शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

'समर्पित भक्तकवि तुलसीदासजी'


तुलसीदास कवि होने के साथ-साथ भक्त थे या भक्त होने के साथ-साथ कवि थे कहना मुश्किल है, क्योंकि इन दोनों तत्त्वों का सामंजस्य उनमें अद्भुत था, यह प्रकृत्ति प्रदत्त(भगवान) ही था । इतिहासकार विन्सेंट ए स्मिथ ने अकबर की जीवनी में तुलसीदास के विषय में लिखा है - ‘‘उनका नाम तत्कालीन इतिहास ग्रंथों में नहीं मिलेगा, फिर भी वह भारत में अपने समय के सबसे महान् व्यक्ति थे। वह अकबर से भी महान् थे। अकबर युद्ध में कितनी ही बार विजयी क्यों न हुए हो, तुलसीदास उनसे कहीं अधिक महान् विजेता हैं, क्योंकि उन्होंने करोडों पुरुषों और स्त्र्यिों का हृदय और मन जीत लिया है ।
महान काव्य मस्तिष्क से नहीं, हृदय की अनुभूति से उत्पन्न होता है ! पाश्चात्य तथा भारतीय काव्यशास्त्री शताब्दियों से यह मानते आ रहे हैं कि मनोरंजन के अतिरिक्त महान् काव्य का मुख्य पहलू हितकर काव्य है। ‘हितेन सह सहितम् इति साहित्यिम्’ या ‘साहितस्य भावः इति साहित्य’ भले ही साहित्य शब्द की व्याख्या रही हो, पर क्या काव्य को साहित्य से अलग कर सकते हैं*? हित साधन करना तो समग्र साहित्य का पहला और परम कर्त्तव्य है।तुलसीदास ने भी ‘सुरसरि सम सब कहँ हित होई।’ (कीरति भनिति भूति भलि सोई) कहते हुए काव्य-प्रतिभा को एक दैवी वरदान माना और इस वरदान का उपयोग जनहित हेतु हो, इसका उत्तरदायित्व कवि पर छोडा ।
तुलसी के अनुसार एक ओर नैतिकता के अभाव में भगवद्भक्ति नितान्त व्यर्थ है और दूसरी ओर भगवद्भक्ति के सहारे ही मनुष्य नैतिकता के मार्ग पर दृढ कदमों से आगे बढ सकता है। तुलसी ने अपने समय में जनता में संन्यास, घोर तपस्या तथा रहस्यवादी साधना के प्रति जनता की अत्यधिक श्रद्धा देखी, वे कहते हैं - जाके नख अरु जटा बिसाला । सोई तापस प्रसिद्ध कलिकाला । असुभ वेष भूषण धरे भच्छाभच्छ जे खाहिं । तेरु जोगी, तेई सिद्ध नर, पूज्य ते कलिजुग मांहि ।। तुलसी ने भगवान के करीब होने के लिए न तो संन्यास, न जटिल कर्मकाण्ड, न घोर तपस्या, न रहस्यमय साधना और न ही दर्शन का प्रकाण्ड ज्ञान आवश्यक माना। उनका मानना था कि भक्त में चातक की एकनिष्ठता के साथ-साथ हंस का विवेक भी होना चाहिए - 
राम प्रेम भाजन भरत बडेहि न एहि करतूति । चातक हंस सराहियत टेक विवेक विभूति ।। 

संवत पन्द्रह सौ तैतालिस में (१५४३), जागा राजापुर का भाग,
 हुलसी ने तुलसी को जाया, जो हिंदी का अमर सुहाग !
 राम नाम बोला बोला था, रामनाम जनमत तत्काल,
पिता आत्माराम देखकर बालक को, हो गए निहाल !!
गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म , उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के राजपुर ग्राम मेँ १५८९ या १५३२ मेँ हुआ बतलाते हैँ। वे सरयूपारायणी ब्राह्मण थे। उन्हेँ वाल्मीकि ऋषि का अवतार कहा जाता है. उनके पिता का नाम आत्माराम शुक्ल दुबे व माता का नाम हुलसी था। उनके जन्म के समय से ही ३२ दाँत मौजूद थे और वे अन्य शिशु की भाँति जन्मते ही रोये नहीँ थे! तुलसीदास जी को बचपन मेँ "राम - बोला " कहकर पुकारते थे - उनकी पत्नी का नाम "बुध्धिमती" था परँतु वे "रत्नावली " के नाम से ही अकसर साहित्य मेँ पहचानी जातीँ हैँ - उनके पुत्र का नाम "तारक " था। तुलसीदस जी को रत्नावली के प्रति आसक्ति इतनी गहन थी कि वे उनका बिछोह सहन न कर पाते थे। एक दिन रत्नावली बिना अनुमति लिये, अपने पीहर चली गयी और भयानक बारिश के बीच ,और तूफानी नदी को एक मृत शव के सहारे, पार करके, मरे हुए सर्प को रस्सी समझकर , पकडकर, सहारा लेकर तुलसी, रत्ना के पास पहुँचे तब, पत्नी ने उलाहना देते हुए कहा कि, " मेरी हाड मांस से बनी देह पर इतनी आसक्ति के बदले ऐसी प्रीत श्री राम से करते तब , आप को अवश्य मुक्ति मिल जाती ! " यही रत्ना की बात तुलसी के मर्म को भेद गयी ! सोये सँस्कार जागे और वे सँसार त्याग कर १४ वर्ष तक तीर्थस्थानो मेँ घूमते रहे। हनुमान जीकी क्र्पा से उन्हेँ प्रभु श्री रामचँद्र जी के दर्शन हुए और उन्होँने भावविभिर होकर कहा,
" गँगा जी के घाट पर, भई सँतन की भीड, तुलसीदास चंदन रगडै,तिलक लेत रघुबीर " 
तुलसीदास जी ने जब रामायण लिखी, तब प्रचार का कोई साधन नहीं था। उनके हाथ में प्रेस नहीं थी। परंतु इसके बावजूद रामायण का घर-घर में प्रचार हुआ। आज प्रेस होते हुए भी हिंदुस्तान की किसी भी भाषा में कोई ऐसी किताब नहीं है, जो तुलसी रामायण के समान घर घर पहुँची हो। तुलसीदासजी ने पैंतालीस साल की उम्र में रामायण लिखी और फिर चालीस साल तक गाँव-गाँव जाकर अपनी मधुर वाणी में रामायण गान किया।
यह रामकथा ऐसी है कि छोटे बच्चों से लेकर औरतों और ग्रामीणों को भी, जिनको संस्कृत का ज्ञान नहीं है या कम पढ़े लिखे हैं, उनको भी सुनने में और गाने में आनंद आता है। जिनको गहराई में पैठने की आदत है, उनको वैसे पैठने का भी मौका मिलता है। यह बड़ा भारी उपकार तुलसीदासजी ने हम पर किया है।
सारे समाज का उत्थान करने के लिए, सब प्रकार के अहंकार को छोड़कर वे झुक गये और अत्यंत सरल भाषा में लिखा। विद्वत्-शिरोमणि होकर लिखा 'जागबलिक'। कोई संस्कृत जानने वाला सहन करेगा? कहेगा 'याज्ञवल्क्य' लिखना चाहिए। अब लोगों को व्याकरण सिखाना है कि धर्म सिखाना है ! जिन शब्दों का लोग उच्चारण भी नहीं कर सकते, उनके लिए उन्होंने सरल भाषा लिखी और वे कहते हैं कि 'मैं बहुत बड़े ग्रन्थों का प्रमाण लेकर लिख रहा हूँ।' अरथ न धरम न काम रूचि। 'धर्म' नहीं कहते 'धरम'कहते हैं, 'अर्थ' नहीं कहते 'अरथ' कहते हैं, 'निर्वाण' नहीं कहते 'निरबान' कहते हैं। युक्ताक्षर तोड़कर आम समाज सके, ऐसी भाषा लिखी।
इतनी नम्रता थी और ऐसे झुक गये समाज को ऊपर उठाने के लिए, जैसे माँ बच्चे को उठाने के लिये झुकती है।
तुलसीदासजी पहले काशी में 'पंचगंगा घाट' पर रहते थे। वहाँ लोगों ने उनको ईर्ष्यावश इतना सताया कि वे मणिकर्णिका घाट पर भाग गये। वहाँ भी अलग-अलग पंथों के लोगों ने बहुत सताया। वहाँ से भी भागे, तीसरे घाट पर गये। आखिर बहुत सताया तो सब छोड़कर काशी के आखिरी हिस्से में जहाँ एक टूटा-फूटा घाट था 'अस्सी घाट', वहाँ पर रहे। वहाँ ज्यादा बस्ती नहीं थी। आज उसके दक्षिण में हिन्दू विश्वविद्यालय बना है और कुछ बस्ती है, उस जमाने में बस्ती नहीं थी। इस तरह उन्हें बहुत तंग किया गया लेकिन आज सब उनका नाम लेकर आदर से, भक्ति से, प्यार से झुक जाते हैं। यही हाल संत कबीरजी, संत ज्ञानदेव, नानकजी, संत नामदेव जी का हुआ। आद्य शंकराचार्य जी इतने महान थे पर उनका भी यही हाल हुआ था उनके जमाने में।
अपनी भारतीय परम्परा सभ्यता रामायण की सभ्यता है। दुर्गुणों पर, पाप पर हमला करना यह रामायण का स्वरूप है। उसी के लिए घर-घर में रामायण पढ़ी जाती है। यह कथा कब तक चलेगी ? जब तक गंगा की धारा बहती रहेगी, हिमालय खड़ा रहेगा तब तक यह राम कथा बहती रहेगी।
तुलसी रामायण जैसा कोई ग्रंथ नहीं है, जिससे सामान्य किसान भी जो लेना है वह ले सकता है और महाज्ञानी भी जो लेना है वह ले सकता है।
बचपन में माँ ने हमको रामायण का सार सुनाया था कि 'ये दिन भी बीत जायेंगे।' रामचन्द्र जीपन्द्रह साल के हैं और विश्वामित्र जी उन्हें बुलाने आये हैं। सब लोग चिंतित हैं परंतु राम जी शांत हैं। कोई उनको पूछता है तो कहते हैं- 'ये दिन भी बीत जायेंगे।' राक्षसों का संहार कर, अनेक पराक्रम कर रामजी वापस आते हैं। उस समय सब आनंद मना रहे हैं लेकिन रामजी तो शांत ही बैठे हैं। उन्हें पूछा जाता है तो वे कहते हैं- 'ये दिन भी बीत जायेंगे।' जब आता है शादी का प्रसंग, उस समय भी रामजी के मुखारविंद पर शांति और वही जवाब। फिर आया राज्याभिषेक का आनंदमयी प्रसंग। तब भी रामजी शांत थे और वही जवाब, 'ये दीन भी बीत जायेंगे।' इतने में माँ की आज्ञा पर चौदह साल का वनवास मिलता है। फिर भी रामजी शांत ही थे। वही प्रश्न, वही उत्तर। इस प्रकार पूरी रामायण सुख-दुःख के प्रसंगों से भरी है परंतु राम जी के मुख पर सदा वही शांति, वही प्रसन्नता क्योंकि उनको पता था कि ये दिन भी बीत जायेंगे।'
तुलसीदास जी के अनुसार सर्वप्रथम श्री राम की कथा भगवान श्री शंकर ने माता पार्वती जी को सुनाया था। जहाँ पर भगवान शंकर पार्वती जी को भगवान श्री राम की कथा सुना रहे थे वहाँ कागा (कौवा) का एक घोसला था और उसके भीतर बैठा कागा भी उस कथा को सुन रहा था। कथा पूरी होने के पहले ही माता पार्वती को ऊँघ आ गई पर उस पक्षी ने पूरी कथा सुन ली। उसी पक्षी का पुनर्जन्म काकभुशुण्डि के रूप में हुआ। काकभुशुण्डि जी ने यह कथा गरुड़ जी को सुनाई। भगवान श्री शंकर के मुख से निकली श्रीराम की यह पवित्र कथा अध्यात्म रामायण के नाम से प्रख्यात है। अध्यात्म रामायण को ही विश्व का सर्वप्रथम रामायण माना जाता है।
हृदय परिवर्तन हो जाने के कारण एक दस्यु से ऋषि बन जाने तथा ज्ञानप्राप्ति के बाद वाल्मीकि ने भगवान श्री राम के इसी वृतान्त को पुनः श्लोकबद्ध किया। महर्षि वाल्मीकिके द्वारा श्लोकबद्ध भगवान श्री राम की कथा को वाल्मीकि रामायण के नाम से जाना जाता है। वाल्मीकि को आदिकवि कहा जाता है तथा वाल्मीकि रामायण को आदि रामायण के नाम से भी जाना जाता है।
देश में विदेशियों की सत्ता हो जाने के बाद देव भाषा संस्कृत का ह्रास हो गया और भारतीय लोग उचित ज्ञान के अभाव तथा विदेशी सत्ता के प्रभाव के कारण अपनी ही संस्कृतिको भूलने लग गये। ऐसी स्थिति को अत्यन्त विकट जानकर जनजागरण के लिये महाज्ञानी सन्त श्री तुलसीदास जी ने एक बार फिर से भगवान श्री राम की पवित्र कथा को देसी भाषा में लिपिबद्ध किया। सन्त तुलसीदास जी ने अपने द्वारा लिखित भगवान श्री राम की कल्याणकारी कथा से परिपूर्ण इस ग्रंथ का नाम रामचरितमानस रखा। सामान्य रूप से रामचरितमानस को तुलसी रामायण के नाम से जाना जाता है।
जानकी जीवन की बलि जैहों।चित कहै, राम सीय पद परिहरि अब न कहूँ चलि जैहों॥
उपजी उर प्रतीति सपनेहुँ सुख, प्रभु-पद-बिमुख न पैहों।मन समेत या तनुके बासिन्ह, इहै सिखावन दैहों॥
स्त्रवननि और कथा नहिं सुनिहौं, रसना और न गैहों।रोकिहौं नैन बिलोकत औरहिं सीस ईसही नैहों॥
नातो नेह नाथसों करि सब नातो नेह बहैहों।यह छर भार ताहि तुलसी जग जाको दास कहैहों॥



"महान कवि तुलसीदास की प्रतिभा-किरणों से न केवल हिन्दू समाज 
और भारत, बल्कि समस्त संसार आलोकित हो रहा है।"

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