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गुरुवार, 30 जून 2011

हिंदी भाषा :"अभिव्यक्ति के बदलते स्वरुप"



हमारे देश भारत की स्वतंत्रता के पूर्व हिन्दी भाषा की व्यापकता के कारण देश के स्वाधीनता सेनानियों ने स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान हिन्दी भाषा को ही संपर्क भाषा के रुप में महत्ता दी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद में, हिन्दी भाषा को इन्हीं गुणों के कारण भारतीय-संविधान के निर्माताओं ने भारतीय गणतंत्र संघ की राजभाषा का दर्जा दिया। हिन्दी सिनेमा, आकाशवाणी और दूरदर्शन के सहयोग से हिन्दी भाषा ने देश की सांस्कृतिक जनभाषा का दर्जा पाया। समय के बदलते स्वरुप के अंतर्गत उदारीकरण और वैश्वीकरण ने तो हिन्दी की आर्थिक महत्ता में जबर्दस्त परिवर्तन आया और हिन्दी विश्व की प्रमुख भाषा बनकर उभरी है । आज हिन्दी बिना किसी लाग-लपेट के आगे बढ़ रही है और इसी का परिणाम है कि हमारे सभी वर्गों के साहित्यकारों ने इसे अनिवार्य बनाने की हिमायत की है ।
हिन्दी भाषा को अनिवार्य बनाने से कई फायदे होंगे। पहला तो, हिन्दी; विश्व की प्राचीनतम भाषा एवं देश की अधिकांश भाषाओं की जननी संस्कृत की छोटी बहन मानी जाती है। दूसरा, हिन्दी उर्दू के काफी नजदीक है। और तीसरा सबसे महत्वपूर्ण है, हिन्दी अपनी संपर्क भाषा के गुणों एवं भाषायी स्वीकार्यता के चलते पूरे देश में व्यापक रुप से स्वीकृत हुई है ।

हमारे देश भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् के विभिन्न कालखंडों के दौर में राजभाषा हिन्दी भाषा ने कई उतार-चढ़ाव भरे सफर तय किए है। हिन्दी भाषा के स्वरुप में संपर्कभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा, अंतर्राष्ट्रीय भाषा आदि विभिन्न उपादानों से अंलकृत होकर काफी बदलाव आए है। स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली यह भाषा आज देश की राष्ट्रीय, सांस्कृतिक व राजनैतिक एकता को भी मजबूत कर रही है। अपनी संपर्क भाषा की भूमिका के कारण हिन्दी हमें स्थानीयता और जातीयता से परे लेकर जाती है। हिन्दी का यह भाषायी विस्तार भारतीय समाज में व्याप्त क्षेत्रीय, जातीय व भाषायी दूराग्रह को समाप्त करने में काफी मददगार सिद्ध हो रहा है। हिन्दी की इस भूमिका ने भारतीय जनमानस को राष्ट्रभाषा की कमी के अहसास से भी मुक्ति प्रदान की है। 
प्रसिद्द भाषा वैज्ञानिक फादर कामिल बुल्के के अनुसार हिंदी एक शक्तिशाली भाषा है। साहित्यिक समृद्धि, गौरवान्वित इतिहास और शराफत के कारण हिंदी एक समृद्ध भाषा है। प्रारम्भिक दौर से ही हिंदी लाचार, अशक्त एवं विवश भाषा नहीं रही है। हालाँकि इसकी शक्तिमतता शरारत के कारण नहीं है - बल्कि, भाषिक संतुलन शराफत के कारण। शब्द, वाक्य और अर्थ विन्यास, संग्रह, रचना, विधान के विभिन्न स्तरों पर हिंदी में कभी शठता नहीं आयी है, बल्कि समायानुसार वर्तमान से सामंजस्यपूर्ण होती चली गयी। साहित्य, व्याकरण और शब्दकोश निर्माण की लम्बी परम्परा रही है, जिसमें विदेशी विद्वानों की भी अहम भूमिका रही है। हिंदी का पहला व्याकरण १६९८ में हालैंड निवासी जॉन केटेलर ने हिन्दुस्तानी भाषा शीर्षक से डच में लिखा था। १७९६ में गिलक्राइस्ट ने हिन्दुस्तानी व्याकरण की रचना की। हिंदी की महत्ता के संज्ञान में २१ दिसम्बर,१७९८ ईस्वी से हिन्दुस्तानी का ज्ञान आवश्यक किया गया। वेलेजली ने ४ मई, १८०० ईस्वी को फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। शुरुआत होती है एक नयी परम्परा की । सन १८२३ ईस्वी में विलियम प्राइस ने हिन्दोस्तानी का व्याकरण लिखा। उन्होंने पुन: सन १८२८ में हिन्दोस्तानी का नया व्याकरण लिखा। आर्नो ने भी दो महत्त्वपूर्ण पुस्तकें लिखी:-
१. ऑन द ओरिजिन ऑफ स्ट्रक्चर ऑफ द हिन्दुस्तानी टंग, 
२. ए न्यू सेल्फ इस्टक्टिग ग्रामर ऑफ द हिन्दुस्तानी टंग। डंकन फोर्ब्स ने सन १८४५ ईस्वी में हिंदी शीर्षक से पहली किताब हिंदी मैनुअल लिखी ।
सन १९४८ ईस्वी में हिंदी – अंग्रेजी तथा अंग्रेजी-हिंदी कोश का भी प्रकाशन हुआ। फेरडरिक जान शोर (सन१७९९-१८३७) ने तो अंग्रेजी का विरोध करते हुए हिन्दुतानी के पक्ष मे वकालत भी की थी। भाषा-वैज्ञनिक पिन्कॉट ने हिंदी का प्रचार-प्रसार में प्रयत्नशील रहते हुए चार सौ पृष्ठों का मैनुअल भी संपादित किया ।कोई भी राष्ट्रीय भाषा राष्ट्रव्यापी संवेदना, आग्रह, प्रोत्साहन से जुड़ी होती है। बंगाल के राजा राममोहन राय और गुजरात के स्वामी दयानंद सरस्वती देश के पहले नेताओं की पंक्ति में थे जिन्होंने हिंदी भाषा को राष्ट्रव्यापी बनाने की वकालत की । याद रहे कि इंडियन नेशनल कांग्रेस के मंच से हिंदी में पहला भाषण अमृतसर में सन १९१९ ईस्वी में भूदेव मुखर्जी द्वारा दिया गया, जो गैर हिंदी भाषी थे। अर्थात, राष्ट्रीय हिंदी का सीधा और सपाट तालुकात, दरअसल उस हिंदी से है, जो भाषिक कड़वाहटों, उलाहनों, नोकझोंक और ईष्या-द्वेष को दरकिनार कर राष्ट्रीय लोकप्रियता, भावनाओं, संवेदनाओं, पहचान एवं आग्रह से जुड़ी है एवं तमाम विकल्पों को सहेजे हुए भारतीयता को सृजित करने में सबसे अग्रणी रही। हिन्दी कई बाधाओं-अवरोधों के बावजूद लोकतांत्रिक तरीके से स्वत: ही पूरे देश में फैल रही है। बोलना ही किसी भाषाको जीवित रखता हैं और फैलाता है। जैसे-जैसे हिन्दी भाषा की इस व्यापकता को स्वीकृति मिल रही है वैसे-वैसे उस पर देश की अन्य भाषाओं, बोलियों का प्रभाव भी स्पष्ट नजर आ रहा है। हिन्दी भाषा का फैलाव अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक हो गया है। सामान्यतया, यही माना जाता था कि हिन्दी की यह आंचलिकता बिहार की बोलियों, हरियाणवी तथा पंजाबी तक ही सीमित है। लेकिन, हिन्दी अपने भाषायी विस्तार के दौर में न केवल गुजराती, मराठी, बंगाली, उड़िया, तमिल, तेलगू आदि भाषाओं के संपर्क में आई है बल्कि इसकी पहुँच पूर्वोत्तर राज्यों की भाषाओं तक हो गई है। इसीलिए, आजकल पंजाबी से गृहित ‘मैंने जाना है या मैंने किया हुआ है’ का प्रयोग आंचलिकता नहीं माना जाता बल्कि इसे हिन्दी का भाषायी विस्तार माना जाता है। आंचलिकता के कारण हिन्दी के कई रुप प्रचलित हो गए है जिसे हम अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रुपों में देख सकते है। हिन्दी क्षेत्रों में भी एक ही चीज के लिए अलग-अलग शब्द प्रयोग किए जाते रहे है। जैसे, मध्यप्रदेश में शासकीय महाविद्यालय या यंत्री(इंजीनियर) का प्रयोग तथा बस रखने के स्थान को किसी राज्य में डिपो या किसी राज्य में आगार कहते है।
आज हिन्दी अपने राष्ट्रीय स्वरुप में दक्खिनी हिन्दी, हैदराबादी हिन्दी, अरुणाचली हिन्दी आदि में विस्तारित हो गई है। दक्षिण भारतीय हिन्दी के स्वरुप को हम भले ही मजाकिए अंदाज में हिन्दी सिनेमा में देखते है लेकिन इसे भी हिन्दी का विस्तार माना जाता है। स्पष्टतया, आज हिन्दी सार्वत्रिक रुप से संपूर्ण भारत की भाषा बन गई है। हिन्दी का यह अखिल भारतीय स्वरुप भारत के दक्षिण से उत्तर की ओर तथा भारत के पूर्व से पश्चिम की ओर आ रही है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में फैली हिन्दी का यह जबानी फैलाव एक दिन लिपि के स्तर पर भी होगा।
इस भाषायी विस्तार के कारण हिन्दी में केवल भारतीय भाषाओं के शब्द ही नही आए है बल्कि इसका फैलाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी आप्रवासियों की हिन्दी में देखा जा सकता हैं। मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम के अतिरिक्त जमैका, टोबैगो और गुयना जैसे भारतवंशी देश भी है। जहाँ की पचास फीसदी से ज्यादा आबादी तो कहीं पचास फीसदी से कम लोग मातृभाषा के रुप में हिन्दी का प्रयोग करते है। सूरीनाम की हिन्दी में ‘हमरी बात समझियो’ जैसा प्रयोग मानक हिन्दी माना जाता है। तो, मारीशस में ‘मैं बुटिक जा रहा हूँ (मैं दुकान जा रहा हूँ)’ जैसा प्रयोग सहज स्वाभाविक है। हिन्दी के बोलचाल के सैकड़ो शब्द मॉरीशस की भाषा क्रियोल में आ गये है। हिंदी संस्कृति से प्रभावित छोटे से देश फीजी की मुख्य भाषा भी फीजी बात(फीजी हिन्दी) है। जिसका प्रयोग वहां की संसद में भी होता है। लेकिन फीजी बात से परिचित कोई भी व्यक्ति यह जानता है कि वह किस प्रकार के आंचलिक प्रयोगों से युक्त हिन्दी है। इसके अतिरिक्त अमेरिका, कनाडा जैसे देशों में आप्रवासियों की बड़ी आबादी कुछ दूसरे प्रकार की हिन्दी बोलती है। यह भी आधुनिक हिन्दी का ही विस्तार है। अमेरिका तथा ब्रिटेन के हिन्दी रेडियो कार्यक्रमों में हिंदी भाष की ज्यादा गुणवत्ता नज़र आती है।
हिन्दी भाषा के बदलते स्वरुप को हम आधुनिक संचार माध्यमों के आधार पर भी देख सकते है। आधुनिक संचार माध्यमों
 ने भी हिन्दी के इस नए रुप को गढ़ने में पर्याप्त सहयोग किया है। कारण कि भाषाएं संस्कृति की वाहक होती है और इन दिनों आधुनिक संचार माध्यमों पर प्रसारित हो रहे कार्यक्रमों से समाज के बदलते सच को हिन्दी के आधार पर ही सम्मानित किया जा रहा है। इन कार्यक्रमों की लोकप्रियता से भी हिन्दी भाषा की बढ़ती स्वीकार्यता का अंदाजा लगा सकते है। हिन्दी संचार माध्यमों भी दिनों-दिन प्रगति की ओर बढ़ रही है। देश के संचार माध्यम उद्योग का भी एक बड़ा हिस्सा हिन्दी संचार माध्यम उद्योग का है।
वर्तमान समय में हिंदी भाषा कई कारणों से लोगों का ध्यान विशेष रूप से आकृष्ट कर रही है। प्रस्तुत उदाहरण शायद आपको स्वीकारोक्ति के लिए विवश करे । इस बार न्यूयार्क के मेयर ने अमेरिका में रहने वाले भारतीयों को दीपावली और नववर्ष पर हिंदी भाषा में अभिवादन किया। अमेरिका के राष्ट्रपति द्वारा व्हाइट हाउस में 
दीपावली समारोह का आयोजन एवं संस्कृत के श्लोक का पाठ एवं भारतीय संसद में नमस्ते के माध्यम से अभिवादन करना हिंदी के लुभावनी होने का भरपूर संकेत देता है। पृष्ठभूमि चाहे जो भी हो, परन्तु इतना तो स्पष्ट है कि हिंदी लुभावनी बन रही है ।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि हिन्दी भाषा के इस विराट स्वरुप को तकनीकी व व्याकरणिक स्वीकृति कैसे मिले ? हिन्दी भाषा का यह स्वरुप अपने-अपने क्षेत्रीय संदर्भ में हिन्दी को आत्मीय बनाता है। जिसके कारण हिन्दी का प्रयोगकर्त्ता एक खास तरह का भाषिक अपनापन अनुभव करता है। लेकिन, हिन्दी का यह स्वरुप हिन्दी को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेकानेक बोलियों में बदल रही है। यह तथ्य कई शुद्धतावादियों को आपत्तिजनक भी लगती है।
हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा के विद्वान डॉ.रामविलास शर्मा के अनुसार “ बोलियां ही हिन्दी की सबसे बड़ी शक्ति है। एक हिन्दी वह है जो अपने मानक रुप में अपनी सरलता और नियमबद्धता के कारण राष्ट्रीय और क्षेत्रीय से लेकर अंतर्राष्ट्रीय भाषा तक है। दूसरी हिन्दी वह है जो आंचलिक और क्षेत्रीय प्रकार की है। यह हिन्दी मानक हिन्दी के लिए शब्दों और प्रयोगों का अक्षय भंडार है। मानक हिन्दी का वहीं अंश गृहीत होता है जो इसके राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बोधगम्य होने में बाधक नहीं है। नमनीयता और अनुशासनबद्धता ऐसे परस्पर विरोधी ध्रुव है जिनके बीच दुनियाभर के बीच बड़ी भाषाएं काम करती है। हिन्दी का सच भी यही है। “

इक्कीसवीं सदी एक अजीबो-गरीब किस्म की भाषिक कौतूहल के दौर से गुजर रही है, जिसमें भाषिक संवेदना, कड़वाहट, कलह, विभाजन, तिरस्कार और दबाव से कहीं अधिक भाषिक उत्तेजना, न्यौता, साझेदारी, जश्न, पुकार और समझदारी है। संभव है कि भाषायी दृष्टि से इक्कीसवीं सदी इतिहास के पन्नों में सबसे अव्वल किस्म की सदी के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराए। ऐसी संभावना इसलिए बन रही है, कि पश्चिम आज आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक चुनौतियों से घिरा है और गैर-पश्चिम एक विकल्प के रूप में उभर रहा है। खुशखबरी इस बात की है कि पहले की तरह दोनों के बीच आज उतनी कड़वाहट नहीं है, अपितु भाषाई रिश्तों में साझेदारी की नयी ललक दिखती है। हालाँकि, इन चुनौतियों और विकल्पों के प्रभावों का सही आकलन करना अभी संभव नहीं है, परन्तु इतना स्पष्ट है कि दोनों के बीच की पारस्परिकता समय की माँग है। ऐसे वातावरण में हिंदी भाषा के व्यापक लोक-व्यवस्था की संकल्पना समयोचित है और इससे भाषाविज्ञान की सैद्धान्तिक समृद्धि बढ़ेगी। हालाँकि, उक्त व्यवस्था का अभ्युदय उभरते गैर-पश्चिमी राष्ट्रों के लिए एक बड़ी खुशखबरी है। अत: हिंदी भाषा लोक-व्यवस्था के अभ्युदय की संकल्पना इक्कीसवीं सदी में असहज नहीं जान पड़ती है।
अत: यह अत्यावश्यक है कि हिन्दी के इस नए स्वरुप को मानकीकृत किया जाए। भारतीय सरकार को भी चाहिए कि वह सभी प्रमुख भाषाविदों से विचार-विमर्श करके हिन्दी का एक ऐसा मानक शब्दकोश तैयार करें जिसमें वर्तमान में प्रयोग किए जा रहे सभी शब्दों का समावेश हो तथा इस शब्दकोश में आम बोलचाल में स्वीकृत दूसरी भाषा के शब्दों को आसानी से जगह मिले। जिस प्रकार अंग्रेजी भाषा अपनी लोचता के कारण अंतर्राष्ट्रीय भाषा बन गई है तथा प्रत्येक वर्ष ऑक्सफोर्ड शब्दकोष में अंग्रेजी भाषा में स्वीकार्य शब्दों को अपनी शब्दावली में आसानी से जगह देता है ; उसी प्रकार हिन्दी शब्दकोष में भी दूसरी भाषा के शब्दों को आसानी से जगह मिले। तभी, हिन्दी को ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता मिलेगी। साथ ही हिन्दी की इस स्वीकार्यता से हमारी भाषायी अस्मिता को भी सम्मान मिलेगा और हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाने का हमारा दावा मज़बूत होगा ।
भारत में 'देश की भाषा की समस्‍या' जनता जनित नहीं है अपितु यह जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों द्वारा जनित है। स्वतंत्र भारत के जनप्रतिनि‍धियों ने सन १९४७ में ही यह स्‍वीकार कर लिया था कि देश में एक संपर्क भाषा हो और वह भारत की ही भाषा हो और कोई विदेशी भाषा न हो। भारतीय संवि‍धान लागू होने के बाद पंद्रह साल का समय भाषा परिवर्तन के लिए रखा गया था और वह समय केवल केंद्र सरकार की भाषा के लिए ही नहीं बल्कि भारत संघ के सभी राज्‍यों के लिए भी रखा गया था कि उस दौरान सभी राज्‍य सरकारें अपने-अपने राज्‍यों में अपनी राजभाषा निर्धारित कर लेंगी एवं उन्‍हें ऐसी सशक्‍त बना लेंगी कि उनके माध्‍यम से समस्‍त सरकारी काम काज किए जाएंगे तथा राज्‍य में स्थित शिक्षा संस्‍थाएं उनके माध्‍यम से ही शिक्षा देंगी। यह निर्णय सन १९४९ में ही किया गया था | राज्‍यों ने अपनी-अपनी राजभाषा नीति घोषित कर दी थी। यद्यपि वहां भी पूरी मुस्‍तैदी से काम नहीं हुआ क्‍योंकि राज्‍यों के सामने शिक्षा से ज़्यादा महत्वपूर्ण अन्‍य आवश्‍यक समस्‍याएं थीं जिनपर अविलंब ध्‍यान देना था। उस चक्‍कर में राज्‍य सरकारों ने राजभाषाओं की समस्‍या को टाल दिया था परंतु किसी भी सरकार ने अंग्रेज़ी को राजभाषा के रूप में अनंत काल तक बनाए रखने की मंशा नहीं व्‍यक्‍त की। अतः राज्यों ने अपनी सामर्थ्‍य के अनुसार अपनी राजभाषाओं को प्रचलित करने के लिए अपने यहां भाषा विभागों की स्‍थापना की और कार्यालयी भाषा की शिक्षा देना प्रारंभ किया, भाषा प्रयोग की समीक्षा करने लगे तथा प्रशासनिक शब्‍दावली बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ की। राज्‍य सरकारों ने उसी निर्धारित समय में अपनी भाषाओं को संवर्धित किया और आज नागालैंड के सिवाय सभी राज्‍यों ने अपनी राज्‍य भाषाओं में काम करना प्रारंभ कर दिया है। ऐसे में यह और भी  आवश्‍यक हो गया है कि देश में राज्‍यों के बीच संपर्क भाषा के रूप में हिंदी को स्‍थापित किया जाए।अनेक समितियां और आयोग बने परंतु किसी ने भी हिंदी के प्रश्न को समय सीमा से परे रखने की सिफ़ारि‍श नहीं की है। राजभाषा आयोग, विश्‍व विद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड,सभी ने हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं में ही शिक्षा दीक्षा देने की सिफ़ारिश की है। तब संविधान में हिंदी को अनिश्चित काल के लिए टालने की बात कहां से आई? यह निश्चित रूप से कोई सोची समझी चाल तथा प्रच्‍छन्‍न विद्वेष की भावना लगती है। इसे समझने और ग्रासरूट स्तर पर चेतना जागृत करने की आवश्‍यकता है। 
हिंदी को वास्‍तविक रूप में कामकाज की भाषा बनाना हो तो देश में त्रिभाषा सूत्र सच्‍चे मन से तथा कड़ाई से लागू करना होगा। त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्‍वयन की कठिनाइयों पर शिक्षा आयोग (सन १९६४-१९६६) ने विस्‍तार से विचार किया है। व्‍यावहारिक रूप से त्रिभाषा सूत्र के कार्यान्‍वयन की कठिनाइयों में मुख्य है स्‍कूल पाठ्यक्रम में भाषा में भारी बोझ का सामान्‍य विरोध, हिंदी क्षेत्रों में अतिरिक्‍त आधुनिक भारतीय भाषा के अध्‍ययन के लिए अभिप्रेरण (मोटिवेशन) का अभाव, कुछ हिंदीतर भाषी क्षेत्रों में हिंदी के अध्‍ययन का विरोध तथा पांच से छह साल तक, कक्षा छठी से दसवीं तक दूसरी और तीसरी भाषा के लिए होने वाला भारी खर्च और प्रयत्न। शिक्षा आयोग ने कार्यान्‍वयन की कठिनाइयों का उल्‍लेख करते हुए कहा है कि गलत योजना बनाने और आधे दिल से सूत्र को कार्यान्वित करने से स्थिति और बिगड़ गई है। अब वह समय आ गया है कि सारी स्थिति पर पुनर्विचार कर स्‍कूल स्‍तर पर भाषाओं के अध्‍ययन के संबंध में नई नीति निर्धारित की जाए। अंग्रेज़ी को अनिश्चित काल तक, भारत की सहचरी राजभाषा के रूप में स्‍वीकार किए जाने के कारण यह बात और भी आवश्‍यक हो गई है।
अतः ऐसी परिस्थिति में कार्यालयों में हिंदी को प्रचलित करने तथा स्‍टाफ़ सदस्‍यों को सक्षम बनाने के लिए सतत और सत्‍यनिष्‍ठा के साथ शिक्षण प्रशिक्षण का हर संभव प्रयास करना होगा एवं हिंदी की सेवा से जुड़े हर व्‍यक्ति को अपने अहम् को दूर रखकर प्रयास करना होगा। गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की यह चार पंक्‍ति‍यां इस सन्दर्भ में उल्‍लेखनीय हैं –
"सांध्‍य रवि बोला कि लेगा काम अब यह कौन,
सुन निरुत्‍तर छबि लिखित सा रह गया जग मौन,
मृत्तिका दीप बोला तब झुकाकर माथ,
शक्ति मुझमें है जहां तक मैं करूंगा नाथ।।"
आज की भाषिक चुनौतियाँ पहले की तरह नहीं हैं। तमाम उम्मीदों, आकाक्षों और कामनाओं के बावजूद, हिंदी भाषिक चुनौतियों से वंचित नहीं है। इक्कीसवीं सदी में समन्वित भाषा की आवश्यकता बढ़ी है। हिंदी को इन मानदण्डों पर खरा उतरना होगा। भाषिक मनोवृति में बदलाव लाने की एवं हिंदी को समन्वित दिशा की ओर अग्रसित करने की जरूरत है । 
हमारे समक्ष अब यह प्रश्न हैं -
(१.) क्या हमारे हिंदी शुभचिन्तक पारम्परिक सोच में परिवर्तन लाने में सक्षम हैं ? 
(२.) क्या भारतीय भाषावैज्ञानिकों में भाषिक यथार्थ की बुनियादी मान्यताओं की समझ में बढोतरी हो रही है? 
(३.) क्या हिंदी भाषा की व्यापक लोकव्यस्था वर्तमान का ही भाषिक यथार्थ मात्र है ? आखिर, युवा वर्ग नयी सम्भावनाओं की तलाश कहाँ और कैसे करे ?

सोमवार, 23 मई 2011

**इमरोज़-अमृता का सशक्त रूहानी-रिश्ता**

आज तक हमने आम समझ से बस यही जाना है कि इमरोज़ अमृता प्रीतम को प्यार करते थे ..... प्यार ! लेकिन कैसा प्यार....??? यह समझ पाने में असमर्थ रहे....
यह रिश्ता जिस्म से जिस्म का नहीं, रूह से रूह का है ! आम सोच, सतही ख्यालों से बहुत ऊपर.........



"अमृता जब भी खुश होती-
मेरी छोटी-छोटी बातों पर
तो वो कहती-
वे रब तेरा भला करे।
और मैं जवाब में कहता हूँ-
मेरा भला तो
कर भी दिया रब ने
तेरी सूरत में
आकर..."





एक ज़िन्दगी ख़त्म होते हम उसे अतीत बना देते हैं , इमरोज़ अपने सशक्त रूहानी-काव्य के माध्यम से अमृता प्रीतम को लेकर आज भी आज में जीते हैं, बिल्कुल अपने नाम की तरह !
जिस इन्सान ने रूह के रिश्तों को नहीं सीखा, वह नज़्मों की सौगात भला क्या पायेगा ! ज़ब भी इमरोज़ का मन अशांत हुआ तो मन और रिश्तों के बीच आ गई, पर यह रिश्तों का संसार इमरोज़ का है , जहाँ उनकी कलम बोलती है-
"ज़िंदगी खेलती है
पर हमउम्रों से...
कविता खेलती है
बराबर के शब्दों से, ख़यालों से
पर अर्थ खेल नहीं बनते
ज़िंदगी बन जाते हैं...
रात-दिन रिश्ते भी खेलते हैं
सिर्फ़ मनचाहों से
उम्रें कोई भी हों
ज़िंदगी में मनचाहे रिश्ते
अपने आप हमउम्र हो जाते हैं..."
अमृता-साहिर-इमरोज के कई किस्से-कहानियाँ हवाओं में खुशबू की तरह बिखरे हैं। वे गाहे-बगाहे सुंदर-कोमल फूलों की तरह लोगों की स्मृतियों में खिलते रहते हैं। एक बार किसी ने इमरोज़ से पूछा कि आप जानते थे कि अमृताजी साहिर से दिली लगाव रखती हैं और फ़िर साजिद पर भी स्नेह रखती हैं आपको यह कैसा लगता है ?
इस पर इमरोज़ जोर से हँसे और बोले कि "एक बार अमृता ने मुझसे कहा था कि अगर वे साहिर को पा लेतीं तो मैं उनको नही मिलता तो मैंने उनको जवाब दिया था कि तुम तो मुझे जरूर मिलतीं चाहे मुझे तुम्हें साहिर के घर से निकालकर लाना पड़ता, जब हम किसी को प्यार करते हैं तो रास्ते की मुश्किल को नहीं गिनते। मुझे मालूम था कि अमृता साहिर को कितना चाहती थीं लेकिन मुझे यह भी बखूबी मालूम था कि मैं अमृता को कितना चाहता था !"

इमरोज़ ने अपने एक लेख 'मुझे फिर मिलेगी अमृता' में अपने 'रूहानी-रिश्ते' की मजबूती का परिचय देते हुए कुछ यूं लिखा है---
कोई भी रिश्ता बाँधने से नहीं बँधता। प्रेम का मतलब होता है एक-दूसरे को पूरी तरह जानना, एक-दूसरे के जज़्बात की कद्र करना और एक-दूसरे के लिए फ़ना होने का जज़्बा रखना। अमृता और मेरे बीच यही रिश्ता रहा। पूरे 41 बरस तक हम साथ-साथ रहे। इस दौरान हमारे बीच कभी किसी तरह की कोई तकरार नहीं हुई। यहाँ तक कि किसी बात को लेकर हम कभी एक-दूसरे से नाराज़ भी नहीं हुए।इसके पीछे एक ही वजह रही कि वह भी अपने आप में हर तरह से आज़ाद रही और मैं भी हर स्तर पर आज़ाद रहा। चूँकि हम दोनों कभी पति-पत्नी की तरह नहीं रहे, बल्कि दोस्त की तरह रहे, इसलिए हमारे बीच कभी किसी किस्म के इगो का खामोश टकराव भी नहीं हुआ। न तो मैं उसका मालिक था और न ही वह मेरी मालिक। वह अपना कमाती थीऔर अपनी मर्ज़ी से खर्च करती थीं। मैं भी अपना कमाता था और अपनी मर्ज़ी से खर्च करता था।
दरअसल, दोस्ती या प्रेम एक अहसास का नाम है। यह अहसास मुझमें और अमृता, दोनों में था, इसलिए हमारे बीच कभी यह लफ्ज़ भी नहीं आया कि आय लव यू। न तो मैंने कभी अमृता से कहा कि मैं तुम्हें प्यार करता हूँ और न ही अमृता ने कभी मुझसे। एक बार एक सज्जन हमारे घर आए। वे हाथ की रेखाएँ देखकर भविष्य बताते थे। उन्होंने मेरा हाथ देखा और कहा कि तुम्हारे पास पैसा कभी नहीं टिकेगा क्योंकि तुम्हारे हाथ की रेखाएँ जगह-जगह टूटी-कटी हैं। उसने अमृता का हाथ देखकर कहा कि तुमको ज़िंदगी में कभी पैसे की कमी नहीं रहेगी। इस पर मैंने अमृता से उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा कि ऐसा है, तो हम दोनों एक ही हाथ की रेखा से ही गुज़ारा कर लेंगे। हम दोनों हमेशा दोस्त की तरह रहे।
एक ही घर में, एक ही छत के नीचे रहे, फिर भी कभी एक कमरे में नहीं सोए क्योंकि मेरा और उसका काम करने का वक्त हमेशा अलग रहता था। मैं रात बारह-एक बजे तक काम करता और फिर सो जाता था। जबकि अमृता, बीमार पड़ने और बिस्तर पकड़ने के पहले तक, रात को आठ-नौ बजे तक सो जाती थी और देर रात एक-डेढ़ बजे उठकर अपना लिखने का काम शुरू करती थी, जो सुबह तक चलता रहता था।
हम दोनों ने जब साथ रहना शुरू किया, तब अमृता दो बच्चों की माँ बन चुकी थीं। हालाँकि, शुरुआती दौर में बच्चों ने हमारे साथ-साथ रहने को कबूल नहीं किया। लेकिन उन्हें एतराज़ करने की गुंजाइश भी नहीं मिली। क्योंकि न तो उन्होंने कभी हमें लड़ते-झगड़ते देखा था और न ही हमारे बीच कभी किसी किस्म का टकराव या मनमुटाव पनपते हुए महसूस किया था। धीरे-धीरे उन्होंने भी हमारा साथ रहना कबूल कर लिया।
अमृता के जीवन में एक छोटे अरसे के लिए साहिर लुधियानवी भी आए, लेकिन वह एक तरफ़ा मुहब्बत का मामला था। अमृता साहिर को चाहती थी, लेकिन साहिर फक्कड़ मिज़ाज था। अगर साहिर चाहता, तो अमृता उसे ही मिलती, लेकिन साहिर ने कभी इस बारे में संजीदगी दिखाई ही नहीं। एक बार अमृता ने हँस कर मुझसे कहा था कि अगर मुझे साहिर मिल जाता, तो फिर तू न मिल पाता।
इस पर मैंने कहा था कि मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज़ अदा करते हुए ढूँढ़ लेता। मैंने और अमृता ने 41 बरस तक साथ रहते हुए एक-दूसरे की प्रेजेंस एंजॉय की। हम दोनों ने खूबसूरत ज़िंदगी जी। दोनों में किसी को किसी से कोई शिकवा-शिकायत नहीं रहीं। मेरा तो कभी ईश्वर या पुनर्जन्म में भरोसा नहीं रहा, लेकिन अमृता का खूब रहा है और उसने मेरे लिए लिखी अपनी आख़िरी कविता में कहा है, मैं तुम्हें फिर मिलूँगी। अमृता की बात पर तो मैं भरोसा कर ही सकता हूँ।

अमृता के लिए इमरोज़ की कविता--
"अब ये घोसला घर चालीस साल का हो चुका है
तुम भी अब उड़ने की तैयारी में हो,
इस घोसला घर का तिनका-तिनका,
जैसे तुम्हारे आने पर सदा,
तुम्हारा स्वागत करता था,
वैसे ही इस उड़ान को,
इस जाने को भी,
इस घर का तिनका-तिनका
तुम्हें अलविदा कहेगा।"
— इमरोज

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

'संस्कृत है हिन्दी की जननी'


मेरे परमप्रिय स्नेही मित्रों प्रस्तुत आलेख में मैंने अपनी सन १९७७ इसवी में प्रकाशित पुस्तक "हिंदी का इतिहास' से कुछ प्रसंग लिए हैं, यह बताना भी ज़रूरी है कि इस आलेख को यहाँ रचित करने के लिए मेरे प्रिय मित्र श्री.लोवी भारद्वाज द्वारा प्राप्त हुयी है,उनके प्रति विनम्र आभार.....! संभवत: आप में कई मित्र मुझसे सहमत नहीं हों, उनसे यही कहूँगा कि मेरी अल्पबुद्धि ने जितना मुझे विश्लेषण का अवसर प्रदान किया, उतना ही मैं आपके समक्ष रखने में समर्थ हो सका !
संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है, ऐसा कथन डॉ. फादर कामिल बुल्के का है जो संस्कृत और हिन्दी की श्रेष्ठता को बताने के लिए सम्पूर्ण है। मगर आज हमारे देश मे देवभाषा और राष्ट्रभाषा की दिनो दिन दुर्गती होती जा रही है। या यूं कह ले की आज के समय मे मां और गृहिणी पर नौकरानी का प्रभाव बढता चला जा रहा है तो गलत नही होगा !
संस्कृत विश्व की सभी भाषाओं की जननी है। आज विश्व में 35 हजार भाषा परिवार हैं। उनमें नियंत्रण रखने वाला संस्कृत वाग्मय है।हम सब यह जानते हैं कि कोई भी भाषा एक आदमी द्वारा बनाई नहीं जा सकती। भाषा का निर्माण या विकास धीरे-धीरे समाज में आपस में बोलचाल से होता है। समय के साथ-साथ भाषा बदलती रहती है, इसलिए एक भाषा से दूसरी भाषा बन जाती है।
हिन्दी भाषा का उद्भव एवं विकास में उसकी पूर्ववर्ती भाषाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान है।जब भारत ‘जगद्गुरु’ की संज्ञा से अभिहित था, इस समय वैदिक संस्कृत बोली जाती थी। जो आदिकाल से ईसा पूर्व पाँचवीं शती तक प्रयुक्त होती रही। समय के साथ वैदिक संस्कृति ही संशोधन प्राप्त कर (व्याकरण के नियमों से सँवर कर) संस्कृत बनी और 500 ई. पूर्व से 100 ई. तक चलती रही।संस्कृत के बाद पहली प्राकृत या पाली आ गई। यह गौतमबुद्ध के समय बोली जाती थी, जो 500 ई. पूर्व से 100 ई. तक रही।
इसके बाद दूसरी प्राकृत आ गई। जो पाँच नामों से जानी जाती थी-
(1) महाराष्ट्री; (2) शौरसेनी; (3) मागधी; (4) अर्द्धमागधी; (5) पैशाची।
इनका प्रचलन 100 ई. से 500 ई. तक रहा।इसी दूसरी प्राकृत से नई भाषा पनपी जिसे ‘अपभ्रंश’ कहा जाता है। जिसके तीन रूप थे-
(1) नागर; (2) ब्राचड़; (3) उपनागर।
इस अपभ्रंश से कई भाषाएँ विकसित हुईं। जैसे-हिन्दी, बांग्ला, गुजराती, मराठी, पंजाबी आदि।
यदि हम गुजराती, मराठी आदि भाषाओं को एक-दूसरे की बहन कह दें तो अनुचित न होगा क्योंकि ‘अपभ्रंश’ इनकी जननी है।जिस प्रकार भारत में कई प्रांत के कई जिले हैं, उसी प्रकार हिन्दी भाषा में कई उपभाषाएँ हैं।इनमें ब्रजभाषा, अवधी, डिंगल या राजस्थानी, बुंदेलखण्डी, खड़ी बोली, मैथिली भाषा आदि का नाम उल्लेखनीय है।
इन सभी भाषाओं के साहित्य को हिन्दी का साहित्य माना जाता है क्योंकि ये भाषाएँ हिन्दी साहित्य के इतिहास में ‘अपभ्रंश’ काल से उन समस्त रचनाओं का अध्ययन किया जाता है उपर्युक्त उपभाषाओं में से भी लिखी हो ! समाज में उभरने वाली हर सामाजिक, राजनीतिक, साम्प्रदायिक, धार्मिक, सांस्कृतिक स्थितियों का प्रभाव साहित्य पर पड़ता है। जनता की भावनाएँ बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं। इसलिए साहित्य सामाजिक जीवन का दर्पण कहा गया है। इस प्रकार यह बात उभर कर आती है कि साहित्य का इतिहास मात्र आँकड़े या नामवली नहीं होती अपितु उसमें जीवन के विकास-क्रम का अध्ययन होता है। मानव-सभ्यता-संस्कृति और उसके क्रमिक विकास को जानने का मुख्य साधन साहित्य ही होता है। साहित्य समाज का दर्पण होता है, इसलिए उसमें मानव-मन के चिन्तन-मनन, भावना और उसके विकास का रूप प्रतिबिम्बित रहता है। अत: किसी भी भाषा के साहित्य का अध्ययन करने और उसके प्रेरणास्रोत्रों को जानने के लिए उसकी पूर्व-परम्पराओं और प्रवृत्तियों का ज्ञान आवश्यक है।हिन्दी भाषा के उद्भव-विकास में उसकी पूर्ववर्ती भाषाओं का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
वैदिक संस्कृत:-
जिस समय हमारा देश जगद्गुरु की संज्ञा से अभिहित था, वैदिक संस्कृत ही भारतीय आर्यों के विचारों की अभिव्यक्ति करती थी। प्राय: यह आदि काल से ईसा पूर्व पाँचवीं शती तक प्रयोग में लायी जाती रही।संस्कृत- वैदिक संस्कृत ही समय के साथ संस्कार एवं संशोधन प्राप्त कर, व्याकरण के नियमों से सुसज्जित होकर संस्कृत भाषा बन गई। ईसा से लगभग छ: शताब्दी पूर्व महर्षि पाणिनी की ‘अष्टाध्यायी’ के निर्माण के साथ ही     संस्कृत में एकरूपता आ गई। यह भाषा 500 ई. पूर्व से 1000 ई. तक चलती रही।पहली प्राकृत या पाली-संस्कृति साहित्य में व्याकरण के प्रवेश ने जहाँ एक ओर उसे परिमार्जित कर शिक्षितों की व्यवहारिक भाषा के पद पर प्रतिष्ठित किया वहाँ दूसरी ओर उसे जनसाधारण की पहुँच के बाहर कर दिया। ऐसे समय में लोक भाषा के रूप में मागधी पनप रही थी, जिसका व्यवहार बौद्ध लोग अपने सिद्धान्त के प्रचारार्थ कर रहे थे। इसी को पोली कहकर संबोधित किया गया।
अशोक के शिलालेखों पर ब्राह्मी और खरोष्ठी नामक दो लिपियाँ मिलती हैं। इसी को कतिपय भाषा वैज्ञानिक पहली प्राकृत कहकर पुकारते हैं इस भाषा का काल 500 ई. पूर्व से 100 ई. पूर्व तक निश्चित किया है।
दूसरी प्राकृत-पहली प्राकृत साहित्यकारों के सम्पर्क में आते ही दूसरी प्राकृत बन बैठी और उसका प्रचलन होने लगा। विभिन्न अंचलों में वह भिन्न-भिन्न नामों से पुकारी गई। इस प्रकार इसके पाँच भेद हुए-
(1.)महाराष्ट्री-मराठी
(2.)शौरसेनी-पश्चिमी हिन्दी, राजस्थानी, पहाड़ी, गुजराती
(3.)मागधी-बिहारी, मागधी, उड़िया, असमिया
(4.)अर्द्ध मागधी-पूर्वी हिन्दी
(5.)पैशाची-लहंदा, पंजाबी
इस प्रकार क्रमश: लोकवाणी, प्रचलित बोलियों एवं साहित्यिक भाषा के विकास क्रम ने प्राचीन हिन्दी को जन्म दिया जो खड़ी बोली हिन्दी की जननी है। यही ‘प्राचीन हिन्दी’ या ‘हिन्दवी’ अपभ्रंश और आधुनिक खड़ी बोली के मिलनरेखा के मध्य-बिन्दु को निर्धारित करती है। हिन्दी-साहित्य में इतिहास लिखना कब और कैसे प्रारम्भ हुआ, यह विचारणीय प्रसंग है। इतिहास लिखने वालों की दृष्टि अपने आप चौरासी वैष्णव की वार्ता और भक्तकाल की ओर खिंच जाती है परन्तु तथ्यों और खोजबीन से यह पता चलता है कि इसका श्रीगणेश पाश्चात्य साहित्य के प्रभाव से ठाकुर शिवसिंह सेंगर (सन् 1883 ई.) द्वारा लिखित ‘कवियों के एक वृत्त संग्रह’ के द्वारा हुआ।संस्कृत आज विज्ञान की भाषा बन गई है। वैज्ञानिक इस पर कई रिसर्च कर रहे हैं ।
हिंदी और उर्दू दो अलग भाषायें हैं पर बोली होने की वजह से एक जैसी लगती हैं। यह भाषायें इस तरह आपस में मिली हुईं है कि कोई उर्दू बोलता है तो लगता है कि हिंदी बोल रहा है और उसी तरह हिंदीबोलने वाला उर्दू बोलता नजर आता है। दोनों के बीच शब्दों का विनिमय हुआ है और हिंदी में उर्दू शब्दों के प्रयोग करते वक्त नुक्ता लगाने पर विवाद भी चलता रहा है। बोली की साम्यता के बावजूद दोनोंकी प्रवृत्ति अलग अलग है।
संस्कृत भाषा का क्षेत्र व्यापक है। सभी क्षेत्रों में विस्तृत जानकारी मिलती है। संस्कृत भाषा के शब्द कोष में हर समस्या का समाधान है। ऐसा शब्द कोष किसी भी भाषा का नहीं है। इससे नित्य नए शब्द बनाए जा सकते है। संस्कृत भूत, भविष्य और वर्तमान काल में भी समाप्त नहीं हो सकती। पाश्चातय सभ्यता के कारण इसके उपयोग में कमी आई है। जनसाधारण के बोलचाल में उपयोग नहीं आने के कारण बोलने में कुछ कठिनाई आती है। जबकि संस्कृत भाषा सरल, सुबोध, सुग्मय है। इसे रुचिकर बोलने का प्रयास करें, तो आदमी बोलने में सफल हो सकता है। संस्कृत भाषा आदिभाषा है और सब भाषाओं की जननी है। संस्कृत भाषा नष्ट नहीं हो सकती। कुछ लोग कहते हं संस्कृत मृतभाषा है, लेकिन यह अमर भाषा है ।
आज के समय मे नयी पीढी तो ये कहने मे जरा भी गुरेज नही करती की मेरी हिन्दी अच्छी नही है अत: मै अंग्रेजी मे ही बात करने या कहने को प्राथमिकता दूंगा। महात्मा गाँधी ने कहा थाकी अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है। मगर आज जितना प्रयास हिन्दी को बचाने के लिए किया जा रहा है, उससे कही ज्यादा जोर अंग्रेजी को बढाने के लिए हो रहा है । तो क्या अब ये मान लिया जाए की बिना अंग्रेजी बोले हम पूर्ण भारतीये नही कहे जा सकते ?ये बात अंग्रेजी का विरोध करने के लिए नही कह रहा हूं, बल्कि मेरी ये बात तो हिन्दी के उपर अंग्रेजी को प्राथमिकता देने पर केन्द्रीत है । आज हिन्दी बोलने वाले को निकृष्ट और अंग्रेजी बोलने वाले को उत्कृष्ट समझे जाने पर है । आज हमारा देश बदल तो बहुत गया है मगर इस बदलाव ने हमारी मूल पहचान को भी बदल कर रख दिया है । जो देश मानव-भाषा की जननी कही जाती है, आज उसी देश की भाषा को लिखने और बोलने मे, उसी देश के लोग अगर परहेज करने लगे तो फिर इससे बडा सांस्कारिक पतन और क्या कहा जा सकता है ! आज अगर आप प्रवाहिक अंग्रेजी या फिर कामचलाऊ अंग्रेजी भी बोल सकते है तो आप नि:संदेह किसी अच्छे जगह पर नौकरी पाने के ज्यादा हकदार बन जाते है, उन लोगो के बनिस्पत जो बहुत अच्छी हिन्दी लिख और बोल दोनो सकते है ।
सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिन्दी महानतम स्थान रखती है। आज उस महान हिन्दी रूपी बिन्दी को सर से उतारने पर तुले हम भारतीयों को एक बार रूक कर ये देखना पडेगा कि हमारा ये कृत्य हमारी आने वाले पीढी को क्या देकर जाएगा । कही ऐसा ना हो की आने वाली पीढी अपनी राष्ट्र भाषाई निर्धनता के लिए हमे कभी माफ ना करे । अनेकता मे एकता का मंत्र को प्रतिपादित करने और हमारे देश को एकजुट बनाए रखने मे राष्ट्रभाषा से बडा योगदान न पहले किसी का थाऔर न आगे किसी का होगा ।
अत: अपनी राष्ट्रभाषा पर हमे गर्व होना चाहिए । इसे अपनाने और हर जगह प्रयोग मे लाने से ही हम अपनी महान सांस्कृतिक विरासत को बचा सकते है ।
देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को पहले भी अपनाया गया था और भविष्य मे भी इसे बरकरार रखने की आवश्यक्ता है । जो भाषा जन्म से ही अपने पैरों पर खडी मानी गई है जरुरत है उसे अपने साथ लेकर चलने की क्यूंकी इसी से हम अपने चिर काल से विकसित संस्कारों की छ्टा पूरी दुनिया मे बिखेर सकते है।
"हिन्दी का गौरव शाली पक्ष":--
राष्ट्रभाषा के रूप में हुई थी यहां, स्थापित हिन्दी निष्पक्ष।
संस्कृत है इसकी जननी, संस्कार पाणिनी के हैं।
रामायण, वेदों से जुड़ते शब्द, इसी में मिलते हैं।
सूर, तुलसी, कबीर, रहीम इसमें सभी समाए हैं।
मीरा,रसखान आदि ने, इसके गुण गाए हैं।
मैथिली, सुमित्रा, दिनकर ने, इस भाषा को तराशा।
प्रेमचंद, सुभद्रा, महादेवी ने, इस भाषा को नक्काशा।
रस,छ्न्द,अलंकार हैं, इसमें पिरोए हुए।
अस्मिता और गरिमा को, स्वयं में संजोए हुए।
आती है हर बरस, बधाई हमें देते हुए।
भारत माता का आंचल दूध में भिगोते हुए।
हिन्दी ने हर भाषा को, प्रेम से अपनाया है।
जग में अपना स्थान, स्वयं कमाया है।
इसकी महिमा का हम, कितना बखान करें।
आओ एक साथ मिलकर, हिन्दी में ज्ञान दान करें।
हिन्दी हमेशा उन्नत रहे फले फूले और हिन्दुस्तानियों के सर पर बिन्दी बन चमकती रहे की आशा के साथ............
सादर,
आपका स्नेहाकांक्षी.
--डॉ.मनोज चतुर्वेदी
“जय हिंद ,जय हिंदी”


               “मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती । 
                    भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती ”

'आपसी सौहार्द के हिमायती रसखान'


"प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान।जो आवत एहि ढिग बहुरि, जात नाहिं रसखान॥"

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रसखान का परिचय इस प्रकार दिया है- ”ये दिल्ली के एक पठान सरदार थे। इन्होंने ‘प्रेमवाटिका’ में अपने को शाही खानदान का कहा है। संभव है पठान बादशाहों की कुलपरंपरा से इनका संबंध रहा हो। ये बड़े भारी कृष्णभक्त और गोस्वामी विट्ठलदास जी के बड़े कृपापात्र शिष्य थे। ‘दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता’ में इनका वृत्तांत आया है। उक्त वार्ता के अनुसार ये पहले एक बनिए की लड़की पर आसक्त थे। एक दिन इन्होंने किसी को कहते हुए सुना कि भगवान् से ऐसा प्रेम करना चाहिए जैसे रसखान का उस बनिए की लड़की पर है। इस बात से मर्माहत होकर ये श्रीनाथ जी को ढूंढते-ढूंढते गोकुल आए और वहाँ गोसाईं विट्ठलदास जी से दीक्षा ली। यही आख्यायिका एक-दूसरे रूप में भी प्रसिध्द है। कहते हैं, जिस स्त्री पर ये आसक्त थे वह बहुत मानवती थी और इनका अनादर किया करती थी। एक दिन ये श्रीमद्भागवत का फारसी तर्जुमा पढ़ रहे थे। उसमें गोपियों के अनन्य और अलौकिक प्रेम को पढ़ इन्हें ध्यान हुआ कि उसी से क्यों न मन लगाया जाय जिस पर इतनी गोपियाँ मरती थीं। इसी बात पर ये वृंदावन चले आए ।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिन मुस्लिम हरिभक्तों के लिये कहा था, "इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए" उनमें रसखान का नाम सर्वोपरि है। वाहिद और आलम भी इसी परम्परा में आते हैं। सय्यद इब्राहीम "रसखान" का जन्म अन्तर्जाल पर उपलब्ध स्रोतों के अनुसार सन् १५३३ से १५५८ के बीच कभी हुआ था। चूँकि अकबर का राज्यकाल १५५६-१६०५ है, ये लगभग अकबर के समकालीन हैं। जन्मस्थान पिहानी कुछ लोगों के मतानुसार दिल्ली के समीप है। कुछ और लोगों के मतानुसार यह पिहानी उत्तरप्रदेश के हरदोई ज़िले में है। मृत्यु के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। यह भी पढ़ा कि रसखान ने भागवत का अनुवाद फारसी में किया।
मानुष हौं तो वही रसखानि बसौं गोकुल गाँव के ग्वालन। जो पसु हौं तो कहा बसु मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मंझारन।
पाहन हौं तो वही गिरि को जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन। जो खग हौं बसेरो करौं मिल कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन।
रसखान के जन्म के संबंध में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है। अनेक विद्वानों ने इनका जन्म संवत् १६१५ ई. माना है और कुछ विद्वानों ने १६३० ई. माना है। 
रसखान स्वयं बताते हैं कि गदर के कारण दिल्ली श्मशान बन चुकी थी, तब उसे छोड़कर वे ब्रज चले गये। ऐतिहासिक साक्ष्य के आधार पर पता चलता है कि उपर्युक्त गदर सन् १६१३ ई. में हुआ था। उनकी बात से ऐसा प्रतीक होता है कि वह गदर के समय व्यस्क थे और उनका जन्म गदर के पहले ही हुआ होगा।
रसखान का जन्म संवत् १५९० ई. मानना अधिक समीचीन प्रतीत होता है। भावानी शंकर याज्ञिक ने भी यही माना है। अनेक तथ्यों के आधार पर उन्होंने अपने इस मत की पुष्टि भी की है। ऐतिहासिक ग्रंथों के आधार पर भी यही तथ्य सामने आता है। यह मानना अधिक प्रभावशाली प्रतीत होता है कि रसखान का जन्म १५९० ई. में हुआ होगा।
जन्म- स्थान तथा जन्म काल की तरह रसखान के नाम एवं उपनाम के संबंध में भी अनेक मत प्रस्तुत किए गए हैं। हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने अपनी पुस्तक में रसखान के दो नाम लिखे हैं:-- सैय्यद इब्राहिम और सुजान रसखान। जबकि सुजान रसखान की एक रचना का नाम है। हालांकि रसखान का असली नाम सैयद इब्राहिम था और "खान' उसकी उपाधि थी।

नवलगढ़ के राजकुमार संग्रामसिंह जी द्वारा प्राप्त रसखान के चित्र पर नागरी लिपि के साथ- साथ फारसी लिपि में भी एक स्थान पर "रसखान' तथा दूसरे स्थान पर "रसखाँ' ही लिखा पाया गया है। उपर्युक्त सबूतों के आधार पर कहा जा सकता है कि रसखान ने अपना नाम "रसखान' सिर्फ इसलिए रखा था कि वह कविता में इसका प्रयोग कर सके। फारसी कवियों की नाम चसिप्त में रखने की परंपरा का पालन करते हुए रसखान ने भी अपने नाम खाने के पहले "रस' लगाकर स्वयं को रस से भरे खान या रसीले खान की धारणा के साथ काव्य- रचना की। उनके जीवन में रस की कमी न थी। पहले लौकिक रस का आस्वादन करते रहे, फिर अलौकिक रस में लीन होकर काव्य रचना करने लगे। एक स्थान पर उनके काव्य में "रसखाँ' शब्द का प्रयोग भी मिलता है।


नैन दलालनि चौहटें म मानिक पिय हाथ।"रसखाँ' ढोल बजाई के बेचियों हिय जिय साथ।।
उपर्युक्त साक्ष्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि उनका नाम सैय्यद इब्राहिम तथा उपनाम "रसखान' था।
रसखान एक जागीरदार पिता के पुत्र थे। इसलिए इनका लालन पालन बड़े लाड़- प्यार से हुआ माना जाता है। ऐसा इसलिए कहा जाता है कि उनके काव्य में किसी विशेष प्रकार की कटुता का सरासर अभाव पाया जाता है। एक संपन्न परिवार में पैदा होने के कारण उनकी शिक्षा अच्छी और उच्च कोटि की, की गई थी। उनकी यह विद्वत्ता उनके काव्य की साधिकार अभिव्यक्ति में जग जाहिर होते हैं। रसखान को फारसी हिंदी एवं संस्कृति का अच्छा ज्ञान था। फारसी में उन्होंने "श्रीमद्भागवत' का अनुवाद करके यह साबित कर दिया था। इसको देख कर इस बात का अभास होता है कि वह फारसी और हिंदी भाषाओं का अच्छा वक्ता होंगे।
 रसखान ने अपना बाल्य जीवन अपार सुख- सुविधाओं में गुजारा होगा। उन्हें पढ़ने के लिए किसी मकतब में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ी होगी।
रसखान और उसकी काव्य का भाव एवं विषय :-
सैय्यद इब्राहिम रसखान के काव्य के आधार भगवान श्रीकृष्ण हैं। रसखान ने उनकी ही लीलाओं का गान किया है। उनके पूरे काव्य- रचना में भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति की गई है। इससे भी आगे बढ़ते हुए रसखान ने सुफिज्म ( तसव्वुफ ) को भी भगवान श्रीकृष्ण के माध्यम से ही प्रकट किया है। इससे यह कहा जा सकता है कि वे सामाजिक एवं आपसी सौहार्द के कितने हिमायती थे। उनके द्वारा अपनाए गए काव्य विषयों को तीन खण्डों में बाँटा गया है --
(1.)कृष्ण- लीलाएँ
(2.)बाल- लीलाएँ
(3.)गोचरण लीलाएँ

रसखान तुलसीदास की भांति भक्तकवि नहीं थे। अपने इसी ज्ञान के आधार पर उन्होंने जोर देकर कहा कि सभी वेदों, पुराणों, आगमों और स्मृतियों का निचोड़ प्रेम (अर्थात ईश्वर-विषयक प्रेम) ही है—
 स्त्रुति पुरान आगम स्मृतिहि, प्रेम सबहि को सार। प्रेम बिना नहि उपज हिय, प्रेम-बीज-अंकुवार॥ 
मोक्ष के अनेक साधन बतलाए गए हैं जिनमें तीन मुख्य हैं-
(1.)कर्म,
(2.)ज्ञान
(3.)उपासना।
रसखान के अनुसार भक्ति या प्रेम इन सबमें श्रेष्ठ है। इसका कारण मनोवैज्ञानिक है। कर्म आदि में अहंकार बना रह सकता है या उसका फिर से उदय हो सकता है। परन्तु भक्ति-दशा में चित्त के द्रुत हो जाने पर अहंकार के लिए कोई गुंजाइश नहीं रहती। भक्ति रागात्मक वृत्ति है, संकल्प-विकल्पात्मक, मन स्वभावत: रागात्मक है। वह इन्द्रियों के माध्यम से विषयों की ओर प्रवृत्ति रहता है। इस प्रकार जीवों को वासना के बंधन में बांधे रहता है। ईश्वर-विषयक प्रेम का उदय होने पर काम, क्रोध आदि अपने आप तिरोहित हो जाते हैं। इसी अभिप्राय से रसखान ने इस परमप्रेम को काम आदि से परे कहा है—
"काम क्रोध मद मोह भय लोभ द्रोह मात्सर्य। इन सब ही तें प्रेम है परे, कहत मुनिवर्य॥"
आलंबन विभाव का अभिप्राय काव्य-नाट्य-वर्णित नायक-नायिका आदि से है क्योंकि उन्हीं के सहारे सामाजिकों के हृदय में रस का संचार हुआ करता है। रसखान के काव्य में आलंबन श्री कृष्ण, गोपियां एवं राधा हैं। 'प्रेम वाटिका' में यद्यपि प्रेम सम्बन्धी दोहे हैं, किन्तु रसखान ने उसके माली कृष्ण और मालिन राधा ही को चरितार्थ किया है। रसखान आलम्बन-निरूपण में पूर्ण सफल हुए हैं। वे गोपियों का वर्णन भी उसी तन्मयता के साथ करते हैं जिस तन्मयता के साथ कृष्ण का। संपूर्ण 'सुजान रसखान' में गोपियों एवं राधा को आलंबन (कृष्ण) के स्वरूप से प्रभावित दिखाया है।
सूफी अनुशासन के विधायक तत्त्वों में ज़िक्र को सभी रहस्यवादी सूफी एक मत से स्वीकार करते हैं। क़ुरान में धर्म पर ईमान लाने वालों को उपदेश दिया गया है कि ईश्वर का स्मरण प्राय करते रहो। खुदा के नाम के अनेक पर्याय हैं जिनके जप पर महत्त्व दिया गया है, 'ज़िक्र ही पहली सीढ़ी निजत्व को भूलना है और अन्तिम सीढ़ी उपासक का उपासना-कार्य में इस प्रकार लुप्त हो जाना कि उसे उपासना की चेतना न रहे और वह उपास्य में ऐसा लवलीन हो जाय कि उसका स्वयं तक लौटना प्रतिबंधित हो जाय। रसखान के काव्य में हमें ज़िक्र का निरूपण पद: पद: मिलता है। यह दूसरी बात है कि उन्होंने ज़िक्र का आधार कृष्ण और कृष्ण लीलाओं को बनाया। उस युग में कृष्णलीला को अलौकिक रहस्य प्राप्ति का मार्ग मानना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं मानी गई होगी। कृष्ण काव्य के इस स्वरूप को देखकर ही सम्भवत: मीर अब्दुलवाहिद विलग्रामी ने अपने ग्रंथ हकाएके हिन्दी को तीन भागों में बांटा है। प्रथम भाग में ध्रुव-पद में प्रयुक्त हिन्दी-शब्दों के सूफियाना अर्थ दिये गए हैं। दूसरे भाग में उन हिन्दी शब्दों की व्याख्या है जो विष्णु-पद में प्रयुक्त होते थे। तीसरे भाग में अन्य प्रकार के गीतों और काव्यों आदि में आय शब्दों की व्याख्या की गयी है। उदाहरणार्थ यदि हिन्दी काव्यों में कृष्ण अथवा अन्य नामों का उल्लेख हो तो उससे मुहम्मद साहब की ओर संकेत होता है, कभी केवल मनुष्य से तात्पर्य, कभी मनुष्य की वास्तविकता समझी जाती है जो परमेश्वर के जात (सत्ता) की वहदत (एक होना) से संबंधित होती है। कहीं-कहीं कन्हैया मारग रोकी से इबलीस के नाना प्रकार से मार्ग-भ्रष्ट करने की ओर संकेत होता है। होली खेलने की चर्चा लगभग समस्त कृष्ण-भक्त कवियों ने किया है। उसका संकेत अग्निकी ओर किया जाता है जो आशिकों के हृदय को सजाए हुए है और इस अग्नि ने उनके अस्तित्व को सिर से पैर तक घेर रखा है। रसखान ने होली के पदों के माध्यम से इस आग का ज़िक्र किया है। रसखान उस अलौकिक रहस्य की चर्चा कृष्ण के ज़िक्र के माध्यम से करते हैं। यदि उनकी जिह्वा किसी शब्द का उच्चारण करे तो केवल उनके नाम का हो— जो रसना रसना विलसै तेहि देहु सदा निज नाम उचारन।
हिन्दी साहित्य में कृष्ण भक्त तथा रीतिकालीन कवियों में रसखान का महत्वपूर्ण स्थान है। 'रसखान' को रस की ख़ान कहा जाता है। इनके काव्य में भक्ति, श्रृगांर रस दोनों प्रधानता से मिलते हैं। रसखान कृष्ण भक्त हैं और प्रभु के सगुण और निर्गुण निराकार रूप के प्रति श्रद्धालु हैं। रसखान के सगुण कृष्ण लीलाएं करते हैं। यथा- बाललीला, रासलीला, फागलीला, कुंजलीला आदि। उन्होंने अपने काव्य की सीमित परिधी में इन असीमित लीलाओं का बहुत सूक्ष्म वर्णन किया है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिन मुस्लिम हरिभक्तों के लिये कहा था, "इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए" उनमें "रसखान" का नाम सर्वोपरि है ।
अकथ कहानी प्रेम की जानत लैली ख़ूब। दो तनहूँ जहँ एक भे, मन मिलाइ महबूब।
दो मन एक होते सुन्यौ, पै वह प्रेम न आहि। होइ जबै द्वै तनहूँ इक, सोई प्रेम कहाहि॥


"धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, तैसी बनी सिर सुन्दर चोटी।
खेलत खात फिरैं अँगना, पग पैंजनिया कटि पीरी कछौटी।।
वा छवि को रसखान विलोकत, वारत काम कलानिधि कोटी
काग के भाग कहा कहिए हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।।"

'आमजन का स्वर महाकवि रहीमदास'




अबदुर्ररहीम खानखाना का जन्म संवत् १६१३ ई. ( सन् १५५३ ) में इतिहास प्रसिद्ध बैरम खाँ के घर लाहौर में हुआ था। इत्तेफाक से उस समय सम्राट अकबर सिकंदर सूरी का आक्रमण का प्रतिरोध करने के लिए सैन्य के साथ लाहौर में मौजूद थे। बैरम खाँ के घर पुत्र की उत्पति की खबर सुनकर वे स्वयं वहाँ गये और उस बच्चे का नाम "रहीम' रखा ।
अब्दुल रहीम खानखाना अकबर के नवरत्नों में से एक थे। एक प्रकार से वे अपनी रियासत के राजा ही थे,परंतु हृदय के रहीम (दयालु) थे।वे मुसलिम थे फिर भी भगवान श्रीकृष्ण को अपना इष्टदेव मानते थे।
रहीम के माता- पिता :-

अकबर जब केवल तेरह वर्ष चार माह के लगभग था, हुमायूँ बादशाह का देहांत हो गया। राज्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक था कि अल्पायु अकबर का ही राज्यारोहण कर दिया जाए। लिहाजा दिल्ली दरबार के उच्च अधिकारियों ने १४ फरवरी १५५६ को राज्य संचालन के लिए अकबर का राज्यारोहण किया गया। लोगों ने अकबर का नाम पढ़कर अतालिकी शासनकाल की व्यवस्था कर दी। यहीं से मुगल सम्राज्य की अभूतपूर्व सफलता का दौर शुरु हो जाता है। इसका श्रेय जिसे जाता है, वह है अकबर के अतालीक बैरम खाँ "खानखाना'। बैरम खाँ मुगल बादशाह अकबर के भक्त एवं विश्वासपात्र थे। अकबर को महान बनाने वाला और भारत में मुगल सम्राज्य को विस्तृत एवं सुदृढ़ करने वाला अब्दुर्रहीम खानाखाना के पिता हैं बैरम खाँखानखाना ही थे। बैरम खाँ की कई रानियाँ थी, मगर संतान किसी को न हुई थी। बैरम खाँ ने अपनी साठ वर्ष की आयु में हुमायूँ की इच्छा से जमाल खाँ मेवाती की पुत्री सुल्ताना बेगम से किया। इसी महिला ने भारत के महान कवि एवं भारतमाता के महान सपूत रहीम खाँ को जन्म दिया। 

बैरम खाँ से हुमायूँ अनेक कार्यों से काफी प्रभावित हुआ। हुमायूँ ने प्रभावित होकर कहीं युवराज अकबर की शिक्षा- दिक्षा के लिए बैरम खाँ को चुना और अपने जीवन के अंतिम दिनों में राज्य का प्रबंध की जिम्मेदारी देकर अकबर का अभिभावक नियुक्त किया था। बैरम खाँ ने कुशल नीति से अकबर के राज्य को मजबूत बनाने में पूरा सहयोग दिया। किसी कारणवश बैरम खाँ और अकबर के बीच मतभेद हो गया। अकबर ने बैरम खाँ के विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया और अपने उस्ताद की मान एवं लाज रखते हुए उसे हज पर जाने की इच्छा जताई। परिणामस्वरुप बैरम खाँ हज के लिए रवाना हो गये। बैरम खाँ हज के लिए जाते हुए गुजरात के पाटन में ठहरे और पाटन के प्रसिद्ध सहस्रलिंग सरोवर में नौका- विहार के बाद तट पर बैठे थे कि भेंट करने की नियत से एक अफगान सरदार मुबारक खाँ आया और धोखे से बैरम खाँ का बद्ध कर दिया। यह मुबारक खाँ ने अपने पिता की मृत्यू का बदला लेने के लिए किया। इस घटना ने बैरम खाँ के परिवार को अनाथ बना दिया। इन धोखेबाजों ने सिर्फ कत्ल ही नहीं किया, बल्कि काफी लूटपाट भी मचाया। विधवा सुल्ताना बेगम अपने कुछ सेवकों सहित बचकर अहमदाबाद आ गई। अकबर को घटना के बारे में जैसे ही मालूम हुआ, उन्होंने सुल्ताना बेगम को दरबार वापस आने का संदेश भेज दिया। रास्ते में संदेश पाकर बेगम अकबर के दरबार में आ गई। ऐसे समय में अकबर ने अपने महानता का सबूत देते हुए इनको बड़ी उदारता से शरण दिया और रहीम के लिए कहा "इसे सब प्रकार से प्रसन्न रखो। इसे यह पता न चले कि इनके पिता खान खानाँ का साया सर से उठ गया है। बाबा जम्बूर को कहा यह हमारा बेटा है। इसे हमारी दृष्टि के सामने रखा करो। इस प्रकार अकबर ने रहीम का पालन- पोषण एकदम धर्म- पुत्र की भांति किया। कुछ दिनों के पश्चात अकबर ने विधवा सुल्ताना बेगम से विवाह कर लिया। अकबर ने रहीम को शाही खानदान के अनुरुप "मिर्जा खाँ' की उपाधि से सम्मानित किया। 
बादशाह अकबर का यह आदेश बैरम ख़ाँ के परिवार को जालौर में मिला, जिससे कुछ आशा बंधी। रहीम और उनकी माता परिवार के अन्य सदस्यों के साथ सन 1562 में राजदरबार में पहुँचे। अकबर ने बैरम ख़ाँ के कुछ दुश्मन दरबारियों के विरोध के बावजूद बालक रहीम को बुद्धिमान समझकर उसके लालन–पालन का दायित्व स्वयं ग्रहण कर लिया। अकबर ने रहीम का पालन–पोषण तथा शिक्षा–दीक्षा शह ज़ादों की तरह शुरू करवाई, जिससे दस–बारह साल की उम्र में ही रहीम का व्यक्तित्व आकार ग्रहण करने लगा। अकबर ने शहज़ादों को प्रदान की जाने वाली उपाधि मिर्ज़ा ख़ाँ से रहीम को सम्बोधित करना शुरू किया।
अकबर रहीम से बहुत अधिक प्रभावित था और उन्हें अधिकांश समय तक अपने साथ ही रखता था। रहीम को ऐसे उत्तरदायित्व पूर्ण काम सौंपे जाते थे, जो किसी नए सीखने वाले को नहीं दिए जा सकते थे। परन्तु उन सभी कामों में 'मिर्ज़ा ख़ाँ' अपनी योग्यता के बल पर सफल होते थे। अकबर ने रहीम की शिक्षा के लिए मुल्ला मुहम्मद अमीन को नियुक्त किया। रहीम ने तुर्की, अरबी एवं फ़ारसी भाषा सीखी। उन्होंने छन्द रचना, कविता करना, गणित, तर्क शास्त्र और फ़ारसी व्याकरण का ज्ञान प्राप्त किया। संस्कृत का ज्ञान भी उन्हें अकबर की शिक्षा व्यवस्था से ही मिला। काव्य रचना, दानशीलता, राज्य संचालन, वीरता और दूरदर्शिता आदि गुण उन्हें अपने माँ - बाप से संस्कार में मिले थे। सईदा बेगम उनकी दूसरी माँ थीं। वह भी कविता करती थीं ।
रहीम की शिक्षा- दीक्षा अकबर की उदार धर्म- निरपेक्ष नीति के अनुकूल हुई। इसी शिक्षा- दिक्षा के कारण रहीम का काव्य आज भी हिंदूओं के गले का कण्ठहार बना हुआ है। दिनकर जी के कथनानुसार अकबर ने अपने दीन- इलाही में हिंदूत्व को जो स्थान दिया होगा, उससे कई गुणा ज्यादा स्थान रहीम ने अपनी कविताओं में दिया। रहीम के बारे में यह कहा जाता है कि वह धर्म से मुसलमान और संस्कृति से शुद्ध भारतीय थे।
रहीम का विवाह :-
रहीम की शिक्षा समाप्त होने के पश्चात सम्राट अकबर ने अपने पिता हुमायूँ की परंपरा का निर्वाह करते हुए, रहीम का विवाह बैरम खाँ के विरोधी मिर्जा अजीज कोका की बहन माहबानों से करवा दिया। इस विवाह में भी अकबर ने वही किया, जो पहले करता रहा था कि विवाह के संबंधों के बदौलत आपसी तनाव व पुरानी से पुरानी कटुता को समाप्त कर दिया करता था। रहीम के विवाह से बैरम खाँ और मिर्जा के बीच चली आ रही पुरानी रंजिश खत्म हो गयी। रहीम का विवाह लगभग सोलह साल की उम्र में कर दिया गया था। 
रहीम की कामयाबियों का सिलसिला :-

रहीम जन्म से ही विलक्षण प्रतिभा के मालिक थे। उनके अंदर ऐसी कई विशेषताएँ मौजूद थी, जिसके बिना पर वह बहुत जल्दी ही अकबर के दरबार में अपना स्थान बनाने में कामयाब हो गये। अकबर ने उन्हें कम उम्र से ही ऐसे- ऐसे काम सौंपे कि बांकि दरबारी आश्चर्य चकित हो जाया करते थे। मात्र सत्तरह वर्ष की आयु में १५७३ ई. में गुजरातियों की बगावत को दबाने के लिए जब सम्राट अकबर गुजरात पहुँचा तो पहली बार मध्य भाग की कमान रहीम को सौंप दिया। इस समय उनकी उम्र सिर्फ १७ वर्ष की थी।
विद्रोह को रहीम की अगुवाई में अकबर की सेना में प्रबल पराक्रम के साथ दबा दिया। अकबर जब इतनी बड़ी विजय के साथ सीकरी पहुँचा, तो रहीम को बहुत बड़ा सम्मान दिया गया। सम्मान के साथ- साथ रहीम को पर्याप्त धन और यश की भी प्राप्ति हुई। कहा जाता है कि अकबर धन देकर दूसरों का अध्ययन करता था, मगर रहीम खानखाना इस अग्नि परीक्षा में भी सफल हुआ और इस प्रकार अकबर को रहीम पर काफी विश्वास हुआ।
गुजरात विजय के कुछ दिनों पश्चात, अकबर ने वहाँ के शासक खान आजम को दरबार में बुलाया। खान आजम के दरबार में आ जाने के कारण वहाँ उसका स्थान रिक्त हो गया। गुजरात प्रांत धन- जन की दृष्टि से बहुत ही अहम था। राजा टोडरमल की राज नीति के कारण वहाँ से पचास लाख रुपया वार्षिक दरबार को मिलता था। ऐसे प्रांत में अकबर अपने को नजदीकी व विश्वासपात्र एवं होशियार व्यक्ति को प्रशासक बनाकर भेजना चाहता था। ऐसी सूरत में अकबर ने सभी लोगों में सबसे ज्यादा उपयुक्त मिर्जा खाँ को चुना और काफी सोच विचार करके रहीम ( मिर्जा खाँ ) को गुजरात प्रांत की सत्ता सूबेदार के रूप में सौंपी गई।रहीम ने मशहूर लड़ाई हल्दी घाटी की लड़ाई में भी महत्वपूर्ण किरदार निभाया और विजय श्री दिलाने तक दो साल वहाँ मौजूद रहे। 
दरबार का प्रमुख पद :-
अकबर के दरबार को प्रमुख पदों में से एक मिरअर्ज का पद था। यह पद पाकर कोई भी व्यक्ति रातों रात अमीर हो जाता था, क्योंकि यह पद ऐसा था, जिससे पहुँचकर ही जनता की फरियाद सम्राट तक पहुँचती थी और सम्राट के द्वारा लिए गए फैसले भी इसी पद के जरिये जनता तक पहुँचाए जाते थे। इस पद पर हर दो- तीन दिनों में नए लोगों को नियुक्त किया जाता था। सम्राट अकबर ने इस पद का काम- काज सुचारु रुप से चलाने के लिए अपने सच्चे तथा विश्वास पात्र अमीर रहीम को मुस्तकिल मीर अर्ज नियुक्त किया। यह निर्णय सुनकर सारा दरबार सन्न रह गया था। इस पद पर आसीन होने का मतलब था कि वह व्यक्ति जनता एवं सम्राट दोनों में सामान्य रुप से विश्वसनीय है।
काफी मिन्नतों तथा आशीर्वाद के बाद अकबर को शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से एक लड़का प्राप्त हो सका, जिसका नाम उन्होंने सलीम रखा। शहजादा सलीम माँ- बाप और दूसरे लोगों के अधिक दुलार के कारण शिक्षा के प्रति उदासीन हो गया था। कई महान लोगों को सलीम की शिक्षा के लिए अकबर ने लगवाया। इन महान लोगों में शेर अहमद, मीर कलाँ और दरबारी विद्वान अबुलफजल थे। सभी लोगों की कोशिशों के बावजूद शहजादा सलीम को पढ़ाई में मन न लगा। अकबर ने सदा की तरह अपना आखिरी हथियार रहीम खाने खाना को सलीम का अतालीक नियुक्त किया। कहा जाता है रहीम खाँ यह गौरव पाकर बहुत प्रसन्न थे।
रहीम का व्यक्तित्व :-
सकल गुण परीक्षैक सीमा।नरपति मण्डल बदननेक धामा।।
जयति जगति गीयमाननामा।गिरिबन राज- नवाब खानखाना।।
रहीम का व्यक्तित्व अपने आप में अलग मुकाम रखता है। एक ही व्यक्तित्व अपने अंदर कवि का गुण, वीर सैनिक का गुण, कुशल सेनापति, सफल प्रशासक, अद्वितीय आश्रयदाता, गरीबनबाज, विश्वास पात्र मुसाहिब, नीति कुशल नेता, महान कवि, विविध भाषा विद, उदार कला पारखी जैसे अनेकानेक गुणों का मालिक हो, यह अपने- आप ही परिचय प्रस्तुत करते हैं।
रहीम की वीरता, धीरता तथा दानशीलता की अनेक कवियों ने अनेक प्रकार से गुण- गान किया है --
सर सम सील सम धीरज समसंर सम,साहब जमाल सरसान था।कर न कुबेर कलि की रति कमाल करि,ताले बंद मरद दरद मंद दाना था।
दरबार दरस परस दरवेसन को तालिब,तलब कुल आलम बखाना था।
गाहक गुणी के सुख चाहक दुनी के बीच,सत कवि दान का खजाना खानखाना था।
रहीम के विभिन्न प्रभावशाली व्यक्तित्व  --
सेनापति रहीम -- राजनीतिज्ञ रहीम
दानवीर रहीम -- कविवर रहीम
आश्रयदाता रहीम -- हिंदुत्व प्रेमी रहीम
रहीम सेनापति के रुप में :-
सम्राट अकबर के दरबार में अनेक महत्वपूर्ण सरदार थे। इन सरदारों में हर उस सरदार की दरबार में प्रशंसा होती थी, जो अपनी वीरता से कोई सफलता प्राप्त करता था। यह वह दरबार था, जहाँ हिंदू- मुस्लिम या छोटे- बड़े का कोई भेद भाव न था। रहीम घुड़सवारी व तलवार चलाने में काफी माहिर थे। इसके कविता की कुछ पंक्तियाँ --
थाहाहिं पसट्टहि उच्छलहिं,नच्चत धावत तुरंग इमि।
खंजन जिमि नागरि नैन जिमि,नट जिमि- मृग जिमि, पवन जिमि।
रहीम खान खाना की तीर अंदाजी की तारीफ इस प्रकार की गई है --
ओहती अटल खान साहब तुरक मान,
तेरी ये कमान तोसों तंहू सौं करत हैं।
रहीम खाँ तीर- तलवार से भी अधिक महत्व, समय को देते थे। उन्होंने पूरी जिंदगी सभी कार्यों को शीतलीता से करने की चेष्टा की। जब अकबर ने उनको मुजफ्फर पर विजय प्राप्त करने के लिए सेनापति बनाकर भेजा, तो खाना हुए कि तमाम सेना- नायक दंग रह गए। रहीम संबंधी मामलों में काफी सुझ- बूझ से काम लेते थे।
रहीम दानवीर के रुप में :-
अब्दुर्रहीम खान- खानाँ ने जन- सामान्य की दीनता दूर करने के लिए बहुत से काम किये। उनकी दानवीरता आज भी जन- सामान्य के जुबां पर है। उनकी इन हरकतों से ऐसा लगता था कि खान खानाँ ने मानों जन- सामान्य की दीनता दूर करने का संकल्प ले लिया हो -
श्रीखानखाना कलिकर्ण निरेश्वरेणविद्वज्जनादिह निवारितमादरेण।
दारिद्रमाकलयति नितांतभीतंप्रत्यार्थि वीर धरणी पति मण्डलानि।
नमाज की तरह दैनिक दान रहीम के जीवन का नित्य नैमित्तिक कार्य था। बिना दान दिए उनको चैन नहीं होता था --
 तबहीं लो जीबों यलो, दीबो होय न छीम।जग में रहिबो कुचित गति उचित न होय रहीम।
दान देते समय रहीम अपनी आँख उठाकर नहीं देखते थे। उनका दान सभी धर्मों के लोगों के लिए था। एक बार गंग ने पूछा --
सीखे कहाँ नवावज ऐसी देनी देन।ज्यों- ज्यों का उँचो करो लोन्त्यो नीचे नैन।
रहीम ने उत्तर दिया --
देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन,लोग भरम हमर हमपर घरें यातें नीचे नैन।
रहीम बगैर माँगे भी देते थे --
गरज आपनी आप सों रहिमन कहीं न जाया।
जैसे कुल की कुल वधू पर घर जात लजाया।
एक बार एक शत्रु पर अप्रत्याशित विजय प्राप्त होने पर रहीम को जो माल मिला था, वह और उस समय उसके पास मौजूद माल का मूल्य ७५,००,००० रुपये था। रहीम ने विजय के उल्लास में वह सभी रुपया अपने प्राण- उत्सर्गकर्ता सैनिकों को बाँट दिया। रहीम के पास केवल दो ऊँट ही बचे थे।
जोरावर अब जोर रवि- रथ कैसे जारे, बने जोर देखे दीठि जोरि रहियतु है।
है न को लिवैया ऐसो, देन को देवेया ऐसो,दरम खान खाना के लहे ते लहियतु है।
तन मन डारे बाजी द्वे तन संभारे जात,और अधिकाई कहो का सो कहियतु है।
पौन की बड़ाई बरनत सब "तारा' कवि,पूरो न परत या ते पौन कहियत है।
कवियों के आश्रयदाता रहीम :-
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार रहीम जैसा कवियों का आश्रयदाता एशिया तथा यूरोप में कोई न था। रहीम के आश्रयदायित्व देश- विदेशों मे इतनी धूम मच गई थी कि किसी भी दरबार में कवियों को अपने सम्मान में जरा भी कमी महसूस होती थी, वह फौरन ही रहीम के आश्रय में आ जाने की धूम की दे डालते थे। इरान के शाह अब्बास के सुप्रसिद्ध कवि केसरी ने भरे दरबार में कह डाला था --
नहीं दिख पड़ता है कोई इरान में ,जो मेरे गूढ़ार्थमय पदों को क्रिय करे।
तप्तात्मा बना हूँ मैं, अपने ही देश में,आवश्यक हो गया है मुझे हिंदुस्तान जाना ।
जिस प्रकार बूँद एक जाती है सागर ओर,मैं भी भेजूँगा निज काव्य निधि हिंद को।
क्योंकि इस युग में राजाओं में अब कोई नहीं।खानखाना के सिवा अन्य आश्रयदाता,सरस्वती के सुपुत्र सद कवियों का।।
रहीम ने अनेक अवसरों पर अपने आश्रित कवियों पर हजारों लाखों अशरफियाँ लुटाई थी। नजीरी ने एक बार कहा कि मैं ने अब तक एक लाख रुपये नहीं देखा, इतना सुनते ही रहीम ने आज्ञा दिया कि डेढ़ लाख सामने रख दो और आज्ञानुसार वह रकम रख दी गई, वह समस्त ढ़ेर रहीम ने नजीरी को दे दिया।
रहीम के दरबार में हिंदी कवि :-
रहीम के दरबार में फारसी कवि तो थे ही, मगर फारसी कवियों से ज्यादा हिंदी कवियों की संख्या मौजूद थी। साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जाता है कि रहीम के दरबार में फारसी कवियों के मुकाबले हिंदी कवियों को ज्यादा नवाजे जाने का रिवाज था। बड़े- से- बड़े फारसी कवि को दस से पंद्रह लाख तक भी पुरस्कार प्राप्त होता था, किंतु हिंदी कवि को छत्तीस लाख रुपये की विशाल धनराशि प्राप्त हुई थी।
यह मानक तथा रिकार्ड धनराशि गंग को उसकी एक मात्र छप्पय पर मिली थी :-
चकित भँवर रहियो गयो,गगन नहिं करत कमल बन।
अहि फन मनि लेत,तेज नहिं बहत पवन धन।।
हंस मानसा तज्यो,चक्क- चक्की न मिलै अति।
बहु सँदरि पद्यनि,पुरुष न चहै करे रति।।
खल भलित शेष केवि "गंग' मन,अमित तेज रवि रथ खस्यो।।
खानखाना बैरम सुवन,जबहि क्रोध करि तँग कस्यो।। 
सन 1620 से 1626 तक का समय रहीम के राजनीतिक जीवन का ह्रास काल रहा। सम्राट अकबर के शासन काल में उनकी गणना अकबर के नौ रत्नों में होती थी। जहाँगीर के राजगद्दी पर बैठने पर रहीम ने अक्सर जहाँगीर की नीतियों का विरोध किया। इसके फलस्वरूप जहाँगीर की दृष्टि बदली और उन्हें क़ैद कर दिया। उनकी उपाधियाँ और पद ज़ब्त कर लिए गए। सन 1625 में रहीम ने दरबार में जहाँगीर के सामने उपस्थित होकर माफ़ी माँगी और वफ़ादारी का प्रण किया। बादशाह जहाँगीर ने न सिर्फ़ उन्हें माफ़ कर दिया बल्कि लाखों रुपये दिए, उपाधियाँ और पद लौटा दिए। जहाँगीर की इस कृपा से अभिभूत होकर रहीम ने अपनी क़ब्र के पत्थर पर यह दोहा खुदवाने की वसीयत की—
 मरा लुत्फे जहाँगीर, जे हाई ढाते रब्बानी।दो वारः जिन्दगी दाद, दो वारः खानखानी।।
अर्थात् ईश्वर की सहायता और जहाँगीर की दया से दो बार ज़िन्दगी और दो बार ख़ानख़ाना की उपाधि मिली।
किसी हिंदी कवि ने एक कवित्त खानखाना की सेवा में प्रस्तुत किया। कवि की सूझ अछूती एवं प्रिय थी। रहीम खानखाना इतना खुश हुए कि कवि महोदय से पूछा मनुष्य की उम्र कितनी होती है, उन्होंने जवाब दिया १०० वर्ष। रहीम ने उसकी उम्र पूछा, उन्होंने कहा अभी मेरी उम्र ३५ वर्ष हे। रहीम ने अपने कोषाध्यक्ष को आज्ञा दी की कवि महोदय को इसकी उम्र के बांकि ६५ वर्ष के लिए रोजाना पाँच रुपये के हिसाब से पूरी रकम अदा की जाए। वह कवि गद- गद हो गया और खुशी- खुशी घर वापस हुआ ।


"रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर ||"