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बुधवार, 28 सितंबर 2011

शहीद भगतसिंह सदैव हमारे ह्रदय में हैं...



आज महान शहीदे-आजम शहीद भगतसिंह  का १०५वाँ जन्मदिन है || 
शहीद भगतसिंह के जन्मदिन पर जरूरत है कि हम महज रस्मी श्रद्धान्जलियों से हटकर अपने सच्चे शहीद की याद को सच्चे दिल से ताजा करें | यह ज़रुरत सिर्फ इसलिए नहीं है कि वे विदेशी गुलामी से देश को आजाद करवाने के लिए भरी जवानी में अपनी जान तक की बाजी लगा गए, हम सच्चे के लिए शहीद भगतसिंह को याद करना आज इससे भी गहरे अर्थ रखता है |
शहीद भगतसिंह  असेम्बली में बम फेंकने के बाद, तत्कालीन अदालत ने जब भगतसिंह से पूछा कि क्रांति क्या है, तब शहीद भगतसिंह ने इस कविता के ज़रिये क्रांति को परिभाषित किया था----
"जब गतिरोध की स्थिति
लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है,
तो वे किसी भी प्रकार की
तब्दीली से हिचकते हैं,
इस जड़ता और निष्क्रियता को तोडऩे के लिए
एक क्रांतिकारी स्पिरिट की जरूरत होती है,
इस परिस्थिति को बदलने के लिए
यह जरूरी हैकि क्रांति की स्पिरिट
ताजा की जाए ताकि
इंसानियत की रूह में हरकत पैदा हो।"


भगत सिंह का जन्म २८ सितंबर, सन १९०७,शनिवार सुबह ९ बजे लायलपुर ज़िले के बंगा गाँव (चक नम्बर १०५ जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। हालांकि उनका पैतृक निवास आज भी भारतीय पंजाब के नवाँशहर ज़िले के खटकड़कलाँ गाँव में स्थित है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। यह एक सिख परिवार था जिसने आर्य समाज के विचार को अपना लिया था। अमृतसर में १३ अप्रैल, सन १९१९ को हुए जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह की सोच पर गहरा प्रभाव डाला था। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसिएशन नाम के एक क्रान्तिकारी संगठन से जुड़ गए थे। भगत सिंह ने भारत की आज़ादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना की थी। इस संगठन का उद्देश्य ‘सेवा,त्याग और पीड़ा झेल सकने वाले’ नवयुवक तैयार करना था। भगत सिंह ने राजगुरु के साथ मिलकर १७ दिसम्बर, सन १९२८ को लाहौर में सहायक पुलिस अधीक्षक रहे अंग्रेज़ अधिकारी जे०पी० सांडर्स को मारा था। इस कार्रवाई में क्रान्तिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद ने भी उनकी सहायता की थी। क्रान्तिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर भगत सिंह ने अलीपुर रोड पर स्थित दिल्ली की तत्कालीन सेण्ट्रल एसेम्बली के सभागार में ८ अप्रैल, सन १९२९ को 'अंग्रेज़ सरकार को जगाने के लिये' बम और पर्चे फेंके थे। बम फेंकने के बाद वहीं पर दोनों ने अपनी गिरफ्तारी भी दी ।
शहीद भगत सिंह को हिन्दी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भी आती थी जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी । उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये । इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामालिखने से साफ मना कर दिया । पं० रामप्रसाद 'बिस्मिल' ने अपनी आत्मकथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे उनका भगत सिंह ने अक्षरश: पालन किया। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाए तथा फ़ाँसी देने के बदले गोली से उड़ा दिया जाये ।

फ़ाँसी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में 
शहीद भगत सिंह ने लिखा था -
उन्हें यह फ़िक्र है हरदम नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है,
हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है |
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें,चर्ख से क्यों ग़िला करें,
सारा जहाँ अदू सही,आओ! मुक़ाबला करें ।
शहीद भगत सिंह की जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। शहीद भगत सिंह सदा ही शेर की तरह जिए और एक सच्चे शेर की तरह ही फाँसी पर चढ़ गए। चन्द्रशेखर आजा़द से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी ।


बहुत कम लोग जानते हैं कि भगतसिंह बीसवीं शताब्दी के राजनैतिक कार्यकर्ताओं के बीच एक प्रमुख बुद्धिजीवी भी थे। आज उन्हें इसी रूप में याद करने की आवश्यकता है। लगभग २ साल वे जेल में रहे। इस बीच उन्होंने बहुत सी पुस्तकें पढीं। इनमें यूरोप-अमेरिका के विद्वान, चिंतक, बुद्धिजीवी साहित्यकारों की पुस्तकें हैं। उनका पूर्ण राजनीतिक जीवन १८ साल का रहा और कुल उम्र २५ साल। अजीब संयोग है कि रानी लक्ष्मीबाई भी २३ साल की उम्र में अंग्रेजों से लडते हुए शहीद हो गयीं। भगतसिंह के अन्य साथी यतीन्द्रनाथ ने ६५ दिन तक आमरण अनशन किया-जेल सुधार तथा मानवाधिकारों के लिए। इसके बाद वह भी २३ वर्ष की आयु में शहीद हो गये। उनकी शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया। ब्रिटिश सरकार भी मजबूर हो गयी। क्रान्तिकारियों का यह प्रभाव भी पडा कि वहाँ पढने लिखने की सामग्री दी जाने लगी। यह सुधार कुछ मामूली परिवर्तनों के साथ, लगभग उसी रूप में आज भी मौजूद है।
भगत सिंह लाहौर जेल में १९२९ से २३ मार्च, १९३१ तक, फाँसी पर चढाए जाने से पूर्व नोटबुक लिखते रहे। २०वीं सदी के किसी भी लेखक या बुद्धिजीवी में इतनी वैचारिक प्रगति नहीं दीखती, जितनी भगत सिंह में। १९१८ से उनका आंदोलनकारी सफल आरंभ हुआ। तब वे आर्य समाजी थे, फिर सुधारवादी फिर अराजकतावादी होते हुए अंत में वैज्ञानिक समाजवाद के साये में आये। आतंकवाद को वे गलत समझते थे। उनका विचार था कि बिना संगठन और पार्टी के कोई परिवर्तन संभव नहीं है, क्रांतिकारी के रूप में ये दोनों बहुत आवश्यक हैं। लेनिन उनके आदर्श थे। कहना प्रासंगिक होगा कि फाँसी का बुलावा आया तो भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ रहे थे, तब उन्होंने एक हाथ उठाकर कहा कि रुको, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है। उन्होंने नौजवानों से अपील की कि ’’व्यवस्थित ढंग से आगे बढने के लिए आपको जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। भगतसिंह ने इस देश की जनता को तीन नारे दिये-

१. इंकलाब- जिन्दाबाद ||, 
२. किसान-मजदूर जिन्दाबाद || 
३. साम्राज्यवाद का नाश हो।| 
ये तीनों नारे आज हमारी श्रमिक एवं संघर्षशील जनता के कंठहार हैं। भगतसिंह ने महत्वपूर्ण कार्य यह किया कि अपने समय के क्रान्तिकारी आंदोलन को पुराने क्रांतिकारी आंदोलन की रूढवादी परम्परा से विमुक्त किया। पुराने क्रांतिकारी किसी न किसी देवी-देवता के उपासक थे और दृढ ईश्वर विश्वासी थे। वे इस सबको नियति का खेल मानते थे। भगतसिंह ने कहा कि इस प्रकार के क्रांतिकारी अंत में साधु-सन्यासी बन जाते हैं। उन्होंने धर्म को राजनीति से अलग रखने का सबसे अधिक प्रयास किया। राजनीति और धर्म के मेल में देशभक्ति की भावना मर जाती है, अपने इसी विचार को नौजवानों तक पहुँचाने के लिए भगतसिंह ने एक लेख लिखा-’मैं नास्तिक क्यों हूँ‘ जो आज भी बहुत चाव से पढा जाता है। भगत सिंह ने यह भी कहा कि ’’हमें धर्मनिरपेक्ष राजनीति की जष्रूरत है। हमें ऐसी राजनीति की जरूरत नहीं जो किसी भी धर्म को महत्व दे।‘‘ भगत सिंह की यह बात बहुत सही ठहरती है क्यों कि पिछले अनेक वर्षों से धर्म की राजनीति हो रही है और दंगे कराये जा रहे हैं। आज तो इस में जाति का भी समावेश हो गया है। धर्म की राजनीति करने वाले लोग हर समस्या का हल अतीत में देखते हैं। उनके लिए हर समस्या का हल उनके धार्मिक ग्रंथों में निहित है। ऐसे दिवास्वप्न देखने वाले लोग देश का क्या भला करेंगे ।

 'भगत सिंह तुम जिंदा हो, हम सबके दिलों में'
शहीद भगत सिंह को हमारा शत-शत नमन...............

रविवार, 18 सितंबर 2011

"मेरे प्रेरणास्त्रोत,आदर्श,मार्गदर्शक,दार्शनिक, पिताश्री डॉ. तपेश चतुर्वेदी"



प्रात:स्मरणीय,परमश्रद्धेय ब्रह्मलीन पिताश्री डॉ.तपेश चतुर्वेदीजी की आज ८४वीं जन्मतिथि पर सादर नमन सहित................,
उनकी गोद में इस जगत के प्रथम साक्षात्कार किये थे और उनकी ही ऊँगली पकड़कर प्रथम बार इस पावन भूमि पर कदम रखा था !
उनके सानिंध्य में और उनके परमस्नेही आशीर्वाद की छाया में ज्ञान प्राप्त किया था, उन परम पावन महान आत्मा को मेरा सादर शत-शत नमन..........
मेरे प्रेरणास्त्रोत, आदर्श, मार्गदर्शक, दार्शनिक, पिताश्री डॉ. तपेश चतुर्वेदी का एक संक्षिप्त परिचय :---

जन्मतिथि: 

१८ सितम्बर, १९२७
जन्मस्थान: 

मंझोली(जिला- गोरखपुर)
योग्यता: एम.ए.( अंग्रेजी, हिन्दी
, समाजशास्त्र) ; पीएच.डी.
व्यवसाय: 
विश्विद्यालय के अंतर्गत स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में १८ वर्ष अंग्रेज़ी तथा २० वर्षों तक हिन्दी साहित्य का कुल ३८ वर्षों का अध्यापन, 
अनेक शिक्षण संस्थाओ में प्राचार्य पद का निर्वहन,
सन १९८९ में सेवानिवृति पश्चात् मुंबई फिल्मक्षेत्र में लेखन कार्य

प्रकाशन: 

विनयपत्रिका-दर्शन (विस्तृत समीक्षा)
सुगम भाषा-विज्ञान,
हिन्दी भाषा का इतिहास,
उपन्यासकार वृन्दावनलाल वर्मा(झाँसी की रानी संदर्भित),
उपन्यासकार यशपाल(झूठा सच 
संदर्भित),
षोडश ग्रन्थ(अनूदित),
संगीत-वेद(अनूदित),
अनुभूतियाँ बोलती है (काव्य संग्रह),
इनके अतिरिक्त अनेक राष्ट्रीय प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओ में कविताये, लेख, निबंध, समीक्षायें प्रकाशित !

सामाजिक-कार्य: 
लोक कल्याण समिति के महासचिव पद पर २० वर्षो तक जनसेवा-कार्य |
जिला-कारागार,मथुरा के वीक्षक
भारतीय रेलवे की हिन्दी-परामर्श समिति के सदस्य
अखिल भारतीय महाविद्यालीय पत्रिका समिति के अध्यक्ष
अनेक शिक्षा प्रबंध समितियों के अध्यक्ष

महानिर्वाण: 
१८ नवम्बर, २००६ को प्रात: काल ब्रह्म मुहूर्त में शांतिपूर्वक ब्रह्मलीन |||

"एक ऐसा जलाएं दीया आज हम,मावसी रात को भी जो पूनम करे !
रोशनी का जो केवल दिखावा करें,उन सितारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
करने वालों ने वादे किये हैं बहुत,किन्तु पूरा करेंगे ये वादा नहीं !
जिनके कन्धों से ताकत विदा ले गयी,उन सहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
यों समन्दर में पानी की सीमा नहीं,किन्तु पीने के काबिल नहीं बूंद भी !
जिनसे प्यासों को जीवन नहीं मिल सके,उन फुहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
कुछ बदलने से मौसम ख़ुशी तो मिली,चाहता हूँ यह मौसम ना बदले कभी !
जिनके आने से बगिया में रौनक ना हो,उन बहारों की हमको ज़रूरत नहीं !!
हम भयानक भंवर से तो बचते रहे,पर तटों ने हमेशा छलावा किया !
जो लहर के थपेड़ों से खुद मिट गए,उन किनारों की हमको ज़रूरत नहीं !!"
(रचयिता-डॉ.तपेश चतुर्वेदी)

शनिवार, 23 जुलाई 2011

'भारतमाता के वीर सपूत चन्द्रशेखर आजाद'


"हमारी लडाई आखिरी फैसला होने तक की लडाई है और वह फैसला है जीत या मौत"

भारतमाता के वीर सपूत चन्द्रशेखर आजाद का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गाँव में २३ जुलाई सन् १९०६ को हुआ था। आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी संवत् १९५६ में अकाल के समय अपने पैतृक निवास उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गाँव को छोडकर पहले कुछ दिनों मध्य प्रदेश अलीराजपुर रियासत में नौकरी करते रहे फिर जाकर भावरा गाँव में बस गये। यहीं बालक चन्द्रशेखर का बचपन बीता। उनकी माँ का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भावरा गाँव में बीता अतएव बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी ।
सन् १९१९ में हुए अमृतसर के जलियांवाला बाग नरसंहार ने देश के नवयुवकों को उद्वेलित कर दिया। चन्द्रशेखर उस समय पढाई कर रहे थे। तभी से उनके मन में एक आग धधक रही थी। जब गाँधी जी ने सन् १९२१ मेंअसहयोग आन्दोलन फरमान जारी किया तो वह आग ज्वालामुखी बनकर फट पडी और तमाम अन्य छात्रों की भाँति चन्द्रशेखर भी सडकों पर उतर आये। अपने विद्यालय के छात्रों के जत्थे के साथ इस आन्दोलन में भाग लेने पर वे पहली बार गिरफ़्तार हुए और उन्हें १५ बेतों की सज़ा मिली। इस घटना का उल्लेख पं० जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोडने वाले एक छोटे से लडके की कहानी के रूप में किया है- "ऐसे ही कायदे (कानून) तोडने के लिये एक छोटे से लडके को, जिसकी उम्र १५ या १६ साल की थी और जो अपने को 'आज़ाद' कहता था, बेंत की सजा दी गयी। वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बाँध दिया गया। जैसे-जैसे बेंत उस पर पडते थे और उसकी चमडी उधेड डालते थे, वह 'महात्मा गान्धी की जय!' चिल्लाता था। हर बेंत के साथ वह लडका तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया। बाद में वही लडका उत्तर भारत के आतंकवादी कार्यों के दल का एक बडा नेता बना।"
जब फरवरी सन् १९२२ में असहयोग आन्दोलन के दौरान चौरी-चौरा की घटना के पश्चात् बिना किसे से पूछे गाँधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोह भंग हो गया और पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल,शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने १९२४ में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (एच० आर० ए०) का गठन किया । चन्द्रशेखर आज़ादभी इस दल में शामिल हो गये। इस संगठन ने जब गाँव के अमीर घरों में डकैतियाँ डालीं, ताकि दल के लिए धन जुटाने की व्यवस्था हो सके तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के उपर हाथ नहीं उठाया जाएगा। एक गाँव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन लिया तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया। इस डकैती में क्रान्तिकारी दल के आठ सदस्यों पर, जिसमें आज़ाद और बिस्मिल भी शामिल थे, पूरे गाँव ने हमला कर दिया। बिस्मिल ने मकान के अन्दर घुसकर उस औरत के कसकर चाँटा मारा, पिस्तौल वापस छीनी और आजाद को डाँटते हुए खींचकर बाहर लाये। इसके बाद दल ने केवल सरकारी प्रतिष्ठानों को ही लूटने का फैसला किया। १ जनवरी सन् १९२५ को दल ने समूचे हिन्दुस्तान में अपना बहुचर्चित पर्चा द रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी) बाँटा जिसमें दल की नीतियों का खुलासा किया गया था। इस पैम्फलेट में सशस्त्र क्रान्ति की चर्चा की गयी थी। इश्तहार के लेखक के रूप में विजयसिंह का छद्म नाम दिया गया था। शचीन्द्रनाथ सान्याल इस पर्चे को बंगालमें पोस्ट करने जा रहे थे तभी पुलिस ने उन्हें बाँकुरा में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। " एच० आर० ए० " के गठन के अवसर से ही इन तीनों प्रमुख नेताओं- बिस्मिल, सान्याल और चटर्जी में इस संगठन के उद्देश्यों को लेकर मतभेद था ।
द रिवोल्यूशनरी (क्रान्तिकारी)  दल के अंतर्गत संघ की नीतियों के अनुसार ९ अगस्त सन् १९२५ को काकोरी काण्ड को अंजाम दिया गया । लेकिन इससे पहले ही अशफाक उल्ला खाँ ने ऐसी घटनाओं का विरोध किया था क्योंकि उन्हें डर था कि इससे प्रशासन उनके दल को जड़ से उखाड़ने पर तुल जायेगा और ऐसा ही हुआ भी। अंग्रेज़ चन्द्रशेखर आज़ाद को तो पकड़ नहीं सके पर अन्य सर्वोच्च कार्यकर्ताओं - पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह को १९ दिसम्बर सन् १९२७ तथा उससे २ दिन पूर्व राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी को १७ दिसम्बर सन् १९२७ को फाँसी पर चढ़ाकर मार दिया गया । सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं के पकडे जाने से इस मुकदमे के दौरान दल पाय: निष्क्रिय ही रहा। एकाध बार बिस्मिल तथा योगेश चटर्जी आदि क्रान्तिकारियों को छुड़ाने की योजना भी बनी जिसमें आज़ाद के अलावा भगत सिंह भी शामिल थे लेकिन किसी कारण वश यह योजना पूरी न हो सकी।
८ सितम्बर सन् १९२८ को ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी और १६ को कडी कैद की सजा के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद ने उत्तर भारत के सभी कान्तिकारियों को एकत्र कर दिल्ली के फीरोज शाह कोटला मैदान में एक गुप्त सभा का आयोजन किया। इसी सभा में भगत सिंह को भी दल का प्रचार-प्रमुख बनाया गया। इसी सभा में तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दलों को अपने-अपने उद्देश्य इस सभा में केन्द्रित कर लेने चाहिये। पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् एकमत से समाजवाद को भी दल के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल घोषित करते हुए " हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन " का नाम बदलकर " हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन " रखा गया।चन्द्रशेखर आज़ाद ने सेना-प्रमुख (कमाण्डर-इन-चीफ) का दायित्व सम्हाला। इस दल के गठन के पश्चात् एक नया लक्ष्य निर्धारित किया गया- "हमारी लडाई आखिरी फैसला होने तक की लडाई है और वह फैसला है जीत या मौत"
आज़ाद के प्रशंसकों में पण्डित मोतीलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास टंडन का नाम शुमार था। जवाहरलाल नेहरू से आज़ाद की भेंट आनन्द भवन में हुई थी उसका ज़िक्र नेहरू ने अपनी आत्मकथा में 'फासीवादी मनोवृत्ति' के रूप में किया है। इसकी कठोर आलोचना मन्मथनाथ गुप्त ने अपने लेखन में की है। कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि नेहरू ने आज़ाद को दल के सदस्यों को समाजवाद के प्रशिक्षण हेतु रूस भेजने के लिये एक हजार रुपये दिये थे जिनमें से ४४८ रूपये आज़ाद की शहादत के वक़्त उनके वस्त्रों में मिले थे। सम्भवतः सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय तथा यशपाल का रूस जाना तय हुआ था पर सन् १९२८-३१ के बीच शहादत का ऐसा सिलसिला चला कि दल लगभग बिखर सा गया। जबकि यह बात सच नहीं है। चन्द्रशेखर आज़ाद की इच्छा के विरुद्ध जब भगत सिंह एसेम्बली में बम फेंकने गये तो आज़ाद पर दल की पूरी जिम्मेवारी आ गयी। साण्डर्स वध में भी उन्होंने भगत सिंह का साथ दिया और बाद में उन्हें छुड़ाने की पूरी कोशिश भी की । आज़ाद की सलाह के खिलाफ जाकर यशपाल ने २३ दिसम्बर सन् १९२९ को दिल्ली के नज़दीक वायसराय की गाड़ी पर बम फेंका तो इससे आज़ादक्षुब्ध थे क्योंकि इसमें वायसराय तो बच गया था पर कुछ और कर्मचारी मारे गए थे। आज़ाद को २८ मई सन् १९३० को भगवतीचरण वोहरा की बम-परीक्षण में हुई शहादत से भी गहरा आघात लगा था । इसके कारण भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना भी खटाई में पड़ गयी थी। भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु की फाँसी रुकवाने के लिए आज़ाद ने दुर्गा भाभी को गाँधीजी के पास भेजा जहाँ से उन्हें कोरा जवाब दे दिया गया था। आज़ाद ने अपने बलबूते पर झाँसी और कानपुर में अपने अड्डे बना लिये थे । झाँसी में मास्टर रुद्र नारायण, सदाशिव मलकापुरकर, भगवानदास माहौर तथा विश्वनाथ वैशम्पायन थे जबकि कानपुर में पण्डित शालिग्राम शुक्ल सक्रिय थे। शालिग्राम शुक्ल को १ दिसम्बर सन् १९३० को पुलिस ने आज़ाद से एक पार्क में मिलने जाते वक्त शहीद कर दिया था ।
दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड और एच०एस०आर०ए० द्वारा किये गये साण्डर्स-वध में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ ३ ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। ११ फरवरी सन् १९३१ को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की सीतापुर जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर नेहरू जी ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपने तकियाकलाम 'स्साला' के साथ भुनभुनाते हुए ड्राइँग रूम से बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क की ओर चले गये। अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। 
बहुत देर तक आज़ाद ने जमकर अकेले ही मुक़ाबला किया। उन्होंने अपने साथी सुखदेवराज को पहले ही भगा दिया था। आख़िर पुलिस की कई गोलियाँ आज़ाद के शरीर में समा गईं। उनके माउज़र में केवल एक आख़िरी गोली बची थी। उन्होंने सोचा कि यदि मैं यह गोली भी चला दूँगा तो जीवित गिरफ्तार होने का भय है। अपनी कनपटी से माउज़र की नली लगाकर उन्होंने आख़िरी गोली स्वयं पर ही चला दी। गोली घातक सिद्ध हुई और उनका प्राणांत हो गया। भारतमाता के वीर सपूत चन्द्रशेखर आजाद को वीरगति प्राप्त हुई ।
यह दुखद घटना २७ फरवरी सन् १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी । पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की शहादत की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद के अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद की शहादत की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।
चन्द्रशेखर आज़ाद के शहीद हो जाने की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। । बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पडा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व ६ फरवरी सन् १९२७ को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेष बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे पर उन्हें क्या पता था कि इलाहाबाद की इसी धरा पर कुछ दिनों बाद उनका भी बलिदान होगा |
चन्द्रशेखर आज़ाद ने वीरता की नई परिभाषा लिखी थी। चन्द्रशेखर आज़ाद के बलिदान के बाद उनके द्वारा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन और तेज हो गया, उनसे प्रेरणा लेकर हजारों युवक स्‍वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े। चन्द्रशेखर आज़ाद की शहादत के सोलह वर्षों बाद १५ अगस्त सन् १९४७ को हिन्दुस्तान की आजादी का उनका सपना पूरा तो हुआ किन्तु वे उसे जीते जी देख न सके। आजाद अपने दल के सभी क्रान्तिकारियों में बडे आदर की दृष्टि से देखे जाते थे। सभी उन्हें पण्डितजी ही कहकर सम्बोधित किया करते थे । वे सच्चे अर्थों में पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल के वास्तविक उत्तराधिकारी जो थे ।आज इस देश के महान सपूत और देश को आज़ादी दिलाने के लिए अपने आपको, अपने परिवार को, अपने सुख चैन और भूख-प्यास सबको बलिदान कर देने वाले भारतमाता के वीर सपूत चन्द्रशेखर आजाद का जन्म दिन है, लेकिन स्थिति देखिये किसी अखबार में, किसी समाचार चैनल में और किसी राजनेता के माध्यम से इस देश के महान सपूत चंद्रशेखर आज़ाद  का नाम तक नहीं लिया गया है ।
वन्दे मातरम...

सोमवार, 18 जुलाई 2011

'प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत मंगल पांडे'



सन् १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत वीरवर मंगल पांडे का जन्म १९ जुलाई सन् १८२७ को वर्तमान उत्तर प्रदेश, जो उन दिनों संयुक्त प्रान्त आगरा व अवध के नाम से जाना जाता था, के बलिया जिले में स्थित नागवा गाँव में हुआ था । इनके पिता का नाम श्री.दिवाकर पांडे तथा माता का नाम श्रीमती अभय रानी था। वीरवर मंगल पांडे कोलकाता के पास बैरकपुर की सैनिक छावनी में ३४वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के एक सिपाही थे । भारत की आजादी की पहली लड़ाई अर्थात सन् १८५७ के विद्रोह की शुरुआत उन्हीं से हुई जब गाय व सुअर कि चर्बी लगे कारतूस लेने से मना करने पर उन्होंने विरोध जताया । इसके परिणाम स्वरूप उनके हथियार छीन लिये जाने व वर्दी उतार लेने का फौजी हुक्म हुआ। मंगल पांडे ने उस आदेश को मानने से इनकार कर दिया और २९ मार्च, सन् १८५७ का दिन अंग्रेजों के लिए दुर्भाग्य के दिन के रूप में उदित हुआ। पाँचवी कंपनी की चौंतीसवीं रेजीमेंट का 1446 नं. का सिपाही वीरवरमंगल पांडे अंग्रेज़ों के लिए प्रलय-सूर्य के समान निकला। बैरकपुर की संचलन भूमि में प्रलयवीर मंगल पांडे का रणघोष गूँज उठा- "बंधुओ! उठो! उठो! तुम अब भी किस चिंता में निमग्न हो? उठो, तुम्हें अपने पावन धर्म की सौगंध! चलो, स्वातंत्र्य लक्ष्मी की पावन अर्चना हेतु इन अत्याचारी शत्रुओं पर तत्काल प्रहार करो।"प्रलयवीर मंगल पांडे के बदले हुए तेवर देखकर अंग्रेज़ सारजेंट मेजर हडसन उसने पथ को अवरुद्ध करने के लिए आगे बढ़ा। उसने उस विद्रोही को उसकी उद्दंडता का पुरस्कार देना चाहा। अपनी कड़कती आवाज़ में उसने मंगल पांडे को खड़ा रहने का आदेश दिया। क्रांतिवीर प्रलयवीर मंगल पांडे के अरमान मचल उठे। वह शिवशंकर की भाँति सन्नद्ध होकर रक्तगंगा का आह्वान करने लगा। उसकी सबल बाहुओं ने बंदूक तान ली। क्रांतिवीर प्रलयवीर की सधी हुई उँगलियों ने बंदूक का घोड़ा अपनी ओर खींचा और घुड़ड़ घूँsss का तीव्र स्वर घहरा उठा। मेजर हडसन घायल कबूतर की भाँति भूमि पर तड़प रहा था । अंग्रेज़ सारजेंट मेजर हडसन का रक्त भारत की धूल चाट रहा था। सन् १८५७ के क्रांतिकारी ने एक फिरंगी की बलि ले ली थी। विप्लव महायज्ञ के परोधा क्रांतिवीर मंगल पांडे की बंदूक पहला 'स्वारा' बोल चुकी थी। स्वातंत्र्य यज्ञ की वेदी को मेजर हडसन की दस्यु-देह की समिधा अर्पित हो चुकी थी । मेजर हडसन को धराशायी हुआ देख लेफ्टिनेंट बॉब वहाँ जा पहुँचा। उस अश्वारूढ़ गोरे ने मंगल पांडे को घेरना चाहा। पहला ग्राम खाकर मंगल पांडे की बंदूक की भूख भड़क उठी थी। उसने दूसरी बार मुँह खोला और लेफ्टिनेंट बॉब घोड़े सहित भू-लुंठित होता दिखाई दिया। गिरकर भी बॉब ने अपनी पिस्तौल मंगल पांडे की ओर सीधी करके गोली चला दी। विद्युत गति से वीर मंगल पांडे गोली का वार बचा गया और बॉब खिसियाकर रह गया। अपनी पिस्तौल को मुँह की खाती हुई देख बॉब ने अपनी तलवार खींच ली और वह मंगल पांडे पर टूट पड़ा। क्रांतिवीर मंगल पांडे भी कच्चा खिलाड़ी नहीं था। बॉब ने मंगल पांडे पर प्रहार करने के लिए तलवार तानी ही थी कि क्रांतिवीर मंगल पांडे की तलवार का भरपूर हाथ उसपर ऐसा पड़ा कि बॉब का कंधा और तलवारवाला हाथ जड़ से कटकर अलग जा गिरा। एक बलि मंगल पांडे की बंदूक ले चुकी थी और दूसरी उसकी तलवार ने ले ली । इससे पूर्व क्रांतिवीर मंगल पांडे ने अपने अन्य साथियों से उनका साथ देने का आह्वान भी किया था किन्तु कोर्ट मार्शल के डर से जब किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया तो उन्होंने अपनी ही रायफल से उस अंग्रेज अधिकारी को मौत के घाट उतार दिया जो उनकी वर्दी उतारने और रायफल छीनने को आगे आया था । लेफ्टिनेंट बॉब को गिरा हुआ देख एक दूसरा अंग्रेज़ मंगल पांडे की ओर बढ़ा ही था कि मंगल पांडे के साथी एक भारतीय सैनिक ने अपनी बंदूक डंडे की भाँति उस अंग्रेज़ की खोपड़ी पर दे मारी। अंग्रेज़ की खोपड़ी खुल गई। अपने आदमियों को गिरते हुए देख कर्नल व्हीलर मंगल पांडे की ओर बढ़ा; पर सभी क्रुद्ध भारतीय सिंह गर्जना कर उठे- "खबरदार, जो कोई आगे बढ़ा! आज हम तुम्हारे अपवित्र हाथों को ब्राह्मण की पवित्र देह का स्पर्श नहीं करने देंगे।"
कर्नल व्हीलर जैसा आया था वैसा ही लौट गया। इस सारे कांड की सूचना अपने जनरल को देकर, अंग्रेज़ी सेना को बटोरकर ले आना उसने अपना धर्म समझा। जंग-ए-आज़ादी के पहले सेनानी मंगल पांडे ने 
 सन् १८५७ में ऐसी चिनगारी भड़काई, जिससे दिल्ली से लेकर लंदन तक की ब्रिटेनिया हुकूमत हिल गई । इसके बाद विद्रोही क्रांतिवीर मंगल पांडे को अंग्रेज सिपाहियों ने पकड लिया। अंगेज़ों ने भरसक प्रयत्न किया कि वे मंगल पांडे से क्रांति योजना के विषय में उसके साथियों के नाम-पते पूछ सकें; पर वह मंगल पांडे था, जिसका मुँह अपने साथियों को फँसाने के लिए खुला ही नहीं । मंगल होकर वह अपने साथियों का अमंगल कैसे कर सकता था | उन पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकदमा चलाकर ६ अप्रैल सन् १८५७ को मौत की सजा सुना दी गयी। फौजी अदालत ने न्याय का नाटक रचा और फैसला सुना दिया गया। कोर्ट मार्शल के अनुसार उन्हें १८ अप्रैल सन् १८५७ को फाँसी दी जानी थी । परन्तु इस निर्णय की प्रतिक्रिया कहीं विकराल रूप न ले ले, इसी कूट रणनीति के तहत क्रूर ब्रिटिश सरकार ने मंगल पांडे को निर्धारित तिथि से दस दिन पूर्व ही ८ अप्रैल सन् १८५७ को फाँसी पर लटका कर मार डाला । बैरकपुर के जल्लादों ने मंगल पांडे के पवित्र ख़ून से अपने हाथ रँगने से इनकार कर दिया। तब कलकत्ता से चार जल्लाद बुलाए गए । ८ अप्रैल,सन् १८५७ के सूर्य ने उदित होकर मंगल पांडे के बलिदान का समाचार संसार में प्रसारित कर दिया । भारत के एक वीर पुत्र ने आजादी के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। वीर मंगल पांडे के पवित्र प्राण-हव्य को पाकर स्वातंत्र्य यज्ञ की लपटें भड़क उठीं । क्रांति की ये लपलपाती हुई लपटें फिरंगियों को लील जाने के लिए चारों ओर फैलने लगीं ।
क्रांतिवीर 
प्रलयवीर मंगल पांडे द्वारा लगायी गयी विद्रोह की यह चिनगारी बुझी नहीं। एक महीने बाद ही १० मई सन् १८५७ को मेरठ की छावनी में बगावत हो गयी। यह विपलव देखते ही देखते पूरे उत्तरी भारत में फैल गया जिससे अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश मिल गया कि अब भारत पर राज्य करना उतना आसान नहीं है जितना वे समझ रहे थे ।क्रांति के नायक मंगल पांडे को कुछ इतिहासकार विद्रोही मानते हैं, लेकिन वे स्वतंत्रता सेनानी थे। ब्रिटेन के रिकार्ड में पूरा इतिहास अलग नजरिए और पूर्वाग्रह से दर्ज किया गया है। उनके रिकार्ड में मंगलपांडे के बारे में केवल दो पेज मिलते हैं, जबकि जबानी तौर पर ढेर सारी बातें पता चलती हैं । लोकगीतों और कथाओं के माध्यम से भी हमें मंगल पांडे के बारे में ढेर सारी जानकारियां मिलती हैं।
इसी तरह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बारे में भी विरोधाभासी विचार मिलते हैं। ब्रिटिश इतिहासकारों ने अपना दृष्टिकोण लिखा है। भारतीय इतिहासकारों ने इस 
स्वतंत्रता संग्राम को बाद में सही संदर्भ में पेश किया। क्रांतिवीर मंगल पांडे वास्तव में आजादी के प्रतीक थे। हर व्यक्ति इज्जत से सिर उठा कर जी सके, यही तो वे चाहते थे। भारत के इतिहास में मंगल पांडे का खास महत्व है । हमें याद रखना चाहिए कि हर शासन करने वाली पार्टी का अपना एक तंत्र और प्रशासन का तरीका होता है। चूंकि शासन करने वाली पार्टी ही इतिहास रिकार्ड करती है, इसलिए यह पूरी तरह से उसके इरादों पर निर्भर करता है कि वह क्या लिखे और क्या छोड़ दे। इसमें इतिहासकारों का स्वार्थ और नजरिया काम कर रहा होता है।
अंग्रेजों ने तो 
सन् १८५७ की आजादी की लड़ाई को सिपाहियों का विद्रोह कहा था तो क्या हम भी वही मान लें ? बिल्कुल नहीं मानेगें । हमें अपने शहीदों पर गर्व करना चाहिए कि उन्होंने आजादी की भावना के जो बीज सन् १८५७ में डाले थे, वह सन् 1९४७ में भारत की आजादी के साथ जाकर अंकुरित हुआ ।सन् १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत क्रांति के नायक मंगल पांडे को नमन ...
'जय हिंदी,जय हिंदी 

बुधवार, 13 जुलाई 2011

'क्रांति के नायक नेताजी सुभाषचन्द्र बोस'



नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण क्षण-----




सन्‌ १८९७, २३ जनवरी - कटक उड़ीसा में सुभाष चन्द्र बोस का जन्म |सन्‌ १९०२ - पाँच वर्ष की आयु में बालक सुभाष का अक्षरारंभ संस्कार संपन्न हुआ ।
सन्‌ १९०८ - ग्यारह वर्ष की आयु में उन्होने आर. कालेजियट स्कूल में प्रवेश लिया और यहीं उनका अपने शिष्य बेनी प्रसाद जी से परिचय हुआ ।
सन्‌ १९१६ - अंग्रेज प्रोफेसर ओटन द्वारा भारतीयों के लिए अपशब्द प्रयोग करना सहन नहीं हुआ और उन्होंने उस प्रोफ़ेसर की पिटाई कर दी |
सन्‌ १९२० - आई. सी. एस. से त्यागपत्र । सन्‌ १९२४ - गिरफ्तारी मांडले जेल में प्रवास ।
सन्‌ १९२७ - काँग्रेस आन्दोलन के मंच से सीधी कार्यवाही का प्रयास ।सन्‌ १९३३ - यूरोप में भारतीय पक्ष का प्रचार ।सन्‌ १९३७ - सुभाषचन्द्र बोस ने उत्तर भारत की अपनी धर्मयात्रा को आधार बनाते हुए अपनी आत्मकथा 'An Indian Pilgrim' लिखी |
सन्‌ १९४१ - ग्रेट एस्केप ।
सन्‌ १९४३ -आजाद हिन्द फौज व अन्तिम सरकार का गठन ।
सन्‌ १९४५ - भारत को मुक्‍त कराने के लिए आक्रमण, चलो दिल्ली चलो का आह्‌वान |
सन्‌ १९४५, १९ दिसम्बर - मन्चूरिया रेडियों से अंतिम सन्देश |

श्री जानकी नाथ बोस व श्रीमती प्रभा देवी की जी के बड़े परिवार में २३ जनवरी सन्‌१८९७ को उड़ीसा के कटक में उन्होंने जन्म लिया | प्रारम्भ से ही राजनीतिक परिवेश में पलेबढे सुभाष के घर का वातावरण कुलीन था | मेधावी सुभाष के विचारों पर स्वामी विवेकानंद का गहन प्रभाव था तथा उनको आध्यात्मिक गुरु मानते थे | स्वामी विवेकानंद के साहित्य से सुभाष का लगाव प्रभावी रूप में है | सुभाष लगभग 5 वर्ष के थे तब विवेकानंद का देहावसान हुआ था | सुभाष के लिए विवेकानंद गुजरे ज़माने के दार्शनिक नहीं थे बल्कि कीर्तिमान भारतीय थे | स्वामी विवेकानंद को पढ़कर सुभाष की धार्मिक जिज्ञासा प्रबल हुई थी|
सन्‌ १९०२ में पाँच वर्ष की आयु में बालक सुभाष का अक्षरारंभ संस्कार संपन्न हुआ । वे कटक के मिशनरी स्कूल मे पढते थे । सन्‌ १९०८ में ग्यारह वर्ष की आयु में उन्होने आर. कालेजियट स्कूल में प्रवेश लिया । यहीं उनका अपने शिष्य बेनी प्रसाद जी से परिचय हुआ । इनके राष्ट्रीय विचारों और व देशभक्ति से ओत-प्रोत व्यक्तित्व का सुभाष पर गहरा प्रभाव पडा । सन्‌ १९१५ में सुभाष ने प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रवेश लिया और दर्शन शास्त्र को अपना प्रिय विषय चुना ।अपनी भारत माँ को पराधीनता से मुक्त करने के उनके अभियान का प्रारम्भ उस घटना से हुआ, जब सन्‌ १९१६ में विद्यार्थी जीवन काल में अंग्रेज प्रोफेसर ओटन द्वारा भारतीयों के लिए अपशब्द प्रयोग करना उनसे सहन नहीं हुआ और उन्होंने उस प्रोफ़ेसर ओटन को थप्पड मार दिया और उसकी पिटाई कर दी | परिणाम स्वरूप विख्यात प्रेसिडेंसी कालेज से उनको निकाल दिया गया । सन्‌ १९१७ में श्री श्यामाप्रसाद मुखर्जी के पिता आशुतोष मुखर्जी प्रयास से उनका निष्कासन रद्द हुआ । अब उनकी गणना विद्रोहियों में होने लगी | इसके पश्चात प्रिंस ऑफ़ वेल्स के आगमन पर सन्‌ १९२१ में उनको बंदी बनाया गया क्योंकि वह उनके स्वागत में आयोजित कार्यक्रम का बहिष्कार कर रहे थे|
राय बहादुर की उपाधि से विभूषित उनके पिता पाश्चात्य सभ्यता के रंग में रंगे थे और उनको सिविल सेवाओं में देखना चाहते थे,परन्तु सिविल सेवाओं की परीक्षा-परिणाम की रेंकिंग में चतुर्थ स्थान प्राप्त करने वाले सुभाष को अंग्रेजों की जी हजूरी कर अपने भाइयों पर अत्याचार करना पसंद नहीं था, कुछ समय उन्होंने विचार किया और हमारे देश के महान सपूत मह्रिषी अरविन्द घोष जिन्होंने स्वयं सिविल सेवाओं का मोह छोड़ देश की आजादी के संघर्ष को अपना धर्म माना था के आदर्श को शिरोधार्य कर अपना ध्येय अपनी भारतमाता की मुक्ति को बनाया और भारत लौट आये |
भारत में वह देशबंधु चितरंजन दास के साथ देश की आजादी के लिए बिगुल बजाना चाहते थे, उनको वह अपना राजनीतिक गुरु मानते थे, परन्तु रविन्द्रनाथ टेगोर ने उनको पहले महात्मा गांधी से मिलने का परामर्श दिया | सुभाष गांधीजी से भेंट करने गए,विचार-विमर्श किया |
भारतीय स्वतंत्रता के लिए अपने सर्वस्व का त्याग करने वाले क्रांति के नायक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के सन्दर्भ में स्वतंत्र भारत की लोकतान्त्रिक सरकार की निम्न निंदनीय गतिविधियाँ हम सभी जागरूक भारतीयों के लिए विचारणीय हैं------
(१) नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के चित्रों को सरकारी कार्यालय आदि स्थानों पर लगाये जाने पर पाबन्दी क्यों लगाई गयी? यह पाबन्दी भारत सरकार की सहमति पर बम्बई सरकार ने ११ फरवरी सन्‌ १९४९ को गुप्त आदेश संख्या नं० 155211 के अनुसार प्रधान कार्यालय बम्बई उप-क्षेत्र कुलाबा-६ द्वारा लगाई गई ।
(२) नेताजी को अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध अपराधी भारतीय नेताओं ने क्यों स्वीकार किया? अन्तर्राष्ट्रीय अपराधी गुप्त फाईल नं० 10(INA) क्रमांक २७९ के अनुसार नेताजी को सन्‌ १९९९ तक युद्ध अपराधी घोषित किया गया था, जिस फाईल पर आज़ाद भारत के तत्कालीन प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के हस्ताक्षर हैं । परन्तु 3-12-1968 में यू.एन.ओ. परिषद के प्रस्ताव नं० 2391/ xx3 के अनुसार सन्‌ १९९९ की बजाय आजीवन युद्ध अपराधी घोषित किया जिस पर आज़ाद भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी के हस्ताक्षर हैं ।
अगस्त सन्‌ २००२ में भारत सरकार द्वारा गठित मुखर्जी आयोग के सदस्यों को तब करारा झटका लगा, जब ब्रिटिश सरकारसे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी से सम्बंधित गोपनीयदस्तावेजों की माँग की तथा ब्रिटिश सरकार ने मुखर्जी आयोग के सदस्यों को सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए वापिस लौटा दिया तथा सन्‌२०२१ से पहले अपने अभिलेखागार से कोई भी महत्वपूर्ण दस्तावेज जो नेताजी से सम्बंधित है,उनको देने से इन्कार कर दिया एवं मुखर्जी आयोग के सदस्य १३ अगस्त सन्‌ २००१ को लाल कृष्ण आडवाणी,तत्कालीन गृहमंत्री, भारत सरकार से मिले थे तथा आयोग के सदस्यों ने गृहमंत्री भारत सरकार से आग्रह किया था कि भारत सरकार लंदन में उनके लिए दस्तावेजों की उपयोगी सामग्री दिलाने के लिए समुचित कदम उठाए एवं आयोग के सदस्यों ने गृहमंत्री भारत सरकार से यह भी कहा था कि रूस के लिए भी सरकारी रूप से पत्र लिखें जिससे रूस भी ब्रिटिश सरकार पर दबाव डाले और आयोग के सदस्यों को दस्तावेज मिल सकें।यदि उस समय श्री अटल बिहारी वाजपेयी, तत्कालीन प्रधानमंत्री, भारत सरकार, सरकारी तौर पर ब्रिटेन पर दबाब डालते तो गोपनीयता समझौतों के दस्तावेज प्राप्त किये जा सकते थे । इसलिए तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी तथा तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का मौन रहना भी कोई राज की बात है तथा नेताजी के विरूद्ध हुए समझौतों को स्वीकृति देना है ।
नेताजी के विषय में भ्रमित भारतीयों के प्रश्नों के उत्तर भी भ्रम को दूर कर सकने में असमर्थ ही रहे हैं ----
अनेक प्रमाणों से अब जबकि सिद्ध हो चुका है कि नेताजी की मृत्यु वायुयान दुर्घटना में नहीं हुई थी और न ही आज सरकार के पास नेताजी के मृत्यु की कोई निश्‍चित तारीख है । इसके साथ ही खण्डित भारत सरकार शाहनवाज जांच कमेटी तथा खोसला आयोग द्वारा भी नेताजी की वायुयान दुर्घटना में मृत्यु सिद्ध नहीं कर पाई।उपरोक्‍त दोनों जांच समितियों की रिपोर्ट से भारत के लोगों को नेताजी के विषय में गुमराह करने का षड्‍यंत्र रचा । इस षड्‍यन्त्र से भारतीय लोगों के दिमाग में तरह-तरह के सवाल उठना जरूरी है । कुछ ऐसे प्रश्नों के उत्तर सुभाषवादी जनता (बरेली) की सन्‌ १९८२ में प्रकाशित एक “नेताजी प्रशस्तिका” में दिए गए हैं ।अब यह ज्वलंत प्रश्न है कि आज जो देश की हालत है उसे देखकर क्या नेताजी चुप रह सकते थे?अब यह एक और ज्वलंत प्रश्न है कि क्या नेताजी जैसा देशभक्‍त इतने लम्बे समय तक छिपकर बैठ सकता था ?इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि कौन सा ऐसा महान क्रान्तिकारी है जो छुप कर न रहा हो ? यथा--
(१) जरा सोचो रामचंद्र जी को अवतार माना जाता है, फिर उन्होंने छिपकर बाली को बाण क्यों मारा ?
(२) क्या पाण्डव छिपकर जंगलों में नहीं रहे थे ?
(३) क्या अर्जुन ने स्वयं को बचाने के लिए स्त्री का रूप धारण नहीं किया था ?
(४) क्या हजरत मौहम्मद साहब जिहाद में अपनी जान बचाने के लिए छिपकर मक्‍का छोड़कर मदीना नहीं चले गये थे ?
(५) क्या छत्रपति शिवाजी कायर थे, जो औरंगजेब की कैद से मिठाई की टोकरी में छिपकर निकले थे ?
(६) क्या चन्द्रशेखर आजाद और भगतसिंह समय-समय पर भूमिगत नहीं हुये थे ?
(७) क्या चे गोवेरा तथा मार्शल टीटो जैसे विश्‍व के महान क्रान्तिकारी अपनी जिन्दगी में अनेक बार भूमिगत नही हुये थे?क्या उपरोक्‍त सभी महान क्रान्तिकारी कायर थे ?
यह सभी क्रान्तिकारी बहुत साहसी थे और वे केवल अपने उद्देश्यों के लिये भूमिगत हुए थे । जबकि नेताजी इन क्रान्तिकारियों के गुरू भी हैं तथा नेताजी की लड़ाई तो पूरे विश्‍व में साम्राज्य के खिलाफ है । इसलिये नेताजी किसी भय से नहीं अपितु अपने महान उद्देश्य को पूरा करने के लिये भूमिगत हुए ।
जब नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने गृहत्याग किया, तब उनके परिवार वाले रोये और बिलखे | उस समय परिवार में बच्चों की संख्या अधिक होती थी, लेकिन इससे उनकी महत्ता कम नहीं होती थी | सुभाषचन्द्र बोस ने उत्तर भारत की अपनी धर्मयात्रा को आधार बनाते हुए अपनी आत्मकथा सन्‌ १९३७ में 'An Indian Pilgrim' के नाम से लिखी, इस तरह की यात्रायें और गोपनीयता,सर्वस्व का त्याग और अबूझ की तलाश सुभाष के जीवन यात्रा की अनिवार्यता बन गयी थी | देश की स्वतन्त्रता के लिए सुभाषचन्द्र बोस कुछ भी कर सकते थे. यह कुछ भी कर सकना कामयाब हुआ क्योंकि अंग्रेजी सरकार की फ़ौज में क्रांति की भावना स्थायी तौर पर घर कर गयी | आज़ाद हिंद फ़ौज के बाद रायल इन्डियन नेवल म्युटिनी ने अंग्रेजी सरकार को कंपा दिया था | ब्रिटिश फ़ौज का अब आखिरी सहारा भी भरोसे का नहीं रहा था | माउन्टबेटन को जल्दबाजी में वायसराय बना कर लाया गया ताकि भारत को आज़ादी दे कर ब्रिटिश यहाँ से प्रतिष्ठापूर्वक निकल सकें | साम्राज्य को सांघातिक चोट पहुचाने का कार्य सुभाष चन्द्र बोस ने किया था |
यह बहुत कम व्यक्ति जानते हैं कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने एक कविता सन्‌ १९३० में लिखी थी---


"जीवन धाराजितना अधिक त्याग करेंगे,
हम जीवन काउतने ही वेग से प्रवाहित होगी,
जीवनधाराजीवन चलेगा तब अंतहीन,
बहुत कुछ है कहने के लिएऔर.... 
जीवन-शक्ति है भरपूर मुझ में,
बहुत सी खुशियाँ हैं यहाँ,
बहुत सी हैं अभिलाषाएं,
इन सब से परिपूर्ण मात्र हैजीवनधारा...."
यह याद रहे कि व्यक्‍ति जितना महान होता है, उसका उद्देश्य भी उतना ही महान होता है ।प्रश्न यह है कि नेताजी का क्या उद्देश्य है ? प्रश्न यह है कि यदि नेताजी जीवित हैं तो क्यों नहीं आते ?इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने सन्‌ १९३१ में कहा था “इस समय हमारा एक ही लक्ष्य है- “भारत की स्वाधीनता” | नेताजी भारत के विभाजन के विरूद्ध थे । उन्होंने यह भी कहा था कि “हमारा युद्ध केवल ब्रिटिश साम्राज्य से नहीं बल्कि संसार के साम्राज्यवाद के विरूद्ध है । अतः हम केवल भारत के लिये ही नहीं बल्कि मनुष्य मात्र के हितों के लिये भी लड़ रहे हैं । भारत की पूर्ण स्वतंत्रता का अर्थ है- समस्त मानव जाति का भय मुक्‍त हो जाना । "भारतीय स्वाधीनता संग्राम के महत्वपूर्ण स्वर्णिम अध्याय को लिखते हुए ” आज़ाद हिंद फौज” का ७००० सैनिकों के साथ गठन किया | इसके बाद ही उनको” नेता जी ” का नाम मिला. “तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आज़ादी दूंगा ” ‘ का नारा देने वाले सुभाष ने दिया “दिल्ली चलो ” का जोशीला नारा और आज़ाद हिंद फौज ने जापानी सेना की सहायता से अंडमान निकोबार पहुँच कर देश को अंग्रेजी दासता से मुक्त कराने का प्रथम चरण पूरा किया और इन द्वीपों को “शहीद” तथा “स्वराज” नाम प्रदान किये..कोहिमा और इम्फाल को आज़ाद कराने के प्रयास में सफल न होने पर भी हार नहीं मानी सुभाष ने,तथा आज़ाद हिंद फौज कीमहिला टुकड़ी “झांसी की रानी” रेजिमेंट के साथ आगे बढ़ते रहे | आज़ाद हिंद फौज का कार्यालय रंगून स्थानांतरित किया गया | उनके अनुयायी दिनप्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे और ये खतरे की घंटी न जाने किस किस के लिए थी |नेताजी ने सिंगापूर में स्वाधीन भारत की अंतरिम सरकार का गठन किया और उसको नौ देशों ने मान्यता प्रदान की | जापान की सेना का भरपुर सहयोग उनको मिल ही रहा था,परन्तु वह चाहते थे अधिकाधिक भारतीयों की भागीदारी इसमें हो, धुरी राष्ट्रों की हार के कारण नेताजी को अपने सपने बिखरते लगे और उन्होंने रूस की ओर अपनी गति बढ़ायी थी | नेताजी मंचूरिया जाते समय लापता हो गए और शेष सब रहस्य बन गया और अनंत में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस खो गए | आज तक यह रहस्य रहस्य ही बना हुआ है |
"किस भाँति जीना चाहिए, किस भाँति मरना चाहिए ।
लो सब हमें निज पूर्वजों से सीख लेना चाहिए ।।"
(साभार-राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त)
जहाँ तक हम भारतवासियों के विश्‍वास का प्रश्न है, तो हम यही मानते हैं कि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस अभी भी जीवित हैं और अब भारत के लोगों के विवेक व सोच पर निर्भर करता है । लेकिन वे कब प्रकट होंगे इस प्रश्न का समुचित उत्तर नेताजी के अनुसार तृतीय विश्‍व युद्ध की चरम सीमा पर प्रकट होना है । जैसा कि उन्होंने १९ दिसम्बर सन्‌ १९४५ को मन्चूरिया रेडियों से अपने अन्तिम सन्देश में कहा था । नेताजी जानते थे कि द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद भी एक और महायुद्ध अवश्य होगा, जिसकी सम्भावना उन्होंने २६ जून सन्‌ १९४५ को आजाद हिन्द रेडियो (सिंगापुर) से प्रसारित अपने एक भाषण में व्यक्‍त कर दी थी । धीरे-धीरे संसार तृतीय महायुद्ध के निकट पहुँच रहा है । इसी महायुद्ध में भारत पुनः अखण्ड होगा तथा नेताजी का प्रकटीकरण होगा ।
भारत के धूर्त राजनीतिज्ञों से नेताजी का कोई समझौता नहीं होगा । नेताजी किसी भी व्यक्‍ति या देश के बल पर नहीं, अपनी ही शक्‍ति के बल पर प्रकट होंगे । उनके प्रकट होने से पहले उनके नेताजी होने के बारे में सन्देह के बादल छँट चुके होंगे । जैसे अर्जुन का अज्ञातवास पूरा होने पर गाण्डीव धनुष की टंकार ने पाण्डवों के होने के सन्देह के बादल छांट दिये थे ।हमें सुभाष चन्द्र बोस की ये गीत 'खूनी हस्‍ताक्षर' याद दिलाता है---
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं ।
वह खून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं ।
वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें जीवन, न रवानी है !
जो परवश होकर बहता है, वह खून नहीं, पानी है !
उस दिन लोगों ने सही-सही, खून की कीमत पहचानी थी ।
जिस दिन सुभाष ने बर्मा में, मॉंगी उनसे कुरबानी थी ।
बोले, स्‍वतंत्रता की खातिर, बलिदान तुम्‍हें करना होगा ।
तुम बहुत जी चुके जग में, लेकिन आगे मरना होगा ।
आज़ादी के चरणें में जो, जयमाल चढ़ाई जाएगी ।
वह सुनो, तुम्‍हारे शीशों के, फूलों से गूँथी जाएगी ।
आजादी का संग्राम कहीं, पैसे पर खेला जाता है ?
यह शीश कटाने का सौदा, नंगे सर झेला जाता है”
यूँ कहते-कहते वक्‍ता की, ऑंखें में खून उतर आया !
मुख रक्‍त-वर्ण हो दमक उठा, दमकी उनकी रक्तिम काया !
आजानु-बाहु ऊँची करके, वे बोले,”रक्‍त मुझे देना ।
इसके बदले भारत की, आज़ादी तुम मुझसे लेना ।”
हो गई उथल-पुथल, सीने में दिल न समाते थे ।
स्‍वर इनकलाब के नारों के, कोसों तक छाए जाते थे ।
“हम देंगे-देंगे खून”, शब्‍द बस यही सुनाई देते थे ।
रण में जाने को युवक खड़े, तैयार दिखाई देते थे ।
बोले सुभाष,” इस तरह नहीं, बातों से मतलब सरता है ।
लो, यह कागज़, है कौन यहॉं, आकर हस्‍ताक्षर करता है ?
इसको भरनेवाले जन को, सर्वस्‍व-समर्पण काना है।
अपना तन-मन-धन-जन-जीवन, माता को अर्पण करना है ।
पर यह साधारण पत्र नहीं, आज़ादी का परवाना है ।
इस पर तुमको अपने तन का, कुछ उज्‍जवल रक्‍त गिराना है !
वह आगे आए जिसके तन में, भारतीय ख़ूँ बहता हो।
वह आगे आए जो अपने को, हिंदुस्‍तानी कहता हो !
वह आगे आए, जो इस पर, खूनी हस्‍ताक्षर करता हो !
मैं कफ़न बढ़ाता हूँ, आए, जो इसको हँसकर लेता हो !
सारी जनता हुंकार उठी- हम आते हैं, हम आते हैं !
माता के चरणों में यह लो, हम अपना रक्‍त चढ़ाते हैं !
साहस से बढ़े युबक उस दिन, देखा, बढ़ते ही आते थे !
चाकू-छुरी कटारियों से, वे अपना रक्‍त गिराते थे !
फिर उस रक्‍त की स्‍याही में, वे अपनी कलम डुबाते थे !
आज़ादी के परवाने पर, हस्‍ताक्षर करते जाते थे |
उस दिन तारों ना देखा था, हिंदुस्‍तानी विश्‍वास नया।
जब लिखा था महा रणवीरों ने, ख़ूँ से अपना इतिहास नया ||
(साभार- गोपालप्रसाद व्यास)।


'जय हिंद,जय हिंदी'

सोमवार, 4 जुलाई 2011

'अन्ना हजारे का परिचय व जीवन-दर्शन'





अपने पूर्व-प्रकाशित निम्नलिखित आलेखों में आम व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाले समाजवादी और गांधीवादी अन्ना(अण्णा) हजारे का उल्लेख विस्तार से कर चुका हूँ, 

(१) 'वर्तमान भ्रष्टाचार, कालेधन और व्यवस्था परिवर्तन पर संघर्ष' 
(२) एक आदर्श 'लोकपाल विधेयक' 
(३) 'स्थापित और मान्य भ्रष्टाचार की समस्या'


अनेक मित्रों को इनके जीवन का परिचय और जीवन-आदर्श जानने की उत्सुकता है, अतएव यह आलेख प्रस्तुत कटे हुए अपार हर्ष है......

आम व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने वाले समाजवादी और गांधीवादी अन्ना(अण्णा) हजारे का जन्म १५जनवरी, सन १९४० को महाराष्ट्र के अहमदनगर के भिंगर क़स्बे में हुआ था | अन्ना हज़ारे का बचपन बहुत ग़रीबी और अभावों में गुज़रा | श्री अन्ना  हजारे का वास्‍तविक नाम किशन बाबूराव हजारे है | पिता मजदूर थे, दादा फौज में थे और दादा की पोस्टिंग भिंगनगर में थी | अन्ना का पुश्‍तैनी गाँव अहमदनगर ज़िले में स्थित रालेगन सिद्धि में था | अपने दादा की मौत के सात साल बाद अन्ना का परिवार रालेगन आ गया परन्तु उनके परिवार की ग़रीबी और तंगी देखकर अन्ना हज़ारे की बुआ उन्हें अपने साथ मुंबई ले गईं | कुछ समय बाद उनका परिवार भी भिंगर से उनके पुरखों के गाँव रालेगन सिद्धि चला आया था |
श्री अन्ना  हजारे के अलावा उनके परिवार में उनके छः और भाई थे | श्री अन्ना हजारे ने मुंबई में अपनी बुआ के साथ रहते हुए सातवीं तक पढ़ाई की | परिवार की आर्थिक स्थिति देखकर वह दादर स्टेशन के बाहर एक फूल बेचनेवाले की दुकान में मात्र ४० रुपये की पगार पर काम करना प्रारम्भ किया | इसके बाद उन्होंने फूलों की अपनी दुकान खोल ली और अपने दो भाइयों को भी रालेगन से बुला लिया |
श्री अन्ना हजारे वर्ष 1962 में चीन के खिलाफ जंग के बाद सेना में शामिल हुए थे। सेना में एक ट्रक चालक के तौर पर उन्हें नौकरी मिली और उनकी तैनाती पंजाब में की गई  और उनकी पहली पोस्टिंग बतौर ड्राइवर हुई | सन १९६५ ईस्वी के भारत – पाक युद्ध भी उन्होंने खेमकरण सेक्टर पर लड़ा था | यहीं से उनका जीवन परिवर्तन का समय शुरू हुआ, इस पाकिस्तानी हमले में वह मौत को धता बता कर बाल-बाल बचे थे | इसी दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उन्होंने विवेकानंद की एक पुस्‍तक ‘कॉल टु दि यूथ फॉर नेशन’ खरीदी और उसको पढ़ने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी समाज को समर्पित कर दी | उन्होंने महात्मा गांधी और विनोबा भावे को भी पढ़ा और उनके विचारों को अपने जीवन में ढ़ाल लिया और समाज की सेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया |
सन १९७० में उन्होंने आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प किया | अपनी मुम्बई पोस्टिंग के दौरान वह अपने गांव रालेगन आते-जाते रहे | जम्मू पोस्टिंग के दौरान १५ साल फौज में पूरे होने पर १९७५ में उन्होंने वीआरएस ले लिया और गांव में आकर बस गए | उन्होंने गांव की तस्वीर ही बदल दी और साथ ही अन्ना भ्रष्ट्राचार के ख़िलाफ़ आंदोलन में कूद पड़े. उन्होंने अपनी जमीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दान कर दी |
अन्ना हज़ारे का विचार है कि भारत की असली ताकत गाँवों में है और इसीलिए उन्होंने गाँवों में विकास की लहर लाने के लिए मोर्चा खोला. अन्ना हज़ारे ने सेना से रिटायरमेंट के तुरंत बाद सन १९७५ से सूखा प्रभावित रालेगाँव सिद्धि में काम शुरू किया. जहाँ औसतन सालाना वर्षा ४०० से ५०० मिलीमीटर ही होती थी, गाँव में जल संचय के लिए कोई तालाब नहीं थे. उनका गाँव पानी के टैंकरों और पड़ोसी गाँवों से मिले खाद्यान्न पर निर्भर रहता था, उन्होंने अपने बलबूते वर्षा जल संग्रह, सौर ऊर्जा, बायोगैस का प्रयोग और पवन ऊर्जा के उपयोग से गाँव को स्वावलंबी और समृद्ध बना दिया. यह गाँव विश्व के अन्य समुदायों के लिए आदर्श बन गया है.
श्री अन्ना हजारे ने अपनी पुस्तैनी ज़मीन बच्चों के हॉस्टल के लिए दान कर दी, आज भी उनकी पेंशन का सारा पैसा गाँव के विकास में ख़र्च होता है | संपत्ति के नाम पर उनके पास कपड़ों की कुछ जोड़ियाँ हैं | अन्ना हज़ारे का कोई बैंक बैलेंस नही हैं | वह गाँव के मंदिर में रहते हैं और हॉस्टल में रहने वाले बच्चों के लिए बनने वाला खाना ही खाते हैं | आज गाँव का हर शख़्स आत्मनिर्भर है, आस-पड़ोस के गाँवों के लिए भी यहाँ से चारा, दूध आदि जाता है | 
अन्ना हज़ारे सन १९९८ में उस समय चर्चा में आ गए थे, जब उन्होंने तत्कालीन सरकार के दो नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार करने के लिए आवाज़ उठाई थी | सरकार में मंत्री शशिकांत सुतार को अपनी कुर्सी छोडनी पड़ी | उसी समय के रोज़गार मंत्री महादेव शिवणकर को भी सरकार से बाहर होना पड़ा | मंत्री रही शोभाताई फडणविस को भी भ्रष्ट्राचार के आरोप के चलते अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. | सन १९९८ में सामजिक न्यायमंत्री बबनराव घोलप को ज़मीन घोटाले के चलते इस्तीफ़ा देना पड़ा | वहीं एनसीपी के नबाब मलिक, सुरेश दादा जैन को भी आघाडी सरकार में भ्रष्ट्राचार के आरोपों के चलते ही अपना पद छोडना पड़ा | शराब बंदी अभियान, कॉऑपरेटिव घोटाला जैसे कई अहम भ्रष्टाचार के मुद्दे सामने लाने का श्रेय अन्ना हज़ारे को जाता है और इसी तरह सन २००५ में अन्ना हज़ारे ने तत्कालीन सरकार को उसके चार भ्रष्ट नेताओं के ख़िलाफ़ कार्यवाही करने के लिए दबाव डाला था |
अन्ना हज़ारे की समाजसेवा और समाज कल्याण के कार्य को देखते हुए सरकार ने उन्हें समय-समय पर अनेक पुरस्कारों, जिनमे सन १९९० में पद्मश्री और सन १९९२ में पदम् विभूषण शामिल है, दिये गये |  अन्ना हज़ारे ने अपने राज्य महाराष्ट्र में विषम परिस्थितियों में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अनेक लडाईयाँ लड़ीं और सफल भी हुए और अब इस ७१ वर्ष की उम्र में भी उनका एक ही सपना है – 'भ्रष्टाचार रहित भारत का निर्माण' करना, हम सभी को उनके इस पुनीत प्रयास में भागीदार अवश्य बनना है | 
अन्ना हज़ारे एक बार पद्मश्री महाराष्ट्र के रालेगाँव में ग्राम स्वराज के अपने अनुभव बांटने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में आमंत्रित थे वहाँ उन्होंने गांधीजी की इस सोच को पूरी मजबूती से उठाया कि ‘बलशाली भारत के लिए गाँवों को अपने पैरों पर खड़ा करना होगा’ | उनके अनुसार विकास का लाभ समान रूप से वितरित न हो पाने का कारण रहा, गाँवों को केन्द्र में न रखना | व्यक्ति निर्माण से ग्राम निर्माण और तब स्वाभाविक ही देश निर्माण के गांधीजी के मन्त्र को उन्होंने हकीकत में उतार कर दिखाया, और एक गाँव से आरम्भ उनका यह अभियान आज ८५ गावों तक सफलतापूर्वक जारी है.व्यक्ति निर्माण के लिए मूल मन्त्र देते हुए उन्होंने युवाओं में उत्तम चरित्र, शुद्ध आचार-विचार, निष्कलंक जीवन व त्याग की भावना विकसित करने व निर्भयता को आत्मसात कर आम आदमी की सेवा को आदर्श के रूप में स्वीकार करने का आह्वान किया |
वर्तमान सरकार के समक्ष अप्रैल,२०११ में केवल पांच दिनों में ही उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक क्रांति का सूत्रपात कर दिया । अन्ना हजारे ने अपने पूर्व घोषित निर्णय के अनुसार जन लोकपाल विधेयक लाने हेतु सरकार पर दबाव बनाने और जन समर्थन को जुटाने के लिए ५ अप्रैल,२०११ से दिल्ली के जंतर मंतर पर आमरण अनशन शुरू कर दिया था और उनके बैनरों पर लिखा हुआ था- 'भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनयुद्ध' | अन्ना हजारे द्वारा उठाया गया कदम जनता के मन में तेजी से असर कर गया और वह उनके पीछे खड़ी होती नजर आ रही है और जन-समर्थन बढ़ता जा रहा है। 
इस तरह स्पष्ट है कि अन्ना हजारे ने सरकार के उपर इतना नैतिक बल स्वयं का और जनता के बल का पैदा कर दिया कि अंतत: सरकार को उनके सामने झुकना पड़ा और उनकी पांच में तीन महत्वपूर्ण मांगे स्वीकार करने से ‘जन लोकपाल विधेयक’ को कानून बनाने का रास्ता खुलने का मार्ग प्रशस्त होता जा रहा है । यद्यपि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर समस्त राजनैतिक पार्टिया, संस्थायें और आम नागरिक एकमत है कि हमारा राजनैतिक, सामाजिक व व्यक्तिगत जीवनभ्रष्टाचार विहीन होना चाहिए । अन्ना हजारे को इस बात का बहुत बड़ा श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि स्वाधीन भारत में यह प्रथम बार हुआ है जब चुनी हुई सरकार ने अपने ही कानून बनाने का अधिकार, जो  संविधान ने दिया है में उन लोगो की भागीदारी जिन्हे संविधान कोई अधिकार प्रदत्त नहीं करता है, देना स्वीकार किया है । 
अन्ना हजारे ने इससे पहले भी महाराष्ट्र राज्य में भ्रष्टाचार के विरोध में इस गान्धीवादी तरीके का सफल प्रयोग किया है और उस राज्य के कई मंत्रियों को उनके पद से हटने के लिए मजबूर किया है | इस बार भी अन्ना हज़ारे को सफलता मिली. सरकार ने उनकी मांगें मानी और जनता के सामने मजबूरन झुकी |  अन्ना हज़ारे सत्ता की राजनीति नहीं करते और उनका साफ सुथरा जीवन इतिहास उनको गांधीवाद का सच्चा प्रतिनिधि दर्शाता है | अन्ना हज़ारे की छोटी कद-काठी के पीछे एक दृढ़ इच्छाशक्ति वाला इंसान छिपा हुआ है। वह महात्मा गांधी की तरह ही अहिंसा को अपने हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं । महात्मा गांधी की तरह अन्ना हजारे भी एक दम सादा जीवन जीते हैं। वह अब भी महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में यादव बाबा मंदिर से सटे एक दो कमरे वाले मकान में ही रहते हैं ।
'जय हिन्द,जय हिन्दी'