सोमवार, 11 जुलाई 2011

ज्योतिषशास्त्र का वैज्ञानिक-दृष्टिकोण


यह सत्य है जब तक ज्योतिष और ग्रहों के तथाकथित असर साबित नहीं हो जाते, कम से कम तब तक तो ज्योतिष विद्या एक “अप्रायोगिक-विश्वास” ही है, लेकिन सिर्फ़ यही आधार ज्योतिष को विज्ञान नहीं होना सिद्ध नहीं करता, कुछ और भी आधार हैं जिन पर विचार किया जाना आवश्यक है जिससे यह साबित किया जा सके कि ज्योतिष विज्ञान नहीं है, बल्कि कोरे अनुमान, ऊटपटाँग कल्पनायें और खोखला अंधविश्वास है । वैज्ञानिक ज्योतिष को विज्ञान का दर्जा देने से कतराते है | 
क्या सत्ता में बैठा शासक वर्ग ज्योतिष को विज्ञान समझता है ? बिलकुल नहीं समझता है, अगर शासक वर्ग इसे विज्ञान समझता, तो इस क्षेत्र में कार्य करनेवालों के लिए कभी-कभी किसी प्रतियोगिता, अधिकृत संगोष्ठियों आदि का आयोजन होता और ज्योतिष क्षेत्र के विद्वानों को पुरस्कारों से सम्मानित कर प्रोत्साहित किया जाता। दुर्भाग्य की बात है कि आज तक ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। यदि पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा जाए, तो लगभग सभी पत्रिकाएँ यदा-कदा ज्योतिष से संबंधित लेख, साक्षात्कार,भविष्यवाणियॉ आदि निकालती ही रहती है, लेकिन जब आज तक इसकी वैज्ञानिकता के बारे में कोई निष्कर्ष ही नहीं निकाला जा सका और जनता को कोई संदेश ही नहीं मिल पाया, तो ऐसे ज्योतिष से संबंधित लेख, साक्षात्कार,भविष्यवाणियॉ आदि का क्या औचित्य है ? इस तरह मूल तथ्य की परिचर्चा के अभाव में फलित ज्योतिष को जाने-अनजाने काफी नुकसान हुआ है । 
ज्योतिष के सन्दर्भ में कारण और निवारण का सिद्धान्त अपना कर भौतिक जगत की श्रेणी मे ज्योतिष को तभी रखा जा सकता है,जब उसे पूरी तरह से समझ लिया जाये | विज्ञान की परिभाषा के अनुसार 'सिद्धांतों, नियमों, प्रयोगों, समालोचनाओं एवं प्रेक्षण के आधार पर जो ज्ञान प्राप्त किया जाता है वह विज्ञान है' | अब हमें यह विचार करना है कि क्या ज्योतिषशास्त्र इन सभी कसौटियों पर खड़ा उतरता है जिससे इसे विज्ञान कहा जा सकता है | इसके लिए कुछ तथ्यों पर हमें विश्लेषण करना आवश्यकता है |

(१) समस्त ब्रह्मांड की अति सूक्षम हलचल का प्रभाव भी पृथ्वी पर पडता है,सूर्य और चन्द्र का प्रत्यक्ष प्रभाव हम आसानी से देख और समझ सकते है,सूर्य के प्रभाव से ऊर्जा और चन्द्रमा के प्रभाव से समुद में ज्वार-भाटा को भी समझ और देख सकते है,जिसमे अष्ट्मी के लघु ज्वार और पूर्णमासी के दिन बृहद ज्वार का आना इसी प्रभाव का कारण है,पानी पर चन्द्रमा का प्रभाव अत्याधिक पडता है,मनुष्य के अन्दर भी पानी की मात्रा अधिक होने के कारण चन्द्रमा का प्रभाव मानव मस्तिष्क पर भी पडता है,पूर्णमासी के दिन होने वाले अपराधों में बढोत्तरी को आसानी से समझा जा सकता है,जो पागल होते है उनके असर भी इसी तिथि को अधिक बढते है,आत्महत्या वाले कारण भी इसी तिथि को अधिक होते है,इस दिन स्त्रियों में मानसिक तनाव भी अधिक दिखाई देता है,इस दिन आपरेशन करने पर खून अधिक बहता है,शुक्ल पक्ष मे वनस्पतियां अधिक बढती है,सूर्योदय के बाद वन्स्पतियों और प्राणियों में स्फ़ूर्ति का प्रभाव अधिक बढ जाता है,आयुर्वेद भी चन्द्रमा का विज्ञान है जिसके अन्तर्गत वनस्पति जगत का सम्पूर्ण मिश्रण है,कहा भी जाता है कि "संसार का प्रत्येक अक्षर एक मंत्र है,प्रत्येक वनस्पति एक औषधि है,और प्रत्येक मनुष्य एक अपना गुण रखता है,आवश्यकता पहिचानने वाले की होती है",’ग्रहाधीन जगत सर्वम",विज्ञान की मान्यता है कि सूर्य एक जलता हुआ आग का गोला है,जिससेसभी ग्रह पैदा हुए है,गायत्री मन्त्र मे सूर्य को सविता या परमात्मा माना गया है,रूस के वैज्ञानिक "चीजेविस्की" ने सन १९२० में अन्वेषण किया था,कि हर ११ साल में सूर्य में विस्फ़ोट होता है,जिसकी क्षमता १००० अणुबम के बराबर होती है,इस विस्फ़ोट के समय पृथ्वी पर उथल-पुथल,लडाई झगडे,मारकाट होती है,युद्ध भी इसी समय मे होते है,पुरुषों का खून पतला हो जाता है,पेडों के तनों में पडने वाले वलय बडे होते है,श्वास रोग सितम्बर से नबम्बर तक बढ जाता है,मासिक धर्म के आरम्भ में १४,१५,या १६ दिन गर्भाधान की अधिक सम्भावना होती है |
(२) विज्ञान की परिभाषा के अनुसार विज्ञान उसे कहते हैं जिनका प्रयोगशाला में परीक्षण किया जा सके और उसके प्रभाव का अध्ययन संभव हो | ज्योतिषशास्त्र के आलोचक इस आधार पर भी इसे विज्ञान मानने से इंकार करते हैं कि ज्योतिषशास्त्र के सिद्धान्तों एवं नियमों का भौतिक प्रयोगशाला में परीक्षण नहीं किया जा सकता है | यह सही है कि ज्योतिष विज्ञान का भौतिक प्रयोगशाला मे परीक्षण नहीं होता, परंतु इस विज्ञान में भी कारण और प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते है | इस विज्ञान के प्रयोग में गुरूत्वाकर्षण को कारण माना  जाता है व शरीर को वस्तु जिसके उपर अंतरिक्षीय तत्वों के प्रभाव का पौराणिक नियमों एवं सिद्धांतों के आधार पर विश्लेषण किया जाता हैं | इस आधार पर भौतिक विज्ञान के नियमों को मानने वाले ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान कह सकते हैं |
(३) विभिन्न ग्रहों की एक खास अवधि में निश्चित भूमिका को देखते हुए ही ‘गत्यात्‍मक दशा पद्धति की नींव रखी गयी। अपने दशाकाल में सभी ग्रह अपने गत्यात्मक और स्थैतिक शक्ति के अनुसार ही फल दिया करते हैं। उपरोक्त दोनो वैज्ञानिक आधार प्राप्त हो जाने के बाद भविष्यवाणी करना काफी सरल होता चला गया। ‘ गत्यात्मक दशा पद्धति ’ में नए-नए अनुभव जुडत़े चले गए और शीघ्र ही ऐसा समय आया ,जब किसी व्यक्ति की मात्र जन्मतिथि और जन्मसमय की जानकारी से उसके पूरे जीवन के सुख-दुख और स्तर के उतार-चढ़ाव का लेखाचित्र खींच पाना संभव हो गया। धनात्मक और ऋणात्मक समय की जानकारी के लिए ग्रहों की सापेक्षिक शक्ति का आकलण सहयोगी सिद्ध हुआ ।
(४) ज्योतिषियों के एक वर्ग की मान्यता है कि ज्योतिष और जड़ी-बूटियों की मदद से ब्लड कैंसर और अन्य गंभीर रोगों का भी इलाज संभव है। जातक की पत्रिका में यदि चंद्र और मंगल कमजोर स्थिति में हों और शनि रोग, मृत्यु या व्यय के घर में बैठे हैं तो व्यक्ति को ब्लड कैंसर की पूरी-पूरी आशंका रहती है । कुंडली में कमजोर चंद्र सफ़ेद रक्त कण को कम करता है तथा मंगल के कमजोर होने की स्थिति में व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कण कम होते हैं ।
(५) अधिकांश वैज्ञानिक इस आधार पर इसे विज्ञान मानने से इंकार करते हैं कि भौतिक विज्ञान में सिद्धांतों एवं नियमों के आधार पर जब किसी चीज का परीक्षण किया जाता है तब एक बार जो परिणाम मिलता है वही परिणाम दूसरी बार परीक्षण करने पर भी प्राप्त होता है, परंतु ज्योतिषशास्त्र में ऐसा नहीं होता है | जब कि ज्योतिष गणना में जो परिणाम एक बार आता है दूसरे ज्योतिषशास्त्री जब उसी सिद्धांत पर फलादेश करते हैं तो फलादेश अलग आता है | यदि ज्योतिषशास्त्र के उपलब्ध नियमों एवं सिद्धांतों को सूक्ष्मता से देखकर भविष्य कथन किया जाय तो परिणाम में अंतर आना संभव नहीं है, अत: जो अनिश्चित फलादेश की बात कह कर ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान मानने से इंकार करते हैं उन्हें सही नहीं कहा जा सकता |
(६) अरबों-खरबों रुपये के खर्च पर पलनें वाला विज्ञान अभी तक यह भी नहीं जानता कि मंगल लाल क्यों दिखता है, शनि चित्र-विचित्र रंगों से युक्त क्यों है, बृहस्पति पीला क्यों दिखता है आदि और इनका पृथ्वी और पृथ्वी पर रहनें वालों पर क्या कोई प्रभाव पड़ता है ? वह भी तब जब वह इसी सौरमण्डल के सदस्य हैं जिसमें हमारी पृथ्वी है। अनेकानेक प्रश्न हैं जिन्हें विज्ञान जानने का प्रयास कर रहा है और यह प्रयास जारी रहनें भी चाहिये | परन्तु ज्योतिषशास्त्र में आधुनिक वैज्ञानिक साधनों के अभाव में हजारों वर्ष पूर्व इन सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर दे दिया गया था |

(७) वर्तमान समय में जो पंचांग बन रहे हैं, वह लगभग सभी लहरी एफेमरी जो नाटिकल एल्मनॅक पर आधारित है ।  कम्प्यूटर प्रोग्राम में भी डाटाबेस यही एफेमेरी/अल्म है अतः समान चूक वहाँ भी हो गयी है। ज्योतिष गणना में ग्रह आकाश में सदैव एक निश्चित गति से चलते हैं यह ज्योतिष गणना का मुख्य आधार है। अन्तरिक्ष में, सौर धब्बो के अधिक बनने/ कम बननें या किसी केतु (कामेट) के संचरण या अन्य किसी अभिनव खगोलीय घटना वश ग्रहों की गति, भ्रमण स्थिति आदि पर विचलनकारी प्रभाव पड़्ते हैं, उनका आँकलन तभी संभव है जब प्राचीन ज्योतिष गणना पद्धति के अनुसार दृग ज्योतिषीय आधार पर पंचांग निर्मित हों और कम्प्यूटर प्रोग्राम में भी डाटाबेस यही प्राचीन ज्योतिष गणना पद्धति के अनुसार प्रोग्रामिंग की जाये।
(८) वर्तमान विज्ञान ने एक चमत्कारी बात का पता लगाया है कि शनि के दोनों ध्रुवों पर नीली रौशनी चमकती है । अभी हाल ही में आधुनिक और शक्तिशाली हबल टेलिस्कोप से नासा को भेजी गई तस्वीरों ने आश्चर्यजनक और हैरानी में डालने वाला खुलासा किया है | इन तस्वीरों से यह ज्ञात हुआ है कि शनिवार के दिन शनि के दोनों ध्रुवों पर नीली चमकदार रौशनी आश्चर्यजनक तरीके से बढ़ जाती है | यह रौशनी बिल्कुल वैसी ही है, जैसी कि हमारी पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव के आकाश में दिखाई देती है । शनिवार की ये रौशनी कई गुना तेज़ क्यों हो जाती है इस बारे में विज्ञान अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया है । यह तो स्पष्ट है कि विज्ञान के पास शनि की नीली रौशनी का कोई जवाब नहीं है, लेकिन ज्योतिषशास्त्र के पास है | हज़ारों साल से ही ज्योतिषशास्त्र ने शनि का रंग काला और नीला बताया है । शनि का प्रकोप शांत करने वाला रत्न नीलम है और शनि में दिखने वाली नीली रौशनी भी कुछ कुछ वैसी ही दिखती है। ज्योतिष में शनिवार के दिन का स्वामी भगवान शनि को ही माना जाता है | ज्योतिषशास्त्र मानता है कि शनिवार का स्वामी होने के कारण शनिवार को शनि देव की शक्ति का प्रभाव काफी ज्यादा रहता है । विज्ञान के क्षेत्र में इन तथ्यों को स्वीकार नहीं किया जाता है लेकिन इनका कोई समुचित उत्तर भी नहीं है |
(९) वैज्ञानिकों तक मंगल की धरती से पहुंची जानकारी कहती है कि मंगल की सतह लाल है | मंगल की सतह से मंगल का आकाश भी लाल ही दिखता है | ज्योतिषशास्त्र ने हज़ारों साल पहले कैसे मंगल का रंग लाल मान लिया । ज्योतिषशास्त्र में ये सिद्धांत लिख दिया कि लाल रंग के कपड़े के दान से मंगल ग्रह की शांति होती है और कैसे लाल रंग के मूंगे को मंगल का रत्न मान लिया गया । जब ज्योतिषशास्त्र ने ये नियम बनाए गए थे, तब मंगल ग्रह की कोई भी तस्वीर मौजूद नहीं थी । अब मंगल ग्रह की मिट्टी की जांच कर रहे वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल की ज़मीन में सोना और तांबा जैसी धातुओं की मात्रा हो सकती है और ज्योतिष के मुताबिक तांबा या सोने में ही मंगल के रत्न मूंगे को धारण किया जाता है । सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि बिना मंगल को समझे कोई कैसे उसे लाल रंग से जोड़ सकता है । ज्योतिषशास्त्र ने मंगल को हमेशा से एक गर्म और उग्र ग्रह माना है जो जोश हिंसा और युद्ध का कारक है और अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को अब जाकर ये जानकारी मिली है कि मंगल की सतह पर तापमान बहुत ज्यादा रहता है और साथ ही साथ मंगल के वातावरण में समय-समय पर भयानक तूफान उठते रहते हैं । अब हज़ारों साल पहले ज्योतिषशास्त्र के सिद्धांत लिखने वालों के पास ये जानकारियां ज्योतिषशास्त्र के वैज्ञानिक-दृष्टिकोण को ही पुष्ट करता है 

ज्योतिष को विज्ञान कहने के लिये इतने सब कारण क्या पर्याप्त नही है ? इतने विश्लेषण के पश्चात् मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ज्योतिषशास्त्र निश्चित रूप से विज्ञान कहलाने का अधिकार रखता है यह उस कसौटी पर खड़ा उतरता है जहां से किसी भी शास्त्र विषय को विज्ञान की संज्ञा प्राप्त होती है | ज्योतिषशास्त्र को अंधविश्वास या भ्रम कहने वाले अगर साफ मन से इस विषय का अध्ययन करें तो वे इसे विज्ञान मानने से इंकार नहीं कर सकते हैं | मुझे यह कहने में तनिक संकोच नहीं है कि ज्योतिषशास्त्र कभी एक निश्चित सिद्धांतों पर आधारित विज्ञान रहा था जिसकी रचना करने वालों के पास आकाशगंगा को समझने का कोई न कोई सशक्त माध्यम अवश्य था और अब तो बॉम्बे हाईकोर्ट भी ज्योतिष को विज्ञान होने की मान्यता दे चुका है । दुनिया भर के वैज्ञानिक भले ही ज्योषित को विज्ञान मानने से इनकार करते हों, लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि ज्योतिष एक विज्ञान है। अदालत ने ज्योतिषशास्त्र को विज्ञान के रूप में दी गई मान्यता रद्द करने के लिए दायर जनहित याचिका खारिज कर दी। जनहित मंच नामक गैर सरकारी संगठन की इस याचिका में फर्जी ज्योतिषियों, तांत्रिकों और वास्तुशास्त्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी । 
बॉम्बे हाईकोर्ट की पीठ ने कहा कि जहां तक ज्योतिष शास्त्र से जुड़े आग्रह का सवाल है तो सुप्रीम कोर्ट पहले ही इस मुद्दे पर विचार कर चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने भीज्योतिष को विज्ञान बताया है। शीर्ष अदालत ने वर्ष २००४ ईस्वी  में विश्वविद्यालयों को निर्देश भी दिया था कि वे ज्योतिष विज्ञान को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करने पर विचार करें । पीठ ने इस संबंध में केंद्र सरकार की ओर से दाखिल शपथ पत्र का भी हवाला दिया । 
सरकार ने शपथ पत्र में कहा है कि ज्योतिषशास्त्र चार हजार साल पुराना विश्वसनीय विज्ञान है और यह दवा व जादुई उपचार अधिनियम (आपत्तिजनक विज्ञापन) सन १९५४ ईस्वी के तहत नहीं आता । इसमें कहा गया है कि इस कानून के दायरे में ज्योतिष शास्त्र और संबंधित विज्ञान नहीं आते हैं । ज्योतिष शास्त्र जैसे समय की कसौटी पर परखे गए विज्ञान पर प्रतिबंध का विचार अनुचित व अन्यायपूर्ण है । यह याचिका जनहित मंच के संयोजक भगवानजी रैयानी और उनके सहयोगी दत्ताराम ने दायर की थी ।
पेस इंटर एस्ट्रोमेडिकल एसोसिएशन गुजरात की अध्यक्ष एवं भारतीय प्राच्य ज्योतिष शोध संस्थान की गुजरात प्रभारी श्रीमती सोनी ने ज्योतिष से जुड़े प्रश्न 'ज्योतिष विज्ञान है, गणित है अथवा ढकोसला है ?' के प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा कि "ज्योतिष ढकोसला नहीं है, यह विज्ञानसम्मत शास्त्र है। इसका उद्‍देश्य जनता के बीच व्याप्त अंधविश्वास को दूर करना है तथा भविष्य की गतिविधियों से परिचित कराना है। ज्यो‍‍तिष विज्ञान से भी पुराना विषय है। वर्तमान में भारत में ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों में भी ज्योतिष को मान्यता मिली हुई है ।"  
अत: यह कहा जा सकता है कि वर्तमान विज्ञान की नई शोध और खोजें ज्योतिष के पूर्व धारणाओं को पुष्ट करने हेतु सबूत इकट्ठे कर रही हैं और एक दिन ज्योतिष फिर से अपनी पुरानी गरिमा को अवश्य प्राप्त कर सकेगा । ज्योतिष समय का विज्ञान है, इसमें तिथि, वार, नक्षत्र, योग और कर्म इन पांच चीजों का अध्ययन कर भविष्य में होने वाली घटनाओं की जानकारी दी जाती है। यह किसी जाति या धर्म को नहीं मानता। वेद भगवान भी ज्योतिष के बिना नहीं चलते। वेद के छः अंग हैं, जिसमें छठा अंग ज्योतिष है। हमने पूर्व जन्म में क्या किया और वर्तमान में क्या कर रहे हैं, इसके आधार पर भविष्य में क्या परिणाम हो सकते हैं, इसकी जानकारी दी 'जाती है ।
'जय हिंद,जय हिंदी'

6 टिप्‍पणियां:

  1. संपूर्ण मानव को सभ्यता और संस्कृति के शिखर पर पहुचाने वाला वेद है| वेद के छः अंग है:-
    (१) शिक्षा ,
    (२) कल्प ,
    (३) निरुक्त,
    (४) व्याकरण,
    (५) छंद,
    (६) ज्योतिष |
    इसमें छठा अंग ज्योतिष है और यही मानव को सन्मार्ग दिखने हेतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण है ।

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  2. ज्योतिष को विकसित विज्ञान साबित करने मे शिक्षा की कमी ही रोडा है! आज न किसी के पास पढ्ने का समय है न ही कोई पढाना चाहता है!! गर्त मे तो जाना ही है!! आज ज्योतिष का उपयोग केवल जनता को मूर्ख बनाने के लिये करते हैं लोग न की भलाई के लिये इसी का परिणाम सामने है!!

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  3. प्रिय अवध भाई,
    आप सही कह रहे हैं, ज्योतिष को विकसित विज्ञान साबित करने मे शिक्षा की कमी ही रोडा है....,हमें मिलकर जन जाग्रति का कार्य करना होगा | मुझे आपका ब्लौग पसंद आया और उसे अनुसरण भी कर रहा हूँ, अपना स्नेहभाव बनाये रखियेगा |
    'जय हिंद,जय हिंदी'

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  4. ज्योतिष ढकोसला नहीं है, यह विज्ञानसम्मत शास्त्र है। इसका उद्‍देश्य जनता के बीच व्याप्त अंधविश्वास को दूर करना है तथा भविष्य की गतिविधियों से परिचित कराना है। ज्यो‍‍तिष विज्ञान से भी पुराना विषय है। वर्तमान में भारत में ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों में भी ज्योतिष को मान्यता मिली हुई है ।
    'जय हिंद,जय हिंदी'

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  5. हज़ारों साल से ही ज्योतिषशास्त्र ने शनि का रंग काला और नीला बताया है । शनि का प्रकोप शांत करने वाला रत्न नीलम है और शनि में दिखने वाली नीली रौशनी भी कुछ कुछ वैसी ही दिखती है। ज्योतिष में शनिवार के दिन का स्वामी भगवान शनि को ही माना जाता है | ज्योतिषशास्त्र मानता है कि शनिवार का स्वामी होने के कारण शनिवार को शनि देव की शक्ति का प्रभाव काफी ज्यादा रहता है । विज्ञान के क्षेत्र में इन तथ्यों को स्वीकार नहीं किया जाता है लेकिन इनका कोई समुचित उत्तर भी नहीं है|
    'जय हिंद,जय हिंदी'

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  6. ज्योतिष कोई विज्ञान नहीं है वरन पूर्णतया ठगी का धंधा है जो समाज के अन्धविश्वास और अज्ञानता का लाभ उठाकर किया जा रहा है। पुराफलित ज्योतिष ही बोगस है सिद्धांत हीन है ज्योतिष में एक भी ऐसा सही सिद्धांत नहीं है जिससे किसी भी व्यक्ति के भविष्य की किसी भी घटना के बारे में सही सही बताया जा सके। ज्योतिष कैसे बोगस है यह जानने के लिए जिज्ञासु मित्र मेरे ब्लॉग पर जाकर पढ़ सकते है
    https://ashiishshandil.blogspot.in/

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