मंगलवार, 5 जुलाई 2011

'जीवन पर दिशाओं का पड़ने वाला प्रभाव'



सम्पूर्ण सौरमंडल में पृथ्वी एक बहुत बड़ा चुम्बकीय ग्रह है। इस पृथ्वी के दो सिरे हैं : उत्तरी ध्रुव  और दक्षिणी ध्रुव । चुम्बक का लौह तत्व से आकर्षण सर्वविदित है । मनुष्य शरीर का 66 प्रतिशत अंश तरल है जिसमें लौह तत्व की बहुलता है इसलिए मनुष्य एक चलता फिरता चुम्बक है जिसकी संगति भौगोलिक चुम्बक से अवश्य बैठनी चाहिए। इसीलिए दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोना घातक माना गया है क्योंकि इससे भौगोलिक उत्तरी ध्रुव और मानवीय उत्तरी ध्रुव एक मुखी होने के नाते असंतुलन पैदा करता है क्योंकि समान चुम्बकीय ध्रुव विकर्षण कारक होते हैं। हमें सदा दक्षिण की ओर सिर करके सोना चाहिए जिससे भौगोलिक व मानवीय चुम्बकीय ध्रुवों में आकर्षण बैठ सके। पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य एवम अन्य जीव-जंतुओं के जीवन पर दिशाओं के प्रभाव को जानने से यह ज्ञात हो जाता है कि प्रकृति का जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव अत्यंत महत्वपूर्ण होता है |  हमें दसों दिशाओं के बारे में कुछ मूलभूत बातें जानना आवश्यक है, यह निम्नलिखित प्रकार से हैं :--
(१) पूर्व-दिशा: यह प्रकाश, ज्ञान, चेतना का स्रोत है। भगवान सूर्य इस दिशा में उदित होकर सभी प्राणियों में स्फूर्ति व उर्जा का संचार करते हैं। इन्द्र इसके देवता हैं और सूर्य ग्रह। पूजा ध्यान, चिंतन तथा अन्य बौद्धिक कार्य पूर्वाभिमुख होकर करने से इनकी गुणवत्ता बढ़ जाती है। इस दिशा की ओर खुलने वाला भवन सर्वोत्तम माना गया है। प्रात:काल पूर्व दिशा से आने वाली हवा का घर में निर्वाध रूप से प्रवेश होना चाहिए ताकि सारा घर सकारात्मक उर्जा से आपूरित हो जाए । पूर्वी दिशा का स्थल ऊँचा हो, गृहस्वामी दरिद्र बन जायेगा संतान अस्वस्थ्य तथा मंदबुद्धि वाली होगी | इस दिशा की ओर खाली जगह रखे बिना सरहद को जोड़कर निर्माण कार्य करने पर या तो पुरुष-संतान की कमी होती है अथवा संतान होने पर विकलांग होगी |

(२) आग्नेय: अग्नि इसके देवता हैं और शुक्र ग्रह। आग्नेय दिशा में जलाशय आदि (waterbody) नहीं होना चाहिए। इस दिशा में रसोई का होना बहुत शुभ है। आग्नेय दिशा में ऊंची भूमि धनदायक मानी गई है। इस दिशा की ओर मुंह करके गंभीर चिंतन कार्य नहीं करना चाहिए।

(३) दक्षिण-दिशा: इसके देवता यम हैं और मंगल ग्रह। यह दिशा सबसे अशुभ मानी गई है परन्तु इस ओर सर कर सोना स्वास्थ्य-र्वध्क व शांतिदायक है। यदि इस ओर भूमि ऊंची हो तो वह सब कामनाएं संपूर्ण करती है और स्वास्थ्य र्वध्क होती है। भवन कभी भी दक्षिण की ओर नहीं खुलना चाहिए बल्कि इस दिशा में शयन-कक्ष होना उत्तम है।

(४) दक्षिण-पश्चिम: निऋति नामक राक्षस इसका अधिष्ठता है और राहु-केतु इसके ग्रह हैं। यह दिशा भी कुछ शुभ नहीं है। पर गृह स्वामी और स्वामिनी का निवास स्थान इसी दिशा में होने से उनका अधिकार बढ़ता है। संभवत: यह इस बात का द्योतक है कि शासक की तरह गृहस्वामी को भी अवांछनीय और शरारती तत्वों पर नियंत्राण रखना चाहिए। इस दिशा में भी द्वार नहीं होना चाहिए तथा इस ओर जल-प्रवाह प्राणघातक, कलहकारी व क्षयकारक माना गया है। इस दिशा में शौचालय, भंडार-गृह होना उचित है।

(५) पश्चिम दिशा: वरुण इसके देवता हैं और शनि ग्रह। यह सूर्यास्त की दिशा है। इसलिए पश्चिमाभिमुख होकर बैठना मन में अवसाद पैदा करता है। पश्चिम में भोजन करने का स्थान उत्तम है। सीढ़ियां, बगीचा, कुंआ आदि भी इस ओर हो सकता है। पश्चिम की ओर सिर करके सोने से प्रबल चिन्ता घेर लेती है।

(६) वायव्य दिशा : इस दिशा के देवता वायु हैं तथा चन्द्रमा ग्रह। यह दिशा चंचलता का प्रतीक है। इस दिशा की ओर मुख करके बैठने से मन में चंचलता आती है और एकाग्रता नष्ट होती है। जिस कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो, उसे इस दिशा में निवास करना चाहिए जिससे उसका विवाह शीघ्र हो जाए। दुकान आदि व्यापारिक प्रतिष्ठान वायव्य दिशा में होने से ग्राहकों का आवागमन बढ़ेगा तथा सामान जल्दी बिकेगा। ध्यान चिंतन तथा पठन-पाठन के लिए यह दिशा उत्तम नहीं है।

(७) उत्तर दिशा : कुबेर तथा चन्द्र इसके देवता हैं तथा बुद्ध इसका ग्रह है। यह दिशा शुभ कार्यों के लिए उत्तम मानी गई है। पूजा, ध्यान, चिंतन, अध्ययन आदि कार्य उत्तराभिमुख होकर करने चाहिए। धन के देवता कुबेर की दिशा होने के कारण इस दिशा की ओर द्वार समृद्धि दायक माना गया है। देव-गृह, भंडार और घन-संग्रह का स्थान इसी दिशा में होना चाहिए। इस ओर जलाशय (water body) का होना अत्युत्तम है पर कभी भी इस ओर सिर करके नहीं सोना चाहिए।

(८) ईशान (उत्तर-पूर्व) इसके देवता भगवान शंकर और ग्रह बृहस्पति हैं। दसों दिशाओं में यह सर्वोत्तम दिशा है। यह ज्ञान (पूर्व) और समृद्धि; (उत्तर) का मेल है। इस ओर द्वार होना सबसे अच्छा है। इससे आने वाली वायु सारे घर को सकारात्मक उर्जा से परिपूरित कर देती है। पूजा स्थान इसी दिशा में होना चाहिए। जल-स्थान (water body) और बगीचा आदि इस दिशा के सुप्रभाव को बढ़ा देता है और घर में सुख-समृद्धि लाता है । 
भूमि का ढाल उत्तर या पूर्व की ओर शुभ होता है । भूखण्ड का उत्तर एवं पूर्वी भाग सबसे नीचा होना चाहिए ।

इसके अतिरिक्त दो दिशाएं और हैं- ऊर्ध्व ऐवम अध: (उपर व नीचे) अर्थात आकाश और पाताल |

(९) आकाश (ऊर्ध्व ) दिशा : धरती के वाह्य अन्तरिक्ष का वह भाग जो उस पिण्ड के सतह से दिखाई देता है, वही आकाश (ऊर्ध्व दिशा) है । अनेक कारणों से इसे परिभाषित करना कठिन है । दिन के प्रकाश में पृथ्वी का आकाश गहरे-नीले रंग के सतह जैसा प्रतीत होता है जो हवा के कणों द्वारा प्रकाश के प्रकीर्णनके परिणामस्वरूप घटित होता है । नासा के केपलर टेलीस्कोप  ने ग्रहों की पहचान करते समय यह पाया कि कोई 50 करोड़ ग्रह गोल्डीलॉक्स जोन के रूप में हैं, जहां का जलवायु न तो बहुत गरम और न तो बहुत ठंढा है, और वहां जीवन सम्भव हो सकता है । वैज्ञानिकों ने उन ग्रहों की संख्याओं को लिया है, जिन्हें उन्होंने रात्रिकालीन आकाश के एक छोटे से हिस्से की तलाश के प्रथम वर्ष में पाया था, और उसके बाद उन्होंने एक आंकड़ा तैयार किया कि ग्रहों के पास कितने तारे हो सकते हैं। नासा के केपलर टेलीस्कोप  ने ग्रहों की पहचान की, क्योंकि वे पृथ्वी और तारों के बीच की कक्षा से होकर गुजरते हैं । अभी तक नासा के केपलर टेलीस्कोप ने 1,235 प्रतिनिधि ग्रह पाए हैं। इनमें से 54 गोल्डीलॉक्स जोन में हैं, जहां जीवन सम्भव हो सकता है ।

(१०) पाताल(अध:) दिशा : समस्त भूमण्डल पचास करोड़ योजन विस्तार वाला है। इसकी ऊंचाई सत्तर सहस्र योजन है। इसके नीचे सात पाताल नगरियां हैं । हिन्दू धर्म के अनुसार पाताल पृथ्वी के नीचे होते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार सात प्रकार के पाताल लोक होते हैं । ये पाताल लोक इस प्रकार से हैं:-
(i )अतल
(ii)वितल
(iii)नितल
(iv)गभस्तिमान
(v)महातल
(vi)सुतल
(vii)पाताल
सुन्दर महलों से युक्त वहां की भूमियां शुक्ल, कृष्ण, अरुण और पीत वर्ण की तथा शर्करामयी (कंकरीली), शैली (पथरीली) और सुवर्णमयी हैं। वहां दैत्य, दानव, यक्ष और बड़े बड़े नागों की जातियां वास करतीं हैं। वहां अरुणनयन हिमालय के समान एक ही पर्वत है।

मुख्य दिशाएँ वास्तु या मकान की मध्य रेखा से 22.5 अंश या ज्यादा घूमी हुई हो तो ऐसे वास्तु को विदिशा में बना मकान या वास्तु कहा जाता है। ऐसे विदिशा मकान में वास्तु के उक्त सभी नियम व प्रभाव पूरी तरह नहीं लागू होते । यदि किसी घर में वास्तुदोष पता नहीं हो अथवा ऐसा वास्तुदोष हो जो ठीक करना संभव न हो तो उस मकान के चारों कोनों में एक-एक कटोरी मोटा (ढेलावाला) नमक रखा जाय। प्रतिदिन कमरों में नमक के पानी का अथवा गौमूत्र (अथवा गौमूत्र से निर्मित फिनाइल) का पौंछा लगाया जाय। इससे ऋणात्मक ऊर्जाओं का प्रभाव कम हो जायेगा। जब नमक गीला हो जाये तो वह बदलते रहना आवश्यक है। वास्तु दोष प्रभावित स्थल पर देशी गाय रखने से भी वास्तुदोष का प्रभाव क्षीण होता है ।
'जय हिंद,जय हिंदी'   

4 टिप्‍पणियां:

  1. दक्षिण दिशा में सिर करने का विष्लेषण व्यवहारिक लगा

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  2. पीयुष चतुर्वेदी5 जुलाई 2011 को 11:01 pm

    मनोज भाई ,टिप्प्णी भेजना बड़ा मुश्किल है,ये प्रोफाइल का क्या चक्कर है,पीयुष

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  3. परमादरणीय गुरुदेव,
    आपका लेखन सदैव उच्च कोटि का होता है | आपके लेखन पर प्रितिक्रिया में हम यही कह सकते हैं-------अप्रतिम-लेखन व अप्रतिम-विचार !!!!!!

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  4. परमप्रिय मित्रों,
    ज्योतिष द्वारा भविष्यवाणी के उत्तरदायित्व के लिए आवश्यक कानून बनाने की जरूरत है । मुझे विश्वास है कि आप विषय से सम्बन्धित तर्क अवश्य प्रकट करेंगें जिस से अन्य साथी लाभान्वित होंगे |
    'जय हिंद,जय हिंदी'

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