूर के।
बातें करते लम्बी-चौड़ी,कभी न देते फूटी कौड़ी,
डाँट पिलाते रहते अक्सर,हमको बिना कसूर के,
चन्दा मामा दूर के।
मोटा पेट सेठ का बाना,खा जाते हम सबका खाना,
फुटपाथों पर हमें सुलाकर,तकते रहते घूर के,
चन्दा मामा दूर के।

'जय हिन्द,जय हिन्दी'

शुक्रवार, 1 जुलाई 2011

'इंसानियत से हारा नहीं'



"दुखों और अभावों की तेज़ हवाओं के बावजूद,
मैं ज़िन्दगी से हारा हूँ पर इंसानियत से हारा नहीं |

इन्सान ने अपने दुःख की उर्वरा भूमि को,
अपने आंसुओं से सींचकर कुछ बबूल उगाए,
कभी-कभी उसपर उग आने वाले छोटे-छोटे पीले पुष्प,
हमारी व्यथा के दर्द को कुछ कम कर जाते हैं |
लेकिन एक सच तो यह भी है,
कि बबूल पर उग आये कांटो ने हमेशा,
हर रेशमी दामन को छलनी ही किया है,
और छलनी हुए दामन से आँसू नहीं पोंछे जाते हैं ||
दुखों और अभावों की तेज़ हवाओं के बावजूद,
मैं ज़िन्दगी से हारा हूँ पर इंसानियत से हारा नहीं |"

शनिवार, 15 जनवरी 2011

'मेरी सर्वप्रिय कवितायेँ'-(भाग-एक)

आप सभी की अपार शुभकामनायें मिल रहीं हैं..........
मन,आत्मा,सम्पूर्ण परिवेश आनंदित है ! ऐसे आनंदपूर्ण क्षणों में एक आनंद से परिपूर्ण विचार आया कि जिन कविताओं,ग़ज़लों,रचनाओं आदि ने मुझे बहुत अधिक प्रभावित किया है, उनसे आपका परिचय भी करा दिया जाये, इस क्रम में अनेक संत कवि, अनेक विभूतियों पर अपने आलेख पहले ही प्रस्तुत कर चुका हूँ, जिस पर आप में कुछ मित्रों ने अपनी पसंद ज़ाहिर करते हुए अति सारगर्भित वक्तव्य, विचार, सन्देश, समीक्षात्मक दिशानिर्देश प्रदान किये हैं !
आज एक नयी श्रृंखला 'मेरी सर्वप्रिय कवितायेँ' प्रारम्भ कर रहा हूँ,विश्वास है कि आप सभी मेरे अपने मित्रों का प्यार,दुलार और ध्यान मिलेगा....
सादर विनम्र निवेदन एवम शुभकामनाओं सहित,

       (1.)
---दीवाली की रात रे---
द्वार-द्वार दीपों की आयी बारात रे.....
दीवाली की रात रे.....
नयन भरें काजरवा, सांवरिया यामिनी,
बज उठी बाँसुरिया, झूम उठी रागिनी !
एक-एक दिवना में लाख-लाख बातियाँ,
ज्योति जगी देहरी पर नाच उठी कामिनी !!
गोरी ने नृत्य किया, दीप धरे हाथ रे......
दीवाली की रात रे......
ह्रदय का जुआ हुआ, लक्ष्मी के सामने,
धड़कन की चाल बढ़ी, पहले ही दांव में !
नयनों में होड़ लगी, कौन किसे जीत ले,
हौले से बांह गही,शर्मीले काम ने !!
रन जाने होड़ में कौन जीत जाये रे...
दीवाली की रात रे......
(साभार-डॉ.तपेश चतुर्वेदी )

                (2.)
---एक ऐसा जलाएं दीया---
एक ऐसा जलाएं दीया आज हम,
मावसी रात को भी जो पूनम करे !
रोशनी का जो केवल दिखावा करें,
उन सितारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
करने वालों ने वादे किये हैं बहुत,
किन्तु पूरा करेंगे ये वादा नहीं !
जिनके कन्धों से ताकत विदा ले गयी,
उन सहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
यों समन्दर में पानी की सीमा नहीं,
किन्तु पीने के काबिल नहीं बूंद भी !
जिनसे प्यासों को जीवन नहीं मिल सके,
उन फुहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
कुछ बदलने से मौसम ख़ुशी तो मिली,
चाहता हूँ यह मौसम ना बदले कभी !
जिनके आने से बगिया में रौनक ना हो,
उन बहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
हम भयानक भंवर से तो बचते रहे,
पर तटों ने हमेशा छलावा किया !
जो लहर के थपेड़ों से खुद मिट गए,
उन किनारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
 (साभार-डॉ.तपेश चतुर्वेदी)
            
                 (3.)
       ---कुछ मुक्तक----
दर्द ने ऐसी ग़ज़ल गायी है,याद कोहरे-सी दिल पर छायी है !
जाने वालों ज़रा ठहरो,देखो..प्यार की आंख छलक आयी  है !!
क्या करूँ बहुत कड़ा पहरा है,हर तरफ एक प्रश्न गहरा है !
बात मन की कहूँ मै किससे,कान हैं किन्तु मनुज बहरा है !!
(साभार-डॉ.तपेश चतुर्वेदी) 

                  (4.)
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतनाअँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए...
नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल,उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग,उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए।
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतनाअँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए....
सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यों ही,भले ही दिवाली यहाँ रोज आए।
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए....
मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में,नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के,नहीं कर सकेंगे हृदय में उजेरा,
कटेगे तभी यह अँधेरे घिरे अब,स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए,
जलाओ दिये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए....
(साभार-नीरज)

              (5.)
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ.....
है कहाँ वह आग जो मुझको जलाए,है कहाँ वह ज्वाल मेरे पास आए,
रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ,आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।
तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी,नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी,
आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ,आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।
मैं तपोमय ज्योति की, पर, प्यास मुझको,है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको,
स्नेह की दो बूँद भी तो तुम गिराओ,आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।
कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूँगा,कल प्रलय की आँधियों से मैं लडूँगा,
किंतु मुझको आज आँचल से बचाओ,आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ।
(साभार- डॉ. हरिवंशराय बच्चन)

               (6.)
दिशा-दिशा में दीपों की आलोक-ध्वजा फहराओदेह-प्रहित शुभ शुक्र !
आज तुम घर-घर में उग आओव्योम-भाल पर अंकित कर दो ज्योति-हर्षिणी क्रीड़ासप्तवर्ण सौंदर्य !
प्रभामंडल में प्राण जगाओ! 
जागो! जागो! किरणों के ईशान !
क्षितिज-बाहों में जागो द्योनायक! पर्जन्यों की अरश्मि राहों में,
जागो स्वप्नगर्भ तमसा के उर्ध्व शिखर अवदातीश्री के संवत्सर जागो द्युति की चक्रित चाहों में। 
तिमिर-पंथ जीवन की जल-जल उठे वर्तिका कालीप के समूची सृष्टि विभा से,
अमा घनी भौंरालीसुषमा के अध्वर्य, उदित शोभा के मंत्रजयी ओ!
भर दो ऊर्जा से प्रदीप्ति की भुवन-मंडिनी थाली। 
गोरज-चिह्नित अंतरिक्ष के ज्योति-कलश उमड़ाओ,
स्वर्णपर्ण नभ से फिर मिट्टी के दीपों में आओआभा के अधिदेव !
मिटा दो धरा-गगन की रेखारश्मित निखिल यज्ञफल को फिर जन-जन सुलभ बनाओ 
दिशा-दिशा में इंद्रक्रांति के कुमुद-पात्र बिखराओ,
सप्तसिंधु-पोषित धरणी की अंजलि भरते जाओ,सुरजन्मी आलोक !
चतुर्दिक प्रतिकल्पी तम छायाश्री के संवत्सर! ऋतुओं की जड़ता पर छा जाओ!
(साभार-रामेश्वर शुक्ल 'अंचल')


          (7.)
‘एक चूड़ी टूटती तो हाय हो जाता अमंगल,
मेघ में बिजली कड़कती, कांपता संपूर्ण जंगल,
भाग्य के लेखे लगाते, एक तारा टूटता तो,
अपशकुन शृंगारिणी के हाथ दर्पण छूटता तो,
 दीप की चिमनी चटकती, चट तिमिर का भय सताता,
कौन सुनता विस्फोट, जब कोई हृदय है टूट जाता।
(साभार-रामेश्वर खंडेलवाल 'तरुण)

"प्रस्तुत साभार कविताओं का मेरे जीवन पर अमिट प्रभाव है, मेरे इन आदर्श परमादरणीय रचनाकारों को मेरा शत-शत विनम्र नमन:"

    • Rohit Sharma VERY NICE
      November 5, 2010 at 1:31pm ·  ·  1 person

    • Anupama Pathak sundar sankalan!
      deepotsav ki haardik shubhkamnayen!!!!

      November 5, 2010 at 4:18pm ·  ·  3 people

    • Manjulata Verma bahut achchha hai, deep-jyoti diwali se sambandhit kavitayen,padha.dhanvad, radhe radhe,
      November 5, 2010 at 10:11pm ·  ·  2 people

    • Manoj K Gautam AAPKI KALAM KA JAWAAB NAHI BOSS! BAHUT ACHCHA LIKHTE HAIN.
      November 5, 2010 at 11:06pm ·  ·  1 person

    • Shaileshwar Pandey Aape ke in Sato (7) Kavitawo ko padha. bahut hi acha laga vastav me dipawali se sambanthit ye kavitaye prerana dayag hai...dhanyavaad

      Ma Laxmi ka aap ki Sukh smavrithi den aur Ma Saraswati sadaiv aap ke kalam ko shakti...Shubh Dipavali.

      November 6, 2010 at 3:12am ·  ·  2 people

    • Manjula Saxena happy diwali
      November 6, 2010 at 4:12am ·  ·  1 person

    • Manoj Joshi दीपावली की शुभकामनाएँ..
      बहुत अच्छा संकलन है ...ऐसे ही और भी विषयों पर आप हिंदी साहित्य के हस्ताक्षरों से परिचय कराते रहें....

      November 6, 2010 at 7:09pm ·  ·  1 person

    • Bharti Pandit sundar sangrah manoj bhai.. badhai..
      November 6, 2010 at 7:20pm ·  ·  1 person

    • Poonam Singh 
      ‎-
      परमादरणीय गुरुदेव,
      इस संकलन की अधिकांश कवितायें ऐसी चुनी गई हैं जो कि बहुत मशहूर हैं। विद्यार्थी इस संग्रह से विशेष रूप से लाभान्वित होंगे !
      इस अर्थ में जीजिविषा और आदमी के आंतरिक संघर्ष को लिखने वाले प्रतिनिधि कवि के रूप में हमारे सामने आते हैं।
      व्यक्ति को अपने कविता के केन्द्र में रखकर यूं तो बहुत से रचनाकारों ने कविताएं लिखी हैं, किंतु उक्त कविता इस संग्रह की आधार कविता है, जहां कवि स्वयं की अनुभूतियों का विस्तार उसी केन्द्र से ज़ुडकर करता है, जहां व्यक्ति का संघर्ष, उसका अंतरद्वंद्व और उसकी भूखप्यास छटपटाहट काम कर रहे हैं। यहां पर उसकी तकलीफों में कवि इतना डूब चुका होता है कि उसी का एक हिस्सा हो जाता है।
      गुरुदेव !आप भी तो बहुत सुंदर लिखते हैं, हमें और हमारे अन्य साथियों को कब सौभाग्य मिलेगा.............

      November 6, 2010 at 11:20pm ·  ·  2 people

    • Manoj Chaturvedi 
      ‎***
      मेरे प्रिय मित्रों,
      आपको मेरा यह संकलन पसंद आया,बहुत-बहुत धन्यवाद !
      प्रिय परम प्रतिभाशाली शिष्य पूनम सिंह शर्मा,
      तुम्हे हार्दिक आभार एवम धन्यवाद........,
      दरअसल यह भूमिका है मेरे साहित्य को प्रेरणा देने वाले मेरे प्रिय साहित्यकारों को आभार प्रकट करते हुए अपने साहित्य को प्रस्तुत करने हेतु एक आधार बनाने के लिए......,
      ज़ल्दी ही मेरे गीतों का परिचय भी मेरे मित्रों को मिलेगा...

      November 6, 2010 at 11:29pm ·  ·  3 people

    • Praveen Nahta ‎@manoj.....> good collection....achhaa lagaa...
      November 6, 2010 at 11:33pm ·  ·  1 person

    • Kakaa Guru जय गणेश, आपके प्रोफाइल परिचय में एक पंक्ति '' गलत लोग दूर भले '' पढकर खुशी हुई, सही कहा है- '' दुर्जन री कृपा बुरी सजन री भली त्रास - तावड तप गर्मी पड़े तब बरसन री आस '' -काकागुरु